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Uttar Pradesh BJP: क्या वाकई आसान है यूपी में भाजपा की राह?

Uttar Pradesh BJP: लोकसभा की चार सौ सीटों को जीतने के लक्ष्‍य के साथ चुनावी मैदान में उतरी भाजपा को सबसे बड़ी उम्मीद उत्तर प्रदेश से है। इसलिए भाजपा ने यूपी की सभी 80 सीटों को जीतने का लक्ष्‍य तय कर रखा है।

भाजपा के शीर्ष रणनीतिकार मान कर चल रहे हैं कि भाजपा उत्तर प्रदेश में 75 से अधिक सीटें जीतेगी, क्‍योंकि अपना दल, रालोद, सुभासपा, निषाद पार्टी जैसी जातीय आधारित पार्टियां उसके गठबंधन का हिस्‍सा हैं। इन जातियों का एकमुश्‍त वोट भाजपा प्रत्‍याशियों को मिलेगा। भाजपा को यूपी में फिलहाल सब फील गुड लग रहा है।

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परंतु, जमीनी हकीकत ऐसी नहीं है। भाजपा को उत्तर प्रदेश में जीत की राह जितनी आसान नजर आ रही है, वास्‍तव में यह उतनी सुगम है नहीं। भाजपा को मोदी लहर पर भरोसा होता तो जेपी नड्डा और अमित शाह पारिवारिक एवं जातीय पार्टियों से गठबंधन के लिए अपने घोड़े नहीं खोलते।

पार्टी नेतृत्व को अगर भरोसा होता कि नरेंद्र मोदी के नाम पर देश में लहर चल रही है, और पार्टी बिना किसी सहयोग के उत्तर प्रदेश में जीत हासिल हो जायेगी, तब सुभासपा एवं रालोद जैसी जातीय एवं पारिवारिक पार्टियों को गठबंधन में शामिल करने के लिये हाथ-पैर नहीं मारना पड़ता। 'अपनों' का हक काटकर इन दलों को सरकार एवं विधान परिषद में हिस्‍सेदारी नहीं देनी पड़ती।

अयोध्‍या में राम मंदिर निर्माण के बाद भाजपा दावा कर रही है कि मतदाता उसे झूमकर वोट करेगा, लेकिन उसे भी इस थ्‍योरी पर पूरी तरह भरोसा नहीं है। तभी भाजपा को मजबूरी में उन्‍हीं जातीय एवं पारिवारिक दलों को गठबंधन का हिस्‍सा बनाना पड़ा, जिन पर नरेंद्र मोदी अक्‍सर अपने भाषणों में हमला करते रहते हैं। विधानसभा चुनाव में जब सुभासपा और रालोद विपक्षी गठबंधन का हिस्‍सा थे, इसके बावजूद योगी आदित्‍यनाथ ने बड़ा बहुमत हासिल किया था, लेकिन लोकसभा चुनाव में भाजपा का शीर्ष नेतृत्‍व इनके बिना लड़ने की हिम्‍मत नहीं दिखा पाया।

जाहिर है भाजपा को भरोसा नहीं है कि वह अकेले लड़कर उत्तर प्रदेश का किला फतह कर सकती है। सत्ता विरोधी लहर नहीं होने के बावजूद भाजपा को दो मोर्चों पर विरोध का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी को एकमुश्‍त वोट देने वाला क्षत्रिय एवं कायस्‍थ मतदाता भाजपा से नाराज है। क्षत्रियों एवं कायस्‍थों का 90 फीसदी वोट भाजपा को मिलता रहा है, लेकिन अब इसमें बिखराव की आशंका है।

क्षत्रियों को लग रहा है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्‍व उनके प्रतिनिधित्‍व को कम करने की साजिश कर रहा है। हरियाणा, झारखंड, छत्तीसगढ़, गुजरात जैसे राज्‍यों में एक भी क्षत्रिय उम्मीदवार को टिकट नहीं देने तथा मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थान, उत्तर प्रदेश में प्रत्‍याशियों की संख्‍या कम किये जाने को क्षत्रिय अपने साथ धोखा मान रहा है।

उत्तर प्रदेश में क्षत्रिय बहुल सीटों पर दूसरी जातियों के प्रत्‍याशी उतारे जाने से भी नाराजगी है। गाजियाबाद में जनरल वीके सिंह का टिकट काटकर वैश्‍य समाज से आने वाले अतुल गर्ग को पार्टी ने टिकट दिया, लेकिन कानपुर में ब्राह्मण सतीश पचौरी का टिकट काटकर उसी वर्ग के रमेश अवस्‍थी को, तो मेरठ से राजेन्द्र अग्रवाल का टिकट काटकर अग्रवाल समाज के ही अरुण गोविल को टिकट दिया गया। अन्‍य सीटों पर भी ऐसा ही बदलाव हुआ, लेकिन गाजियाबाद की क्षत्रिय सीट पर वैश्‍य को टिकट दे दिया गया। इसी का परिणाम है कि गाजियाबाद में क्षत्रिय बहुल इलाकों में अतुल गर्ग के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहा है।

गाजियाबाद में प्रत्‍याशी बदलाव का असर नोएडा, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, सहारनपुर और मेरठ सीट पर भी पड़ने की संभावना है, क्‍योंकि इन लोकसभा सीटों की कई विधानसभा सीटों में क्षत्रिय मतदाताओं की निर्णायक संख्‍या है। पूर्वांचल में ओमप्रकाश राजभर के आने के बावजूद भाजपा को कई सीटों पर मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा, और इसमें सबसे बड़ा फैक्‍टर जौनपुर के दबंग नेता धनंजय सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद हुई कार्रवाई है।

हालांकि धनंजय को उनके खिलाफ दर्ज मामले में सजा मिली है और यह एक नियमित प्रक्रिया है, लेकिन सजा की टाइमिंग को लेकर नाराजगी है। धनंजय सिंह के समर्थकों को लग रहा है कि भाजपा सरकार ने जानबूझकर चुनाव के समय ही धनंजय को सजा दिलवाई है ताकि वह मैदान में नहीं उतर सकें।

हालांकि भाजपा को क्षत्रियों की नाराजगी से सीटों की संख्‍या पर कोई खतरा नजर नहीं आ रहा है। वह मानकर चल रही है कि थोड़ा बहुत क्षत्रिय मतदाता इधर उधर होगा, तो उसकी भरपायी राजभर एवं जाट वोटर कर देगा। राम मंदिर निर्माण का असर भी क्षत्रियों की नाराजगी दूर करने में मदद करेगा लेकिन संभव है कि यह भाजपा की बड़ी भूल साबित हो।

क्षत्रिय वोटर मान कर चल रहा है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्‍व योगी आदित्‍यनाथ को आगे करके क्षेत्रीय क्षत्रपों को खत्‍म करने की कोशिश में जुटा हुआ है। इस नाराजगी का असर केवल उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नहीं है। राजस्‍थान, बिहार, झारखंड, गुजरात और मध्‍य प्रदेश जैसे राज्‍यों में भी इसका असर देखने को मिल सकता है।

क्षत्रियों के अलावा कायस्‍थ वोटरों में भी भाजपा के खिलाफ नाराजगी है। कायस्‍थ लंबे समय से आंख मूंदकर भाजपा पर भरोसा करता आ रहा है। उत्तर प्रदेश में बीते दिनों राज्‍यसभा एवं विधान परिषद के लिए हुए चुनाव में भाजपा ने एक भी कायस्‍थ प्रत्‍याशी नहीं उतारा। कायस्‍थ को लग रहा है कि भाजपा ने उसे अपना बंधुवा वोटर समझ लिया है, इसलिए पार्टी में अन्‍य जातियों को उनकी हिस्‍सेदारी मिल रही है, लेकिन कायस्‍थ हाशिये पर है।

उत्तर प्रदेश में प्रयागराज, फूलपुर, प्रतापगढ़, बस्‍ती, गोरखपुर, बनारस, लखनऊ, बरेली, देवरिया, बलिया, जौनपुर, रायबरेली, कानपुर लोकसभा सीट पर कायस्‍थों की अच्‍छी खासी संख्‍या है। प्रयागराज, गोरखपुर, बरेली जैसी सीटों पर तो कायस्‍थ वोटर परिणाम बदल सकता है।

कायस्‍थ वोटर प्रकियावादी नहीं होता है, इसलिए भाजपा इस वर्ग को गंभीरता से नहीं ले रही है, लेकिन सपा की लंबे समय से कायस्‍थ वोटरों पर नजर है। सपा ने बनारस से आशुतोष सिन्‍हा को एमएलसी सीट देकर विधायक बनवाया था तथा बीते राज्‍यसभा चुनाव में कायस्‍थ जया बच्‍चन एवं आलोक रंजन को उतार कर इस वर्ग पर अपना भरोसा जताया था। सपा के उलट भाजपा ने अपने किसी भी कायस्‍थ कार्यकर्ता को विधान परिषद या राज्‍यसभा भेजने में दिलचस्‍पी नहीं दिखाई। इतना ही नहीं, लोकसभा में भी भाजपा ने यूपी से अब तक कायस्थ जाति से आनेवाले किसी को उम्मीदवार नहीं बनाया है। झारखंड की हजारीबाग सीट से भी जयंत सिन्‍हा का टिकट काटकर वैश्‍य समाज के मनीष जायसवाल को उतार दिया है।

एक और फैक्‍टर है जो भाजपा को झटका दे सकता है, वह है जीत का ओवर कांफिडेंस। भाजपा ने अपने उन सांसदों को फिर से टिकट दे दिया है, जिनका अपने क्षेत्र में जबर्दस्‍त विरोध था। खुद कई सांसद अपनी सीट बदलना चाहते थे, लेकिन शीर्ष नेतृत्‍व ने उन्‍हें फिर से प्रत्‍याशी बना दिया है। नोएडा, मुजफ्फरनगर, चंदौली, बस्‍ती, डुमरियागंज, बुलंदशहर, प्रतापगढ़ जैसी कई सीटें हैं, जहां प्रत्‍याशियों को लेकर जनता में आक्रोश है। इनमें से कई सीटें भाजपा दस से बीस हजार वोटों से जीती थी।

मुसलमान इस बार पूरी तरह से इंडिया गठबंधन के साथ है। बसपा ने कई मुस्लिम प्रत्‍याशी उतारे हैं, लेकिन उनमें बिखराव की संभावना न्‍यूनतम है। वोटरों का एक वर्ग ऐसा भी है, जो ईडी और सीबीआई की भेदभाव पूर्ण कार्रवाई से भाजपा से नाराज है। ऐसे में भाजपा की राह यूपी में उतनी आसान नजर नहीं आ रही है, जितनी ऊपर से दिखाई दे रही है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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