2024 Election: मोदी को चुनौती कहां है 2024 में?

2024 Election: 2014 में नरेंद्र मोदी के चुनावी रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर ने अब कांग्रेस का चुनावी रणनीतिकार बनने की पेशकश की है| लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी भविष्यवाणी की है कि 2024 में नरेंद्र मोदी के रास्ते में कोई रुकावट नहीं है| नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, जगनमोहन रेड्डी, स्टालिन और केजरीवाल के भी चुनावी रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर 2017 में पंजाब और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के भी रणनीतिकार रहे थे| पंजाब में तो कांग्रेस जीत गई थी, लेकिन उत्तर प्रदेश में खाट पर चर्चा पूरी तरह विफल हो गई थी|

कांग्रेस के साथ काम करने का प्रशांत किशोर का अनुभव अच्छा नहीं रहा| 2018 में उन्होंने जेडीयू की सदस्यता ले ली थी, लेकिन नीतीश कुमार के साथ भी उनका अनुभव अच्छा नहीं रहा। इसलिए सवा दो साल बाद जनवरी 2021 में उन्होंने जेडीयू से इस्तीफा दे दिया था| जेडीयू छोड़ने के बाद वह अपनी शर्तों पर कांग्रेस में शामिल होना चाहते थे, उनकी लंबी बातचीत भी हुई, लेकिन कांग्रेस उनकी शर्तें मानने को तैयार नहीं हुई| वह एक अच्छे चुनाव रणनीतिकार हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में भाजपा के रणनीतिकार अमित शाह के सामने चारों खाने चित हुए थे, जब भारतीय जनता पार्टी ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर के सरकार बना ली थी, और कांग्रेस प्रमुख विपक्षी पार्टी भी नहीं बन सकी थी|

lok sabha election 2024 challenges for narendra modi 2024 elections

हाल ही के इंडिया टूडे के ओपिनियन पोल में भी भाजपा को 2024 में स्पष्ट बहुमत मिलने की भविष्यवाणी की गई है| प्रशांत किशोर का चुनावी आकलन इसलिए मायने रखता है, क्योंकि जब अमित शाह पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में 200 सीटें जीतने का दावा कर रहे थे, ज्यादातर चुनावी सर्वेक्षण भी भाजपा की जीत या जीत के नजदीक पहुंचने का दावा कर रहे थे, तब प्रशांत किशोर ने भाजपा को सौ से कम सीटें मिलने का दावा किया था|

प्रशांत किशोर ममता बनर्जी के चुनाव रणनीतिकार थे और उनकी भविष्यवाणी के अनुसार भाजपा 77 सीटों पर निपट गई थी| अब जब नीतीश कुमार दावा कर रहे हैं कि अगर भाजपा के सामने विपक्ष का एक उम्मीदवार हुआ, तो भाजपा को सौ से कम सीटों पर निपटा देंगे, तब प्रशांत किशोर ने कहा है कि 2024 में मोदी के सामने कोई चुनौती नहीं है|

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उनकी इस भविष्यवाणी का आधार यह है कि उत्तर भारत और पश्चिम भारत में एक दो राज्य को छोड़ कर भाजपा का कांग्रेस से ही सीधा मुकाबला है, इसलिए इन दोनों क्षेत्रों के 13 राज्यों यूपी, उत्तराखंड ,हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और गोवा के साथ केंद्र शासित चंडीगढ़ में से उसे कहीं चुनौती है तो सिर्फ महाराष्ट्र में है|

इन 13 राज्यों और चंडीगढ़ में पिछली बार भाजपा को 267 लोकसभा सीटों में से 207 सीटें मिलीं थीं| मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव नतीजों ने इन तीनों राज्यों की 65 सीटों में कम से कम 62 सीटों की यथास्थिति पर मोहर लगाई है| भाजपा को गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल में भी कोई चुनौती नहीं है| पंजाब और जम्मू कश्मीर की 19 सीटों में से उसे सिर्फ 5 सीटें मिलीं थीं, उतनी ही दुबारा मिलने में कोई मुश्किल नहीं आएगी|

महाराष्ट्र की 48 सीटों में से भाजपा को संयुक्त शिवसेना के साथ गठबंधन के चलते 24 सीटें मिलीं थीं| भाजपा के सहयोगी शिवसेना को भी 18 सीटें मिलीं थी| जबकि मिलकर चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस को सिर्फ एक और एनसीपी को चार सीटें ही मिलीं थीं| इस बार शिवसेना टूट चुकी है, शिवसेना का एक हिस्सा भाजपा के साथ है| उधर एनसीपी भी टूट चुकी है, आधी एनसीपी भी भाजपा के साथ है|

ऐसा माना जाता था कि भले ही ज्यादातर विधायक और सांसद उद्धव ठाकरे को छोड़कर एकनाथ शिंदे के माध्यम से भाजपा के साथ चले गए होंगे, जमीन पर उद्धव ठाकरे का आधार बना हुआ है| लेकिन हाल ही में हुए ग्राम पंचायत चुनावों ने यह धारणा खत्म कर दी है| भाजपा और उसके दोनों सहयोगी दलों यानी एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजीत पवार की एनसीपी ने कांग्रेस, उद्धव और शरद पवार को पीछे छोड़ दिया| भाजपा की महायुती को 1400 से ज्यादा सीटें मिलीं, जबकि महा विकास अघाड़ी 1312 सीटों पर अटक गई|

इसका मतलब यह है कि लोकसभा चुनावों में एनडीए अपनी पुरानी सीटें बरकरार रख सकता है| दूसरा खतरा उत्तर प्रदेश में बताया जा रहा है, लेकिन जिस तरह भाजपा छोटी जातियों की छोटी पार्टियों को अपने साथ जोड़ने में कामयाब हुई है, उससे उसे एनडीए की 65 सीटें बरकरार रखने में कोई मुश्किल नहीं आएगी, हालांकि भाजपा का टारगेट 2014 जैसी जीत हासिल करना है, जब उसे अपना दल के साथ मिल कर 73 सीटें मिली थीं|

इंडी गठबंधन के बावजूद उत्तर भारत और पश्चिम भारत की 207 सीटें जीतने में भाजपा को कोई बड़ी अड़चन नहीं आएगी| जहां तक दक्षिण के पांच राज्यों का सवाल है तो आंध्र, तमिलनाडु और केरल में भाजपा का एक भी सांसद नहीं है| कर्नाटक से 25 और तेलंगाना से चार सांसद हैं| भाजपा को इन पाँचों राज्यों की 129 सीटों में से अपनी 29 सीटें बचानी हैं|

दक्षिण में समीकरण बड़ी तेजी से बदल रहे हैं, तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक भले ही भाजपा को छोड़ गई है, लेकिन चुनावों के बाद उसके पास भाजपा के साथ आने के सिवा कोई विकल्प नहीं होगा| द्रमुक सरकार के मंत्रियों की जिस तरह भ्रष्टाचार के आरोपों में गिरफ्तारियां हो रही हैं, उससे द्रमुक की साख गिरी है| इसलिए द्रमुक गठबंधन के लिए 38 में से 37 सीटें बरकरार रखना असंभव होगा| जिन सीटों पर कांग्रेस के 8 उम्मीदवार जीते थे, उन सभी सीटों पर भाजपा वोटरों को राष्ट्रीय विकल्प देने की कोशिश में जुटी है| जुझारू नेता और पूर्व आईपीएस अन्नामलाई के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा तमिलनाडु में राष्ट्रीय पार्टी के रूप में कांग्रेस के विकल्प के रूप में उभर रही है|

कर्नाटक में जेडीएस के एनडीए में आने के बाद एनडीए के लिए अपनी पुरानी 25 सीटें बचाना मुश्किल नहीं होगा, हालांकि इस बार वह अपनी जीती हुई 25 सीटों में से 24 सीटें ही लड़ेगी| बाकी चार सीटें वह जेडीएस के लिए छोड़ देगी| तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति के विधानसभा चुनाव हारने के बाद भाजपा को लोकसभा चुनावों के बाद नया सहयोगी मिल सकता है| चुनावों के दौरान भी अंदरखाते आपसी समझ बन सकती है| इसी तरह आंध्र प्रदेश में भी तेलुगु देशम के साथ फिर से गठबंधन के आसार बन रहे हैं|

अब रही बाद पूर्व और पूर्वोतर की| इनमें चार राज्य भाजपा के लिए महत्वपूर्ण हैं| इस क्षेत्र की कुल 142 सीटों में से 68 भाजपा के पास हैं, जिनमें से 18 पश्चिम बंगाल, 17 बिहार, 11 झारखंड और 9 असम की सीटें है| ये चारों वे राज्य हैं, जहां इंडी एलायंस का सर्वाधिक प्रभाव हो सकता है| बंगाल में अगर कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और चारों वामपंथी दल मिल कर चुनाव लड़ें, तो भाजपा के लिए अपनी 18 सीटें बचाना मुश्किल हो सकता है|

इसी तरह बिहार में राजद, जदयू, कांग्रेस और सभी वामपंथी पार्टियां मिल कर चुनाव लड़ती हैं, तो 17 सीटें बचाना भाजपा के लिए मुश्किल हो सकता है| लेकिन भाजपा ने उत्तर प्रदेश की तरह बिहार में जातीय समीकरण इस तरह से बना लिए हैं कि वह अपना पुराना आंकड़ा बरकरार रख सकती है| झारखंड में कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा, राजद और कम्युनिस्ट पार्टियां पिछली बार भी मिल कर चुनाव लड़ीं थी, इसके बावजूद भाजपा 14 में से 11 सीटें जीतीं थीं, इस बार यह आंकड़ा बढ़ तो सकता है, घट नहीं सकता|

जहां तक असम का सवाल है, तो वहां भी इंडी एलायंस के बाकी दलों का कोई प्रभाव नहीं, सिर्फ कांग्रेस ही मायने रखती है। इसलिए असम में भी भाजपा को 14 में से 9 सीटें बरकरार रखना मुश्किल नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा ने भाजपा हाईकमान को 12 सीटें जीत कर देने का वादा किया है|

उड़ीसा में भारतीय जनता पार्टी पिछली बार 21 में से 8 सीटें ही जीत पाई थी, कांग्रेस को सिर्फ एक और बीजू जनता दल को 12 सीटें मिलीं थी| बीजू जनता दल इस बार भी कांग्रेस के साथ नहीं जा रहा| नवीन पटनायक को इंडी गठबंधन में शामिल करवाने की नीतीश कुमार की कोशिशें नाकाम हो चुकी हैं| अगर बीजू जनता दल भी इंडी एलायंस में शामिल हो जाता, तो उड़ीसा में आठ सीटें बचाना भाजपा के लिए मुश्किल हो सकता था| इसलिए 2024 की तस्वीर बिलकुल साफ़ है। जैसा कि प्रशांत किशोर कह रहे हैं, मोदी को 2024 में कोई खतरा नहीं है|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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