मतदान से उदासीन क्यों हो रहे हैं मतदाता?
Matdaan: भारत जैसे देश में जहां करीब साठ फीसदी आबादी युवा यानी पैंतीस साल से कम आयु वर्ग की है, जहां की साक्षरता दर अस्सी प्रतिशत के करीब है, जहां राजनीतिक जागरूकता का स्तर भी बेहतर स्थिति में है, वहां मतदान के कम होने के तात्कालिक कारण हो सकते हैं लेकिन मोटे तौर पर जनता की मतदान के प्रति बढती उदासीनता जिम्मेवार है।
भारत ने जिस संसदीय लोकतंत्र को अपनाया है, राजनीतिक दल उसके महत्वपूर्ण अंग हैं। हम अक्सर राजनीतिक दलों की साख का आकलन उनके नेतृत्व की साख की बुनियाद पर करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में हम राजनीतिक दलों के महत्वपूर्ण अंग उनके कार्यकर्ता की अहमियत को भुला देते हैं।

जिस लोकतंत्र को हमने स्वीकार किया है, उसमें राजनीतिक दल की प्रतिष्ठा का मूल आधार उसकी कामयाबी है, उसके कार्यक्रमों और सिद्धांतों का नंबर उसके बाद आता है। और राजनीतिक दल की कामयाबी नेतृत्व की साख और उसके कार्यक्रमों के साथ ही उसके कार्यकर्ताओं की सक्रियता की वजह से हासिल होती है।
राजनीतिक तंत्र का कार्यकर्ता वह औजार है, जो नेतृत्व की साख और उसके कार्यक्रमों को आम मतदाताओं तक पहुंचाता है। इस प्रक्रिया में नेतृत्व द्वारा दिखाए सपनों को वह मतदाताओं के मन में छलांग लगाने को प्रेरित करता है। स्थानीय स्तर पर चूंकि वह लगातार आम मतदाताओं के सीधे संपर्क में रहता है, उसके सुख-दुख में शामिल रहता है, इसलिए उसकी बात मतदाता कुछ ज्यादा ही गौर से सुनता है। मतदान के दिन अगर मतदाता वोटिंग के प्रति उदासीन हो रहा होता है, तब यह कार्यकर्ता ही अपने रोजाना के संबंधों के दम पर मतदाताओं को घर से बाहर निकालकर मतदान केंद्रों तक पहुंचाता है।
कार्यकर्ता भी दो तरह के होते हैं। कुछ राजनीतिक दल विचारधारा आधारित होते हैं। भारतीय जनता पार्टी और वामपंथी पार्टियों को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। इनके कार्यकर्ता प्रतिबद्ध होते हैं। उन्हें कैडर कहा जाता है। भारतीय जनता पार्टी अगर राष्ट्रीय स्तर पर आज चमक रही है तो उसमें उसके कार्यक्रमों और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व कौशल के साथ ही उसके कैडर का भी महत्वपूर्ण योगदान है। याद कीजिए पिछले दो आम चुनावों को। मनमोहन सरकार पर लगे चौतरफा भ्रष्टाचार के आरोपों, मंत्रियों और सांसदों की जेल यात्राओं, कोयला घोटाला, कॉमनवेल्थ खेल घोटाला आदि के साथ ही निर्भया कांड से देश में क्षोभ का माहौल था।
इस माहौल के बीच भारतीय जनता पार्टी के कार्यक्रमों और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के संदेश को घर-घर तक पहुंचाने में उसके कैडर का गहन योगदान रहा। जब उसके सामने चुनाव आए तो उसने बदलाव के लिए पूरे उत्साह से काम किया। इसका नतीजा यह रहा कि 2014 और 2019 के आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को लोगों का भरपूर समर्थन मिला। निश्चित तौर पर मोदी के करिश्माई और साखदार नेतृत्व ने लोगों को बीजेपी की ओर आकर्षित करने में बड़ी भूमिका निभाई। लेकिन इस बार पार्टी के उसी कैडर में उत्साह कम नजर आ रहा है। जमीनी स्तर पर विगत के दो आम चुनावों की तरह उसका उत्साह नजर नहीं आ रहा है।
सिर्फ बीजेपी ही नहीं, तमाम दलों के कार्यकर्ताओं में वैसा उत्साह नहीं दिख रहा। जिसका नतीजा कम मतदान के रूप में दिख रहा है। बेशक तीखी गर्मी की लहर के चलते मतदाता घरों से वोटिंग के लिए बाहर निकलने से हिचक रहा है। अगर कार्यकर्ताओं में उत्साह होता तो वह मतदाताओं को घरों से बाहर निकालने के लिए मेहनत करता। वह उन्हें उत्साहित करता। चुनावी पंडितों को लगता है कि कार्यकर्ताओं के एक वर्ग में मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से मोहभंग होता जा रहा है। कैडर आधारित पार्टियों के कार्यकर्ताओं में यह प्रवृत्ति कुछ ज्यादा नजर आ रही है।
महाराष्ट्र में मतदान में कुछ ज्यादा ही कमी दिख रही है। यह संयोग है या कुछ और कि वहां शिवसेना के दोनों धड़े और बीजेपी कैडर आधारित पार्टियां हैं। मतदान की कमी ज्यादातर उन सीटों पर दिख रही है, जहां शिवसेना के धड़े मुख्य मुकाबले में हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि शिवसेना का विभाजन कैडर को पसंद नहीं आया? कैडर आधारित पार्टियों के कार्यकर्ता दलों में बढ़ी आवाजाही से भी पसोपेश में हैं। कुछ महीने पहले तक जिसके खिलाफ वे मतदाताओं को लामबंद करने की कोशिश कर रहे थे, दलीय जरूरत की वजह से उन्हें अपनी पार्टी में शामिल कर लिया जाना प्रतिबद्ध कैडरों को पसंद नहीं आ रहा है। भले ही वे खुलकर न कह पा रहे हों, लेकिन आपसी बातचीत में वे पूछ रहे हैं कि क्या वे सिर्फ दरी और जाजम बिछाने के लिए ही हैं?
कम मतदान की एक वजह मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के प्रति आम मतदाताओं की अरूचि को भी माना जा रहा है। माना जा रहा है कि राजनीति के गिरते स्तर, बयानबाजियों में गिरती भाषा का प्रयोग, राजनीति में आदर्श चरित्रों की कमी आदि से मतदाताओं के एक वर्ग का मोहभंग हो रहा है। बेशक मौजूदा राजनीतिक तंत्र आज की व्यवस्थागत मजबूरी है। लेकिन उसमें प्रेरणा के बिंदु लगातार कम हो रहे हैं।
उखाड़ पछाड़ की संस्कृति राजनीतिक तंत्र का अहर्निश अंग बनती जा रही है। जनता के बुनियादी सवालों को लेकर राजनीतिक तंत्र में एक राय की कमी होती जा रही है। आज का मतदाता पहले की तुलना में तमाम तरह की सूचनाओं से कहीं ज्यादा लैस है, भले और बुरे की उसकी पहचान का आधार बढ़ा है। वैश्विक राजनीति और लोकतांत्रिक व्यवस्था से तुलना के लिए उसके पास संसाधन भी आज सहज उपलब्ध हैं। इस वजह से जब वह बेहतर मानव सूचकांक वाले देशों के नागरिक समाज से जब अपनी तुलना करता है तो खुद को बहुत पीछे पाता है।
दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में नागरिकों के जो अधिकार हैं, जो सहूलियतें हासिल हैं, संसाधनों पर उनका जैसा अधिकार है, उसकी तुलना में जब आज का मतदाता अपनी सहूलियतों और संसाधनों की तुलना करता है तो खुद को फिसड्डी पाता है, तब उसे अपनी राजनीतिक व्यवस्था से क्षोभ होता है। बेशक वह अपने मत की ताकत से नई सरकारें चुन सकता है। लेकिन व्यवस्था को बदल नहीं पाता। इस बिंदु पर वह खुद को असहाय पाता है। फिर उसका धीरे-धीरे राजनीतिक व्यवस्था से मोहभंग होने लगता है। उसकी उदासीनता बढ़ती है। चुनावी पंडितों के मुताबिक, मतदाताओं का एक वर्ग इस वजह से भी मतदान से दूर हो रहा है।
वैसे इस देश में खाए-अघाए लोगों का एक वर्ग ऐसा भी है, जो बरसों से मतदान के दिन महज छुट्टी पर चला जाता है। बेशक इस वर्ग की संख्या में कमी आई है। लेकिन अब भी मतदान को सैर सपाटा का दिन मानने वालों की कमी नहीं है। अगर ऐसे लोग अब भी हैं तो इसके लिए परोक्ष रूप से जिम्मेदार हमारी राजनीतिक व्यवस्था भी है।
घटते मतदान के कई और भी कारण हो सकते हैं, लेकिन मोटे तौर पर ये कारण ज्यादा समीचीन जान पड़ते हैं। बेहतर होगा कि राजनीतिक व्यवस्था इन वजहों पर विचार करे और इनके संदर्भ में बदलाव लाने की कोशिश करे। गरमी के दिनों में पानी और दवाई की व्यवस्था करके चुनाव आयोग वोटरों के एक वर्ग को लुभा तो सकता है, लेकिन राजनीतिक तंत्र में व्यापक बदलाव की पहल किए बिना शत प्रतिशत मतदान की ओर बढ़ना मुश्किल होगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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