गुजरात में भाजपा हार से दूर फिर भी आंतरिक संघर्ष से मजबूर
Gujarat BJP: 19 अप्रैल को गुजरात के अपने संसदीय क्षेत्र गांधीनगर में नामांकन करने पहुंचे केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने प्रदेश संगठन के नेताओं के साथ बैठक की। बैठक में मुख्यमंत्री भूपेन्द्र भाई पटेल, प्रदेश अध्यक्ष सीआर पाटिल और संगठन महामंत्री रत्नाकर भी मौजूद थे।
अमित शाह ने पूछा कि 'इस बार गुजरात में कैसी तैयारी है?' प्रदेश अध्यक्ष ने बड़े आत्मविश्वास से कहा कि गुजरात की सभी 26 सीटें जीतने जा रहे हैं।' प्रदेश अध्यक्ष के इस बयान के बाद मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल मंद मंद मुस्करा रहे थे। बैठक में मौजूद सभी वरिष्ठ नेताओं को लग रहा था कि अमित शाह संगठन की तारीफ करेंगे और शाबाशी देंगे।

अमित शाह ने गंभीरता से कहा कि "लगता है आप लोगों ने ठीक से काम नहीं किया है। मोदी के दस साल के कार्यकाल और कांग्रेस के बदहाल होने के बाद तो कांग्रेस की 24 और आप पार्टी की 2 सीटें मिलकर गुजरात में सभी 26 सीटों पर जमानत जब्त होना चाहिए। हम लगातार दो चुनाव से सभी सीटें जीत रहे हैं, इसमें आप नया क्या कर रहे हो?" शाह ने कहा, "काम पर लग जाइए और सुनिश्चित करिए कि कांग्रेस की सभी 24 और आप पार्टी की 2 सीटों पर जमानत जब्त हो जाए।"
अमित शाह भले ही 26 सीटों पर विपक्षी उम्मीदवारों की जमानत जब्त करने की बात कर रहे हों, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह का गुजरात इस बार भाजपा के लिए कुछ सीटों पर चुनौती भी खड़ी कर रहा है। चुनौती का मतलब यह है कि भाजपा की जीत का मार्जिन बेहद कम हो सकता है। हालांकि सूरत सीट देश की ऐसी पहली सीट बन गई जहां बिना चुनाव के ही भाजपा जीत चुकी है। लेकिन राज्य में कुछ सीटों पर कांग्रेस की चुनौती से ज्यादा भाजपा का आंतरिक संघर्ष पार्टी को परेशानी में डाल रहा है।
गुजरात जहां भाजपा से सिर्फ टिकट मिलना ही जीत की गारंटी माना जाता है, उस राज्य में साबरकांठा और बड़ोदरा से टिकट मिलने के बाद भी विरोध और विवाद के चलते पार्टी के घोषित उम्मीदवार को अपना टिकट लौटाने के लिए बाध्य होना पड़ा। पार्टी को कार्यकर्ताओं के दबाव के बाद दूसरे उम्मीदवार देने पड़े। विश्व हिंदू परिषद के पूर्व नेता भीकाजी ठाकोर को पहले साबरकांठा से भाजपा ने उम्मीदवार घोषित कर दिया था, लेकिन बाद में उन्होने चुनाव लड़ने से मना कर दिया। उनकी जगह साबरकांठा से भाजपा ने 2022 में कांग्रेस से भाजपा में आए महेन्द्र सिंह बरैया की पत्नी शोभना बरैया को उम्मीदवार घोषित कर दिया।
बड़ोदरा से सांसद रही रंजना बेन भट्ट का टिकट भी पार्टी कार्यकर्ताओं के विरोध के कारण बदलना पड़ा। उनके घर के सामने और भाजपा कार्यालय में जमकर प्रदर्शन हुए। पार्टी कार्यकर्ता आरोप लगा रहे थे कि रंजना बेन ने कोई काम नहीं किया उसके बाद भी लगातार तीसरी बार उनको टिकट क्यों दिया जा रहा है? इसी तरह सुरेन्द्रनगर सीट से भाजपा संगठन ने 2017 में कांग्रेस से भाजपा में आए चंदूभाई सेहोरा को उम्मीदवार बनाया। भाजपा कार्यकर्ताओं को यह नागवार गुजरा कि कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर कांग्रेस से आए चंदूभाई को टिकट दिया जाए। सुरेन्द्रनगर सीट पर जमकर विरोध हो रहा है और हालत यह है कि भाजपा प्रत्याशी को भाजपा कार्यालय में ही बैठक लेने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
विरोध की यही स्थिति अमरेली में भी नजर आ रही है, जहां मौजूदा सांसद नारन कछाड़िया की जगह जिला पंचायत अध्यक्ष भरत सुतारिया को टिकट दिए जाने के विरोध में दोनों गुटों में जमकर हिंसक झड़प हुई। वलसाड एसटी सीट पर भी भाजपा कार्यकर्ता ध्रुव पटेल को बाहरी बताकर विरोध कर रहे हैं और टिकट वितरण में लेन देन का आरोप लगा रहे है। जूनागढ और मोरबी सीट पर भी विरोध हो रहा है। कार्यकर्ताओं के बीच आपस में तलवार खिंची हुई है।
मोदी और शाह की गहरी पकड़ वाले गुजरात में भाजपा के भीतर ही सत्ता संघर्ष का ऐसा खुला खेल पहली बार देखने को मिला है। हालत की गंभीरता इस बात से लगा सकते है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अमित शाह को गुजरात जाकर मामले को संभालने के लिए कहना पड़ा। अमित शाह पार्टी विवाद को निपटाते इसके पहले ही मोदी सरकार में मंत्री और राजकोट से भाजपा के उम्मीदवार परषोत्तम रूपाला ने राजपूतों पर बयान देकर सिर्फ गुजरात के ही नहीं पूरे देश के राजपूतों को नाराज कर दिया।
राजपूतों पर विवादित बयान देने वाले परषोत्तम रूपाला पाटीदारों की एक उपजाति कड़वा पटेल समुदाय से आते हैं। गुजरात में कुल मतदाताओं में पाटीदारों की संख्या 14 से 16 फीसद है और राज्य की 26 में से 7 सीटों पर उनका काफी प्रभाव है। वहीं गुजरात के कुल मतदाताओं में क्षत्रिय मतदाता महज पांच से छह फीसदी ही हैं और 26 सीटों में से किसी भी सीट पर निर्णायक प्रभाव नहीं डाल पाते हैं। लेकिन देश के अन्य हिस्सों में राजपूतों के प्रभाव को देखते हुए भाजपा को राजपूत वोट खोने का डर सता रहा है। हालांकि रूपाला ने तीन बार माफी मांग ली है, लेकिन राजपूत समाज गुजरात में भाजपा को माफ करने के मूड में नहीं है।
भाजपा में भले ही आंतरिक असंतोष हो लेकिन गुजरात में कांग्रेस की हालत बेहद खराब है। संगठन के नेता एक एक कर भाजपा का दामन थाम रहे हैं। गुजरात का यह पहला लोकसभा चुनाव है, जब कांग्रेस को अहमद पटेल के बिना गुजरात में लड़ना पड़ रहा है। अहमद पटेल के बिना पूरा संगठन बिखरा बिखरा नजर आ रहा है। पोरबंदर से विधायक और कांग्रेस के दिग्गज नेता अर्जुन मोढवाडिया, गुजरात कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष और विधायक अमरीश डेर भाजपा में चले गए है। खंभात विधायक चिराग पटेल के अलावा 2019 में अमित शाह के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ने वाले सीजे चावड़ा ने भी भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली है।
हालांकि गुजरात में लगातार हार रही कांग्रेस ने बनासकांठा, साबरकांठा, आणंद, जामनगर, सूरत, सुरेन्द्रनगर, जूनागढ़ में भाजपा ने जिस जाति के नेता को प्रत्याशी बनाया है, कांग्रेस ने भी उसी जाति के नेता को टिकट दिया है ताकि लड़ती हुई दिखाई दे।
गुजरात में कांग्रेस और आप पार्टी में गठबंधन है। गुजरात में कांग्रेस 24 सीटों पर और आम आदमी पार्टी दो सीटों भरूच और भावनगर से लड़ रही है। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 17 सीटें मिली थी, उसमें भी कांग्रेस के 3 विधायक पार्टी छोड़ चुके हैं। अभी गुजरात में कांग्रेस के 14 विधायक हैं और इनमें से भी कई विधायक कब पाला बदल लें कुछ कहा नहीं जा सकता।
गुजरात की सभी 26 सीटों पर 7 मई को मतदान होना है। ऐसे में भाजपा भले ही आंतरिक असंतोष से गुजर रही हो लेकिन वह कोई सीट हार जाए इसकी संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती है। देखना यह है कि 2019 में पूरे देश में सबसे ज्यादा मतों से नवसारी से सीआर पाटील जीते थे, क्या इस बार भी वही जीतते हैं या भाजपा के चाणक्य अमित शाह गांधीनगर से सबसे ज्यादा वोटों जीतते है। गुजरात में कांगेस हार का मार्जिन कम करने की लड़ाई लड़ रही है तो अमित शाह कांग्रेस की जमानत जब्त करवाने की कोशिश कर रहे हैं। गुजरात में इससे ज्यादा की लड़ाई दिख नहीं रही है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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