Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

‘इंडिया शाइनिंग’ बनाम ‘चार सौ पार’

Chaar Sau Paar: उत्साह हमेशा अच्छा होता है लेकिन अति उत्साह अक्सर काम बिगाड़ देता है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में ताकतवर मंत्री और तब की भाजपा के रणनीतिकार प्रमोद महाजन को यही अति उत्साह भारी पड़ा था। 2004 के आम चुनाव में उन्होंने अटल सरकार की उपलब्धियां गिनाने के लिए "इंडिया शाइनिंग" का नारा दिया था।

चुनावी रणनीति के अनुसार देश के हर चौराहे, गली-मुहल्ले को इंडिया शाइनिंग के पोस्टरों और बैनरों से पाट दिया गया था। इन पोस्टरों में अटल सरकार की स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी उपलब्धियां गिनाई गयी थीं।

Chaar Sau Paar

लेकिन जब चुनाव परिणाम आये तो सभी प्रकार से अच्छे काम करने के बावजूद भाजपा कांग्रेस सहित क्षेत्रीय पार्टियों के सामने धराशायी हो गयी। उसे 138 सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस को 145 सीटें। इसके अलावा सीपीआईएम, डीएमके, समाजवादी पार्टी तथा राजद क्षेत्रीय ताकतें बनकर उभरीं और कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बना ली गई।

बाद में जब उस आम चुनाव का खुद भाजपा के लोगों ने विश्लेषण किया तो उन्हें समझ में आया कि प्रमोद महाजन का अति उत्साह भाजपा को भारी पड़ गया। इसके दस साल बाद 2014 में ही भाजपा दोबारा सत्ता में लौट पायी जब नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में उसने प्रचंड बहुमत हासिल कर लिया। लेकिन सवाल यह है कि प्रचंड बहुमत के साथ अपना दो कार्यकाल पूरा कर चुके नरेन्द्र मोदी ने भी 2024 में अति उत्साह में वही गलती तो नहीं कर दी है जो 2004 में प्रमोद महाजन ने की थी?

इस सवाल के अपने कारण हैं। आम चुनाव की घोषणा होने के पहले से ही 2024 के चुनाव को लेकर जो नरेन्द्र मोदी दिख रहे हैं, वह उसके पहले के दो आम चुनावों में नहीं दिखे थे। मसलन, इससे पहले नरेन्द्र मोदी ने खुद कभी अपने मुंह से यह मांग या दावा नहीं किया था कि अगली बार वो सरकार बनाना चाहते हैं या सरकार बनाने जा रहे हैं। यहां तक कि 2014 के चुनाव में पहली बार भाजपा को पूर्ण बहुमत से भी अधिक सीट दिलानेवाले नरेन्द्र मोदी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वो अपना काम करते हैं, परिणाम की चिन्ता नहीं करते।

उस समय उन्होने यह भी कहा था कि वो कभी एक्जिट पोल की भी चिंता नहीं करते कि कौन क्या कह रहा है। बकौल मोदी के वो तो परिणाम वाले दिन भी रिजल्ट में रुचि दिखाये बिना अपनी सामान्य दिनचर्या अनुसार काम करते हैं। किसी के भी द्वारा बोली जानेवाली यह भाषा उसके आत्मविश्वास को दर्शाती है कि वह जो कर रहा है उसकी सफलता को लेकर उसे रंचमात्र भी संदेह नहीं है। 2002 से 2019 तक नरेन्द्र मोदी का यही आत्मविश्वास दिखा और उन्हें लगातार जीत भी मिली है। भाजपा के लिए मोदी एक ऐसा खरा सिक्का बन गये कि चुनाव जीतने के लिए जिनका नाम ही काफी है।

लेकिन इस बार मोदी के व्यवहार में बदलाव दिख रहा है। पहली बार मंचों से वो खुद न केवल जनता से अपने लिए तीसरा कार्यकाल मांग रहे हैं बल्कि लगभग हर मंच से कांग्रेस के सत्ता में लौटने का डर भी दिखा रहे हैं। 2014 से 2024 में फर्क यह आया है कि मोदी के लिए जो बातें उनके समर्थक, उनका प्रचारतंत्र और उनकी पार्टी बोलती थी इस बार वो सारी बातें मोदी खुद बोल रहे हैं। मसलन पहली बार का नारा 'अबकी बार मोदी सरकार' हो या फिर दूसरी बार का नारा 'आयेगा तो मोदी ही' को खुद मोदी ने कभी मंच से नहीं दोहराया था। यह काम जमीन पर उनके समर्थक कर रहे थे।

लेकिन अब तीसरे कार्यकाल के लिए जब वो चुनाव मैदान में हैं तब उनके समर्थकों में ही वह उत्साह नहीं दिख रहा है जो बीते दो चुनावों में दिखता था। मानों समर्थकों ने भी मान लिया है कि जब मोदी अपनी योजना से चार सौ पार जा रहे हैं तो फिर उसको सक्रिय होने की क्या जरूरत है? अभी तक उत्तर भारत की जिन सीटों पर वोटिंग हुई है वहां मोदी चर्चा के केन्द्र में नहीं दिखाई दिये हैं। चुनाव के मुद्दे और चर्चाएं या तो हैं नहीं और अगर हैं भी तो स्थानीय हैं।

2014 के मोदी के प्रचार अभियान से इस बार एक और अंतर दिख रहा है कि वो अभी तक अपना वह चुनावी एजंडा सेट नहीं कर पाये हैं जिससे उनके समर्थकों और पार्टी वर्कर में जोश भर जाए। 'अबकी बार चार सौ पार' से उनके चुनावी अभियान की जो शुरुआत हुई वह मुस्लिम आरक्षण से होते हुए कांग्रेस, पाकिस्तान, चिट्ठी लिखकर हर बूथ पर कांग्रेस को हराने तक पहुंच गयी है। मोदी जो भी बोल रहे हैं या जो मुद्दे उठा रहे हैं उसमें कुछ भी ऐसा नहीं है जो नया हो। बीते दो चुनाव उन्होंने इन्हीं शब्दों के सहारे लड़ा था लेकिन तीसरी बार फिर से उन्हीं शब्दों को दोहराने से न तो विरोधियों को कोई खास फर्क पड़ रहा है और न ही समर्थकों में कोई उत्साह नजर आ रहा है।

इस बार एक बात और गौर करने लायक है कि राहुल गांधी जहां स्वतंत्र रूप से मुद्दे उठा रहे हैं, वहीं मोदी या तो उन मुद्दों का जवाब देने की को़शिश कर रहे हैं या फिर पूरे चुनाव को राहुल बनाम मोदी करने का प्रयास करते दिख रहे हैं। राहुल गांधी इस बार ज्यादा मैच्योर तरीके से प्रचार अभियान में हैं और मजाक बनने से अब तक बचे हुए हैं। वो इस तरह से मुद्दा उठा रहे हैं कि खुद मोदी को जवाब देना पड़ रहा है। यह राहुल गांधी द्वारा उठाये गये सवाल का ही असर है कि ऐन चुनाव के बीच राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू अयोध्या में रामलला का दर्शन करने पहुंच गयीं।

आखिरकार घूम फिरकर मोदी और भाजपा ने अपने सरकार की उपलब्धियां गिनाने की बजाय दस साल से सत्ता से बाहर बैठी कांग्रेस की नाकामियां गिनाना शुरु कर दिया है। वो कांग्रेस के सत्ता में लौटने का डर दिखा रहे हैं जिसकी फिलहाल 2024 में तो कांग्रेस को ही उम्मीद नहीं है। फिर भी चार सौ पार के जिस नारे से चुनाव अभियान की शुरुआत हुई थी वही भाजपा के गले की फांस बनता जा रहा है। अब अगर एनडीए को इससे कम सीटें आती है तो यही मोदी की हार घोषित हो जाएगी भले ही भाजपा-एनडीए को इतनी सीटें मिल जाएं कि वह सरकार बना ले।

बहरहाल, भाजपा के इस समय मुख्य रणनीतिकार अमित शाह का उत्साह कायम है और वो आज भी यही दावा कर रहे हैं कि 4 जून को जब मतगणना शुरु होगी उस दिन दोपहर 12 बजे तक एनडीए चार सौ का आंकड़ा पार कर लेगा। अब देखना यह होगा कि चार जून को भाजपा का इंडिया शाइनिंग वाला हाल होता है या सचमुच वह ऐतिहासिक जीत दर्ज करके सभी रिकार्ड तोड़ देती है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+