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ओपिनियन और एग्जिट पोल: हकीकत के कितने पास, कितने दूर

Opinion Poll: हर ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल शुद्ध वोटरों की राय नहीं होती, उसमें चुनाव का इतिहास, मीडिया से आ रही खबरों और हवा के रूख का घालमेल होता है| इसलिए 2014 के सारे ओपिनियन और एग्जिट पोल धरे रह गए थे, क्योंकि कोई भी जनता की नब्ज नहीं पहचान पाया था|

इतना अनुमान तो हर किसी को था कि भ्रष्टाचार के कारण देश की जनता कांग्रेस को वापस सत्ता में नहीं लाना चाहती, लेकिन ओपिनियन पोल का जमा घटाव करने वाले आम लोगों की इस राय पर भरोसा ही नहीं कर पाए कि भाजपा की इतनी बंपर जीत हो सकती है| क्योंकि भाजपा के इतिहास में सबसे लोकप्रिय नेता अटल बिहारी वाजपेयी 1999 में कारगिल युद्ध जीतने के बावजूद 182 से आगे नहीं बढ़ पाए थे, और 2004 में उन्हीं अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा हार भी गई थी|

Opinion Poll

1989 से त्रिशंकू नतीजे आ रहे थे, क्षेत्रीय दल मिलकर ढाई सौ सीटें जीत रहे थे, जबकि दोनों मुख्य प्रतिद्वंदी कांग्रेस और भाजपा मिलकर भी तीन सौ पर अटक रहे थे| इसलिए कोई भी सरकार बिना क्षेत्रीय दलों के समर्थन के बन ही नहीं पा रही थी| 2014 में ओपिनियन पोल का डाटा तैयार करने वालों की व्यक्तिगत राय भी उन्हें भाजपा को 200 पर रोक देती थी| आप पहले 2014 के चुनावों से कुछ महीने पहले हुए ओपिनियन पोल के नतीजे देख लीजिए, आप अंदाज लगा सकेंगे कि ओपिनियन पोल कंपनियों की धड़कने कितनी बढी हुई होंगी|

जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया था, लेकिन ऐसी हवा बन गई थी कि मोदी को प्रोजेक्ट करने की मांग बढ़ रही थी, तब भी अप्रेल मई 2013 में इंडिया टुडे के चैनल हैडलाइंस टुडे ने एक सर्वे करवाया था। उसके नतीजे थे कि अगर भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रोजेक्ट कर दिया, तो यूपीए 155 पर अटक जाएगा और एनडीए 220 सीटें हासिल कर लेगी|

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लेकिन यही सर्वे कह रहा था कि अगर भाजपा ने मोदी को प्रोजेक्ट नहीं किया तो यूपीए 209 सीटें हासिल करेगाऔर एनडीए 179 सीटें ही हासिल कर पाएगी| यानी मोदी को प्रोजेक्ट नहीं किया जाता, तो सरकार कांग्रेस की ही बनती, और मोदी को प्रोजेक्ट करने पर भी एनडीए को 52 सांसदों की जरूरत पड़ती, जो मोदी के नाम पर तो मिलते ही नही, या तो लाल कृष्ण आडवानी या राजनाथ सिंह या नितिन गडकरी प्रधानमंत्री बनते या फिर कोई एचडी देवेगौडा कांग्रेस की मदद से प्रधानमंत्री बनता| किसी ओपिनियन पोल में कोई एजेंसी जनता की नब्ज पकड़ ही नहीं पाई थी कि जमीन पर वास्तव में हो क्या रहा था|

मई 2013 में एबीपी ने नेलसन कंपनी से सर्वे करवाया, तो उसने यूपीए को 136 और एनडीए को 206 सीटें दीं| जुलाई में द वीक ने हंसा रिसर्च से सर्वे करवाया तो उसने यूपीए को 184 और एनडीए को 197 सीटें बताई और बाकी क्षेत्रीय दलों को 162 सीटें बताईं| जुलाई में ही सीएनएन-आईबीएन और हिन्दू अखबार ने मिल कर सी-एसडीएस से सर्वे करवाया| जिसने यूपीए को 149 से 157 के बीच, एनडीए को 172 से 180 के बीच और बाकी दलों को 209 से 224 सीटें बताई थीं| यानी तीसरे मोर्चे की सरकार बन रही थी|

जुलाई में ही टाईम्स नाऊ और इंडिया टूडे ने सी-वोटर से सर्वे करवाया, तो उसने यूपीए को 134 सीटें बताई, इनमें से कांग्रेस को 119 बताई थी, एनडीए को 156, जिसमें से भाजपा को 131 सीटें बताई थी| अक्टूबर 2013 में स्पष्ट हो गया था कि भाजपा मोदी को प्रोजेक्ट करने जा रहा है, तब भी सी-वोटर ने टाईम्स नाऊ और इंडिया टीवी के लिए सर्वे किया तो उसने यूपीए को 117, जिसमें कांग्रेस को 102, और एनडीए को 186, जिसमें भाजपा को 162 सीटें बताई थी| इसी कंपनी ने जनवरी 2014 में यूपीए को घटा कर 103 कर दिया, जिसमें कांग्रेस को 91, जबकि एनडीए को बढ़ा कर 212 जिसमें भाजपा को 188 सीटें बताई थीं| तब एबीपी- नेलसन ने यूपीए को 101 और कांग्रेस को 81, एनडीए को 226 और भाजपा को 210, बाकी दलों को 216 सीटें बताई|

जनवरी 2014 से अप्रेल 2014 तक आठ-दस सर्वे और हुए, जिनमें एनडीटीवी के लिए ओपिनियन पोल करने वाली हंसा रिसर्च कंपनी ने भाजपा को अधिकतम 226 सीटें दी थीं और एनडीए को 275 सीटों के साथ बहुमत की भविष्यवाणी की थी, इस सर्वे में भी कांग्रेस को न्यूनतम 92 सीटें बताई गई थीं| टाईम्स नाऊ- सी वोटर ने फरवरी 2014 में एक बार कांग्रेस को 89 सीटें बताई थी, लेकिन कांग्रेस को मिली उससे आधी 44 सीटें| भाजपा को वह अधिकतम 202 ही बता रहा था, जबकि भाजपा को मिली 282 सीटें और एनडीए को 336 सीटें|

यानी कोई भी सर्वे जमीनी हकीकत को समझ नहीं सका था| कोई इस हकीकत के नजदीक नहीं पहुंच सका कि भाजपा को अपने दम पर बहुमत मिल सकता है| लेकिन जब बात एग्जिट पोल की आई तो टाइम्स नाऊ-ओआरजी को छोड़कर बाकी सभी एग्जिट पोल एनडीए की स्पष्ट बहुमत से सरकार बनवा रहे थे, जिनमें हकीकत के सर्वाधिक नजदीक न्यूज-24 के लिए एग्जिट पोल करने वाला चाणक्य था, जिसने एनडीए को 340 सीटों की भविष्यवाणी की थी| लेकिन एग्जिट पोल के नतीजों से भाजपा और एनडीए के घटक दलों को छोड़ कर कोई अन्य दल विश्वास करने को तैयार नहीं था| बुद्धिजीवी वर्ग में बने भाजपा विरोधी इको-सिस्टम ने एग्जिट पोल को नकार दिया और नतीजे आते ही ईवीएम पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे|

2019 में ओपिनियन पोल कंपनियां फिर से फिसली हुई थी, ज्यादातर कंपनियां भाजपा को बहुमत देती हुई दिखाई नहीं दे रही थी, भाजपा को तो दो सौ से नीचे बता रही थी, सारे ओपिनियन पोल एनडीए को 225 से 285 के बीच रख रहे थे| 14 फरवरी 2019 को पाकिस्तानी आतंकवादियों ने पुलवामा में सेना के काफिले पर हमला किया था, उसके बारहवें दिन 26 फरवरी 2019 को भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान में घुस कर "ऑपरेशन बन्दर" कर दिया|

पाकिस्तान के बालाकोट पर हुए इस हमले को प्रधानमंत्री मोदी ने घर में घुस कर मारने की भारत की नई नीति घोषित कर दिया, तो देश की जनता गदगद हो गई थी| इसके बावजूद ओपिनियन पोल कंपनिया देश की जनता का मिजाज नहीं पहचान पाई, मार्च से लेकर 8 अप्रेल तक हुए सभी ओपिनियन पोल एनडीए को 264 से 285 तक अटकाए हुए थे, सात में से तीन ओपिनियन पोल तो ऑपरेशन बालाकोट के बाद भी एनडीए को बहुमत मिलने का अनुमान नहीं लगा रहे थे| जिन चार ने एनडीए को बहुमत मिलने की भविष्यवाणी की थी, वे भी एनडीए को 275 से 285 के बीच सीटें दे रहे थे।

यानी 2019 का हर ओपिनियन पोल कह रहा था कि भाजपा को तो स्पष्ट बहुमत मिल ही नहीं सकता, एनडीए की सरकार बन भी सकती है और नहीं भी| यहाँ तक कि एबीपी-नेलसन के एग्जिट पोल ने भी एनडीए को बहुमत नहीं दिया था, उसकी भविष्यवाणी एनडीए को 267 सीटें मिलने की थी| 2014 की तरह चाणक्य फिर सही साबित हुआ, जिसने एनडीए को 350 सीटें मिलना बताया था, और एनडीए को 353 सीटें मिलीं| आठ एग्जिट पोल में से तीन एनडीए को तीन सौ से नीचे बता रहे थे|

2014 और 2019 की तरह वही इको सिस्टम फिर सक्रिय है, इस बार कुछ ऐसे लोग खुल कर सामने आए हैं, जो पिछले दो चुनावों में पर्दे के पीछे रह कर अफवाहें फैलाने का काम करते थे| उसमें कुछ तो मुख्यधारा की पत्रकारिता का हिस्सा रहे यूट्यूबर भी जुड़े हैं| लेकिन इस बार के सभी ओपिनियन पोल तीसरी बार एनडीए की सरकार बनती देख रहे हैं| कोई भी ओपिनियन पोल एनडीए को 300 से कम सीटों की भविष्यवाणी नहीं कर रहा|

फरवरी 2024 के बाद कुल 14 ओपिनियन पोल हुए, इनमें से आठ ओपिनियन पोल एनडीए को 2019 से ज्यादा सीटें मिलने की बात कह रहे हैं, जबकि न्यूज 18 ने मार्च के अपने ओपिनियन पोल में एनडीए को 411 सीटें मिलने की बात कही थी| 2019 का चुनाव वास्तविक मुद्दों की बजाए काल्पनिक आशंकाओं को मुद्दे बनाकर लड़ा गया| जैसे मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बन गए, तो संविधान बदल जाएगा, उसमें से सेक्यूलर शब्द हटा दिया जाएगा और भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित कर दिया जाएगा, लोकतंत्र खत्म कर दिया जाएगा और यह आखिरी चुनाव होंगे, अनुसूचित जाति जनजातियों को मिलने वाला आरक्षण खत्म हो जाएगा|

दूसरी तरफ से भी काल्पनिक मुद्दे उठाए गए कि कांग्रेस सत्ता में आ गई, तो अनुसूचित जाति, जनजातियों और ओबीसी को संविधान से मिला आरक्षण बंद करके सारा आरक्षण मुसलमानों को दे दिया जाएगा| कांग्रेस मध्यमवर्ग की सम्पत्ति छीन कर मुसलमानों में बाँट देगी आदि| हर बार की तरह इस बार भी मणिशंकर अय्यर, सैम पित्रोदा और राहुल गांधी के कुछ बयान कांग्रेस के लिए नुकसान पहुँचाने वाले और भाजपा को फायदा पहुँचाने वाले साबित होते दिखाई दे रहे हैं|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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