क्या संभव है शत-प्रतिशत मतदान, क्या है समाधान?
Matdaan Pratishat: शनिवार को लोकसभा चुनावों का छठवां चरण सम्पन्न हुआ। जैसी कि अपेक्षा थी, इस बार भी कुल मतदान प्रतिशत साठ के आसपास ही रहा। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है भारत। लगभग 97 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं वाले देश में यह बात हैरान कर सकती है कि यहॉं करीब एक तिहाई मतदाता तो वोट डालते ही नहीं।
इन आम चुनावों में मतदान न करने वालों की संख्या और प्रतिशत बढ़ गया है। यह एक ऐसी समस्या है, जिसके कारणों और उपचार पर विचार बहुत आवश्यक है। वर्ना यह प्रतिशत आगे भी घटता जाएगा। ऐसे में सरकारें तो बनेंगी, लेकिन उनमें जनता की पसंद से ज्यादा उदासीनता का हाथ होगा।

इसलिए पहले उन कारणों पर विचार करना भी जरूरी है जो मतदाताओं को दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतांत्रिक उत्सव में भागीदारी को लेकर हतोत्साहित करते हैं। हमारे यहॉं जितने वोटर हैं, उतनी तो अधिकतर देशों की कुल जनसंख्या भी नहीं है। फिर भी यह सैलाब मतदान केंद्रों पर क्यों नजर नहीं आता ?
विश्लेषक अलग-अलग तरीकों से इस प्रश्न का उत्तर तलाशने का प्रयास करते हैं। कोई कहता है कि इस बार रिकॉर्डतोड़ गर्मी की वजह से मतदान में कमी आयी, जबकि गर्मी तो पश्चिम बंगाल में भी थी, वहॉं तो मतदान प्रतिशत लगातार देश में सबसे ज्यादा रहा है। उड़ीसा में भी रिकार्डतोड़ गर्मी है लेकिन वहॉं भी मतदान का प्रतिशत अन्य राज्यों से बेहतर है। बेशक, गर्मी एक कारण हो सकती है, लेकिन यह अकेला कारण नहीं हो सकती।
भारत दुनिया के सबसे गर्म देशों में से एक है, यहॉं साल का तीन चौथाई भाग गर्म या गर्मी जैसे माहौल में ही गुजरते हैं। क्या अपनी सामाजिक और राजनीतिक जिम्मेदारी का निर्वहन करने के लिए वे एक दिन भी असुविधा नहीं सह सकते? क्या वे अपनी व्यक्तिगत पसंद और प्राथमिकताओं को कुछ घंटे के लिए स्थगित नहीं कर सकते। कर सकते हैं, लेकिन करेंगे नहीं, क्योंकि उनके सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं है कि उन्हें वोट डालना ही है।
और भी कई व्यावहारिक कारण हैं, जो हमारे देश में मतदाता की इस उदासीनता के लिए उत्तरदायी कहे जा सकते हैं। जैसे कि मतदाताओं में जागरुकता का अभाव, जिसके चलते वह मतदान के महत्व और मतदान न करने के परिणाम के बारे में नहीं सोच पाता। दूसरा कारण विस्थापन हो सकता है। बड़ी संख्या में लोग काम के लिए अपने मूल स्थान को छोड़ दूसरे स्थानों पर रहते हैं और सिर्फ मतदान के लिए वापस आना उनके लिए संभव नहीं हो पाता।
इसके अलावा कुछ क्षेत्रों में, चुनावी हिंसा, धमकी या राजनीतिक अशांति का डर भी लोगों को मतदान प्रक्रिया में भाग लेने से हतोत्साहित कर सकता है। कुछ हद तक, वोटर लिस्ट में होने वाली गड़बड़ियों और बूथ पर नजर आने वाली बेइंतजामी को भी दोष दिया जा सकता है। लेकिन, देश भर में लाखों बूथों पर मतदान होता है, कुछेक जगह पर गड़बड़ हो सकती है, मतदाता सूची से नाम गायब हो सकते हैं, लेकिन यह मतदान न करने का बहाना तो नहीं बन सकता।
कुछ विचारक यह तर्क देते हैं कि जनता का राजनेताओं और राजनीतिक दलों से मोहभंग हो रहा है। जिस तरह से अधिकतर उम्मीदवार जीतने के बाद अपने क्षेत्र की समस्याओं का समाधान करना तो दूर सुध तक लेते नजर नहीं आते, उसे देखते हुए मतदाताओं में अरुचि होना स्वाभाविक है। उनकी इस बढ़ती बेरुखी का एक कारण कुछ जन प्रतिनिधियों का विजयोपरांत भ्रष्ट आचरण भी है। इसके चलते चुनावी प्रक्रिया में लोगों की रुचि कम हो रही है और वे मतदान को समय की बर्बादी मानते हैं।
लोकतंत्र में मतदाताओं के घटते विश्वास और रुचि का कमोवेश यही मंजर यूके, कनाडा, यूएस और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में भी देखने को मिलता है, जहॉं पिछले आम चुनावों में क्रमश: 67% व 66% मतदान दर्ज किया गया। लेकिन, वहीं फ्रांस, जर्मनी, ब्राजील और आस्ट्रेलिया जैसे देश भी हैं, जहॉं 74, 77, 79 व 92 प्रतिशत मतदान हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि इनमें सिर्फ आस्ट्रेलिया ही ऐसा देश है, जहॉं मतदान अनिवार्य है। 1924 से यहां मतदान न करने पर जुर्माने का प्रावधान है। हो सकता है कि यहॉं इतने ज्यादा मतदान प्रतिशत के पीछे यह भी एक कारण हो।
इसके अलावा उरुग्वे और लग्जमबर्ग जैसे देश भी मतदान न करने वाले नागरिकों पर जुर्माना लगाते हैं। लेकिन, कुछ अन्य देश हैं, जो इस मामले में ज्यादा सख्त हैं। जैसे बेल्जियम में जुर्माना लगाने के अलावा मतदान के अधिकार से वंचित किया जा सकता है, इक्वाडोर में सरकारी दस्तावेज हासिल करने में परेशानी का सामना कर पड़ सकता है, पेरू में कुछ समय के लिए नागरिक अधिकारों से वंचित किया जा सकता है।
कुछ लोग भारत में भी इसी सख्ती की वकालत करते हैं। लेकिन, आस्ट्रेलिया के अलावा उपरोक्त सभी देशों का अनुभव बताता है कि सख्ती से भी बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला। अधिक से अधिक दस-पंद्रह फीसदी मतदान और बढ़ जाएगा। दरअसल सख्ती से ज्यादा जरूरत है, मतदाताओं को यह समझाने की कि उनका वोट न डालना स्थिति में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं ला सकता। हालात बेहतर होंगे, उनके वोट से।
अधिकतर, हम देखते हैं कि राजनीतिक दल और उम्मीदवार मतदाताओं को लुभाने के लिए तरह-तरह की कवायदें करते हैं, लेकिन उनका लक्ष्य बस यही होता है कि वे उनके पक्ष में मतदान करें। वे यह कभी नहीं सोचते कि बूथ तक जाने या वहॉं अपनी बारी का इंतजार करने से मत डालने तक उन्हें किस तरह की असुविधा होती है और उससे कैसे बचा जाए। जैसे कि लंबी कतारें, इसका एक उदाहरण हैं।
प्रतिकूल मौसम में कतार में लगना बहुत असुविधाजनक होता है। इस समस्या को पंजाब में समझा गया और मतदाताओं के लिए मतदाता कतार सूचना प्रणाली लॉन्च की गई। अब एक जून को होने जा रहे अंतिम चरण के मतदान के दौरान मतदाता घर बैठे देख सकते हैं कि किस बूथ पर कितनी लंबी कतार है। इससे वे अपना प्रतीक्षा समय कम कर सकते हैं और देर तक कतार में लगे रहने की परेशानी से बच सकते हैं। इसके अलावा, उनके लिए पंखे, कूलर, छाँह के लिए शेड, ठंडे पानी और बैठने की व्यवस्था की जाएगी। यह एक छोटी सी, मगर महत्वपूर्ण पहल है। ऐसे और भी कई कदम उठाए जा सकते हैं।
इस दृष्टि से 'वन नेशन, वन इलेक्शन' का विचार भी मददगार साबित हो सकता है। लेकिन, हालात बदलने के लिए अकेला यही काफी नहीं है। समाज के सभी वर्गों में सत्ता और व्यवस्था के प्रति विश्वास पैदा करना, सभी के हित सुनिश्चित करना और उन्हें मतदान के महत्व के बारे में जागरुक करने के लिए नियमित अभियान चलाना जैसे कुछ उपाय भी मतदान प्रतिशत बढ़ान में सहायक हो सकते हैं।
इसके अतिरिक्त कानूनी रूप से मतदान अनिवार्य करने पर भी विचार किया जा सकता है। लेकिन, इससे पहले जरूरी है कि सभी को यह सुविधा मिले कि वे जहॉं हैं, वहॉं रहते हुए मतदान कर सकें। तकनीकी को अपनाने से यह संभव हो सकता है। ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी को अपनाकर लोगों को उनके मोबाइल या कम्प्यूटर से मतदान की सुविधा दी जा सकती है और यूनिक आईडी के इस्तेमाल से दोहरे मतदान को भी रोका जा सकता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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