Krishna Janmabhoomi: कृष्ण जन्मस्थान पर जारी रहेगी कानूनी जिरह

मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक नया फैसला दिया है। इस फैसले से कृष्ण जन्मस्थान को लेकर मथुरा की जिला अदालत में सुनवाई जारी रहेगी।

Krishna Janmabhoomi Allahabad HC transfer case back to mathura civil court

Krishna Janmabhoomi: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मई को मथुरा में 'श्रीकृष्ण विराजमान' और 'शाही ईदगाह मस्जिद' विवाद के मामले में अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने शाही मस्जिद ईदगाह ट्रस्ट, उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की याचिका पर हस्तक्षेप न करते हुए, सिविल कोर्ट मथुरा को विचाराधीन वाद तय करने का निर्देश दिया है। अब सिविल कोर्ट मथुरा इस वाद में दोबारा से सुनवाई शुरु कर सकेगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मथुरा की अदालत से यह भी कहा है कि वह इस केस से जुड़े पक्षकारों की सभी दलीलों और आपत्तियों पर विचार करने के बाद ही कोई फैसला पारित करे।

मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि से जुड़े मुकदमों का इतिहास भी कुछ वैसा ही पुराना है, जैसा राम जन्मभूमि मामले का रहा था। इस मामले में भी तमाम वैसे ही तर्क सुनाई देते हैं, जैसे तर्क आपने राम जन्मभूमि मामले के समय सुने होंगे। इस मामले से जुड़े कम से कम नौ ऐसे पुराने मामले हैं जिनकी बात की जा सकती है। इनमें से सबसे पहला होगा 15 मार्च 1832 को अताउल्ला खातिब नामक व्यक्ति द्वारा कलेक्टर की कोर्ट में दायर वाद। इसमें कहा गया था कि 1815 में पटनीमल के नाम कटरा केशवदेव की जमीन नीलाम की गई है, उसे निरस्त किया जाए और मस्जिद की मरम्मत करने की इजाजत दी जाए। उस समय कलेक्टर ने नीलामी को जायज ठहराया था और जबरन नीलामी रोकने की कोशिश सफल नहीं हुई।

इसके बाद 1897 में अहमदशाह ने कटरा केशवदेव चौकीदार गोपीनाथ के खिलाफ मथुरा थाने में मस्जिद की जमीन पर सड़क बनाने और रोकने पर मारपीट करने की रिपोर्ट दर्ज करा दी। इस मुकदमे को 12 फरवरी 1897 को मूर्खतापूर्ण बताकर निरस्त कर दिया गया। इस मामले में ये माना गया कि ईदगाह भी पटनीमल की संपत्ति है। यानि कि पटनीमल की संपत्ति पर समुदाय विशेष ने जबरन ईदगाह बनवा रखी थी।

एक महत्वपूर्ण मुकदमा 1920 में मुस्लिम पक्ष की ओर से दायर हुआ। इसमें काजी मोहम्मद अमीर ने कटरा केशवदेव के पश्चिम में स्थित गंगा जी के मंदिर पर हक जताया। ये बेतुका विवाद भी अदालत में ठहर नहीं पाया और निरस्त हुआ। इसके बाद चौथा मुकदमा 1928 में पटनीमल के वारिस राय कृष्ण दास ने मोहम्मद अब्दुल्ला खां पर किया। हिन्दुओं के पक्ष से हुए इस मुकदमे में कहा गया था कि मस्जिद के आसपास पड़े सामान का विपक्षी इस्तेमाल कर रहे हैं। न्यायालय में सिद्ध हुआ कि राय कृष्ण दास ही भूमि के स्वामी हैं। इसलिए अदालत ने फैसला दिया कि समुदाय विशेष वहाँ से कुछ भी नहीं ले सकते।

इसके बाद 1946 में मस्जिद पक्ष की ओर से पांचवां मुकदमा हुआ। इसमें बारीताला ने पंडित गोविंद मालवीय और मदनमोहन मालवीय आदि पर मुकदमा किया। इस मुकदमे में मदनमोहन मालवीय आदि को जमीन दिए जाने को अवैध बताया गया। इस बार भी समुदाय विशेष ने मुंह की खाई और फैसला पंडित गोविंद मालवीय आदि के पक्ष में आया। श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना के बाद भी उन्हें चैन नहीं पड़ा और छठा मुकदमा हुआ। श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट ने पंडित गोविंद मालवीय आदि का नाम कागजों में दर्ज कराने के लिए 27 सितंबर 1955 को म्युनिसिपल बोर्ड में एक प्रार्थना पत्र दिया था। इस आवेदन के खिलाफ अपील हुई और निरस्त हुई। इसके बाद एडीजे की कोर्ट में वाद दायर किया, लेकिन तब भी फैसला ट्रस्ट के पक्ष में ही आया।

श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ को शौकत अली आदि के खिलाफ 1960 में फिर से मुकदमा करना पड़ा। ये मुकदमा इसलिए करना पड़ा था क्योंकि फैसलों के बाद भी समुदाय विशेष के लोग जमीन से हटे नहीं थे। इस सातवें मुक़दमे के फैसले में अदालत ने कहा कि जो लोग वहाँ से नहीं हट रहे, उनकी अचल संपत्ति न्यायालय को सौंप दी जाए। अगले ही वर्ष 1961 में आठवां मुकदमा शौकत अली एवं अन्य 16 लोगों ने श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ पर कर डाला। एडिशनल सिविल जज की अदालत में हुए इस मुकदमे में मुंसिफ कोर्ट के मुकदमे को रोकने की मांग की गई। न्यायालय ने कहा कि पूर्व भूस्वामी राय कृष्ण दास को जो अधिकार प्राप्त थे, वह अब श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट के पास होंगे। बुद्धू एवं खुट्टन के खिलाफ श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ को 1965 में जल कर न देने का मुकदमा करना पड़ा। जब चार वर्ष बाद फरवरी 1969 में इसका फैसला आया तो वो भी श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ के पक्ष में था।

नए मुकदमों की बात करें तो श्रीकृष्ण जन्मस्थान मामले में फिलहाल 15 वाद दायर हो चुके हैं, जिसमें तीन वाद पैरवी न होने के कारण खारिज कर दिए गए। महेंद्र प्रताप सिंह के दो वाद, विष्णु गुप्ता और आशुतोष पांडेय, दिनेश शर्मा, जितेंद्र सिंह बिसेन, गोपाल गिरि, अनिल त्रिपाठी, पवन शास्त्री, मनीष यादव, और कौशल किशोर ठाकुर के वाद न्यायालय में चल रहे हैं। शैलेन्द्र सिंह का वाद जो बंद हो गया था, उसे शैलेन्द्र सिंह ने फिर से आवेदन देकर खुलवाने की मांग की है।

अभी जो फैसला आया है उसमें हार होने पर भी समुदाय विशेष फैसले को अपनी जीत बताने पर तुला है। जिला जज ने अपने आदेश में ही कह दिया था कि रंजना अग्निहोत्री का वाद पूजा स्थल (विशेष) अधिनियम - 1991 और परिसीमा अधिनियम - 1963 से बाधित नहीं है। जब मामला उच्च न्यायालय में पहुंचा तो जस्टिस प्राडिया ने जिला न्यायाधीश के 19 मई के आदेश को निरस्त करने से मना कर दिया।

सितम्बर 2020 में भगवान श्रीकृष्ण विराजमान की ओर से श्रीकृष्ण जन्मभूमि ने रंजना अग्निहोत्री के माध्यम से मुकदमा दायर करके 1974 में अस्तित्व में आये श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान और शाही ईदगाह ट्रस्ट के बीच 1973 के समझौते को निरस्त करने की मांग की थी। क्योंकि इससे 1964 का एक पूर्व में दायर विवाद का फैसला बाधित होता है। इस मामले पर सुनवाई का मतलब उस समझौते को चुनौती है जिसके तहत आश्चर्यजनक रूप से मंदिर की 13.37 एकड़ भूमि बिना वजह ही उठाकर ईदगाह और मस्जिद को दे दी गयी।

मंदिर की संपत्ति का सरकारों द्वारा अपने मनमुताबिक इस्तेमाल कोई नयी बात नहीं है। अज्ञात कारणों से मस्जिद, चर्च और गुरूद्वारे तो सरकारी हस्तक्षेप से सुरक्षित हैं लेकिन हिन्दुओं के मंदिरों को ऐसी कोई सुरक्षा बिना अदालत की दखलंदाजी के नहीं मिलती। उम्मीद की जानी चाहिए कि बदलते दौर में ऐसे फैसलों से बदलाव आयेंगे।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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