Student Suicides: परीक्षाओं में पिछड़ना जीवन की हार नहीं
Student Suicides: 15 अगस्त को जब देश स्वतंत्रता दिवस मना रहा था उस दिन कोटा में एक विद्यार्थी ने खुदकुशी कर ली। अगस्त के महीने में कोटा के अंदर किसी छात्र की आत्महत्या का यह चौथा मामला था। इस वर्ष जनवरी से लेकर अब तक कोटा में छात्रों द्वारा आत्महत्या के मामलों की संख्या 20 हो गई है। अगस्त के महीने में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ निवासी मनीष प्रजापति (17), बिहार के मोतिहारी निवासी भार्गव मिश्रा (17), उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले के मनजोत छाबड़ा (18) और बिहार के गया जिले के 18 वर्षीय छात्र वाल्मीकि प्रसाद की खुदकुशी का मामला सामने आया है।
कोटा के कोचिंग संस्थानों में पढ़ने आये विद्यार्थियों की आत्महत्या का मामला कितना संवेदनशील है, वह इसी बात से समझा जा सकता है कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप किया है। कोटा में हो रही आत्महत्याओं पर चिंता जाहिर करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि "बच्चों की आत्महत्या को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है।" उन्होंने तत्काल एक कमेटी का गठन भी किया है जो 15 दिनों के अंदर स्टूडेंट्स द्वारा की जानेवाली आत्महत्या पर रिपोर्ट देगा।

सामान्यतया 12 वीं की परीक्षा देकर जब स्टूडेंट्स कोटा पहुंचते हैं तो उनकी उम्र 16, 17, 18 वर्ष होती है। इतनी छोटी उम्र में प्रतियोगी परीक्षा में सफलता हासिल करने के दबाव को संभाल पाना बहुत आसान नहीं होता। कोटा पिछले कुछ सालों से छात्रों के बीच सफलता की प्रतिस्पर्धा के नाम पर तनाव से होने वाली दुर्घटनाओं की प्रयोगशाला बन गया है। इस छोटे से शहर में तीन लाख ऐसे बच्चे तैयारी कर रहे हैं, जो डॉक्टर या इंजीनियर बनना चाहते हैं।
नीट और जेईई में कामयाब होने वाले 08 से 10 प्रतिशत छात्र कोटा से आते हैं, इसलिए प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों के बीच कोटा लोकप्रिय हो चुका है। इसका सक्सेस रेट देश के दूसरे शहरों के मुकाबले सबसे अधिक है। अपनी इस सफलता को बनाए रखने के लिए कोटा के कोचिंग सेंटर छात्रों पर बहुत दबाव बनाकर रखते हैं। इस तरह वहां पढ़ने वाले छात्र कोचिंग सेंटर और अभिभावक नाम के दो पाटों के बीच पिसता रहते हैं। उनका यह तनाव आत्महत्या करने वाले छात्रों की चिट्ठियों में भी कई बार जाहिर हुआ है।
आईआईटी की स्वागत योग्य पहल
ऐसे माहौल में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), दिल्ली ने एक स्वागतयोग्य पहल की है। उसने अपने मिड सेमेस्टर की परीक्षाओं में से एक सेट हटाया है। इस तरह उसने अपनी मूल्यांकन प्रणाली में सुधार किया है, जिसकी देश भर में चर्चा हो रही है। इसका मतलब हुआ कि अब आईआईटी के छात्रों को रेग्यूलर इवैल्युएशन के अलावा परीक्षा के केवल दो सेट देने होंगे। उन्हें ऐसा इसलिए करना पड़ा क्योंकि आईआईटी के छात्रों के बीच भी आत्महत्या की घटनाएं अचानक बढ़ गई थीं। इसके पीछे की एक बड़ी वजह एकेडमिक प्रेशर बताया जा रहा था।
आईआईटी हैदराबाद का छात्र धनवड़ कार्तिक नाईक (21), दिल्ली आईआईटी का छात्र आयुष आसना (20), आईआईटी मद्रास का छात्र केदार सुरेश चौगले (21) की आत्महत्या का मामला इसी साल का है। वर्ष 2018 से 2023 के बीच में सिर्फ आईआईटी परिसर में 39 आत्महत्याओं के मामले सामने आएं हैं।
छात्रों के साथ अभिभावकों की भी हो काउंसलिंग
माना जा रहा है कि आईआईटी ज्वॉइन करने के बाद छात्र यहां के एग्जाम प्रेशर से डील नहीं कर पा रहे थे। कई बार वे इतने तनाव में आ जाते हैं कि बात जान देने तक पहुंच जाती है। अब आईआईटी और कोटा पर हो रही चर्चा के चलते इस समस्या की तरफ पूरे देश का ध्यान गया है, तब एक सच यह भी है कि छात्रों पर दबाव आईआईटी में दाखिले के बाद नहीं पड़ता बल्कि दबाव का माहौल उससे कई साल पहले से परिवार में ही बनना शुरू हो जाता है।
बात सिर्फ आईआईटी तक की नहीं है। मेडिकल, सिविल सर्विसेज, सीए, एसएससी इत्यादि जिस भी प्रतिस्पर्धा में छात्र अपना भविष्य देख रहा होता है, वहां अभिभावकों के सपनों का दबाव उसे बोनस में मिलता है। जब हम देशभर में प्रतिस्पर्धा में शामिल और उसमें सफल हुए छात्रों के सफलता और असफलता के बीच अनुपात का अंतर देखते हैं तो पाते हैं कि आज प्रतिस्पर्धा में शामिल छात्रों के साथ साथ काउंसलिंग की जरूरत उनके अभिभावकों को भी है क्योंकि जितने छात्र परीक्षा के बाद सफल होते हैं, असफल होने वाले छात्रों की संख्या उनसे कई गुना अधिक है।
सफल और असफल छात्रों के बीच है भारी अंतर
भारत में मध्यम वर्गीय परिवारों में इस समय बच्चों को सबसे अधिक इंजीनियर और डॉक्टर बनाने का ही चाव है। बच्चा चार-पांच साल का हुआ नहीं कि परिवार में सुनने को मिलता है कि हमारा मुन्ना तो इंंजीनियर बनेगा, हमारी मुन्नी डॉक्टर बनेगी। विश्व बैंक के 2020 के एक आंकड़े के अनुसार भारत में डॉक्टर और इंजीनियर की मिलाकर कुल संख्या 0.7 प्रतिशत है। अब डॉक्टर और इंजीनियर बनने के आंकड़े को थोड़ा विस्तार से समझते हैं। भारत में डॉक्टर बनने के लिए नीट (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट) की परीक्षा अनिवार्य है। वर्ष 2023 में 20 लाख 38 हजार 500 छात्रों ने नीट की परीक्षा दी। लगभग साढे ग्यारह लाख छात्रों ने नीट की परीक्षा पास की और सरकारी अस्पतालों में सीट मात्र एक लाख ही हैं। इस तरह मेडिकल करने की इच्छा रखने वाले 10 लाख बच्चों को इस वर्ष कोई सरकारी कॉलेज नहीं मिला।
जिन एक लाख बच्चों का चयन हो गया, उनकी राह भी आगे आसान नहीं है। उन्हें कड़ी मेहनत से गुजरना है। अच्छा रैंक लाना है। दूसरी तरफ वे 19 लाख छात्र जिनका चयन इस वर्ष नहीं हो पाया, उनके सामने निराशा ही होगी। ऐसे छात्रों को अपने परिवार से संबल और अच्छा व्यवहार चाहिए। जिन अभिभावकों ने बच्चे के अच्छे कॅरियर पर बहुत सारा पैसा निवेश किया होता है, उनके लिए भी कई बार खुद को संभाल पाना बहुत मुश्किल होता है। वो अपने बच्चे को असफल होते नहीं देखना चाहते लेकिन यहां अभिभावकों को भी समझना होगा कि वे छात्र के अच्छे भविष्य पर निवेश कर रहे हैं। वे किसी हॉर्स राइडिंग क्लब के घोड़े पर दांव नहीं लगा रहे हैं। जहां एक घुड़दौड़ में घोड़े के आगे निकलने या पिछड़ जाने से हार और जीत का निर्णय हो जाएगा।
बात सिर्फ मेडिकल की परीक्षा की नहीं है। मेडिकल में होने वाली नीट की परीक्षा की तरह इंजीनियरिंग की परीक्षा के लिए अखिल भारतीय स्तर पर जेईई (ज्वाइंट एंट्रेंस एग्जाम) का आयोजन होता है। जेईई परीक्षा से जुड़े 2022 के आंकड़े बताते हैं कि देशभर में 10 लाख 26 हजार 799 छात्र परीक्षा में बैठे। इनमें से 2.5 लाख छात्रों को दाखिले के लिए कॉलेज मिल गया। बाकि लगभग 8 लाख छात्र इंजीनियर नहीं बन पाए।
इसी तरह देश में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षा में बैठने वाले छात्रों की भी संख्या कम नहीं है। इसी परीक्षा में उतीर्ण होकर छात्र आईएएस और आईपीएस बनते हैं। इसलिए छात्रों में इसका आकर्षण बहुत ज्यादा है। इस परीक्षा में प्रत्येक साल 10 लाख छात्र बैठते हैं, जिनमें एक हजार का ही चयन होता है। सीए फाउंडेशन की परीक्षा में बैठने वाले छात्र लगभग एक लाख हैं, जिनमें 2000 से 2500 बच्चे ही सीए बन पाते हैं।
निराशा में जा रहे छात्रों के लिए उठाना होगा ठोस कदम
छात्रों के बीच आत्महत्या की बड़ी वजह नाकामी को ही माना गया है। यह नाकामी परीक्षा को लेकर हो सकती है, अपने अभिभावकों की अपेक्षाओं पर खरा न उतरने की हो सकती है। हमें अभिभावक के तौर पर अथवा शिक्षक के नाते सबसे पहला सबक अपने बच्चे को यही सिखाना चाहिए कि नाकामी का सामना कैसे करें? यह परिवार प्रबोधन से लेकर विद्यालय के पाठ्यक्रम तक में सबसे महत्वपूर्ण अध्याय होना चाहिए लेकिन इसकी तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता। जिसे छात्र अपनी नाकामी मान रहे हैं, हो सकता है कि उनकी सफलता की दिशा कोई और हो। जिसे वे नाकामी समझ रहे हैं, वह एक अवसर भी हो सकता है, खुद को जानने का और अपनी सफलता की सही दिशा तय करने का।
कोटा से लेकर इंजीनियरिंग और मेडिकल संस्थानों को अपने बीच निराशा में जा रहे छात्रों को बाहर लाने के लिए एक मजबूत शिकायत निवारण प्रणाली बनाने पर काम करना होगा, जहां मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग सेवा और विद्यार्थियों में तनाव जैसी समस्याओं से लड़ने की शक्ति जागृत करने पर मजबूती से काम किया जाए। उन्हें यह समझाने और अभिभावकों को यह समझने की जरूरत है कि प्रतियोगी परीक्षा में सफलता या असफलता जीवन की सफलता या असफलता तय नहीं करता। प्रतियोगी परीक्षा एक खेल की तरह है, जिसे हमें पूरी ईमानदारी से खेलना है। साथ ही यह भी याद रखना है कि किसी खेल में हार जाना जीवन में हारना नहीं होता।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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