Kempegawda Statue: टीपू को जानने वाले भारतीय क्या केम्पेगौड़ा को भी जानते हैं?

Kempegawda Statue, शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने कर्नाटक दौरे पर बेंगलुरु में केम्पेगौड़ा एयरपोर्ट के दूसरे टर्मिनल का उद्घाटन तथा नादप्रभु केम्पेगौड़ा की विशाल मूर्ति का अनावरण किया।

 Kempegowda Statue Narendra Modi unveils Statue of Prosperity

कर्नाटक का नाम आने पर हमारे मन में तत्काल हैदर अली और टीपू सुल्तान का नाम उभरता है, क्योंकि वही हमें पढ़ाया गया है लेकिन क्या हम जानते हैं कि आज जिस बेंगलुरु (प्रचलित नाम बैंगलोर) के कारण कर्नाटक की पहचान है, उसका संस्थापक कौन था? वह नादप्रभु केम्पेगौड़ा कौन थे जिनकी प्रतिमा का अनावरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया है।

बेंगलुरु में केवल एयरपोर्ट का ही नाम केम्पेगौड़ा के नाम पर नहीं है बल्कि शहर के व्यस्त बस अड्डे, प्रमुख मेट्रो स्टेशन और प्रमुख सड़क का नाम भी केम्पेगौड़ा पर ही है। इनके नाम केम्पेगौड़ा पर इसलिए रखे गए हैं क्योंकि वर्ष 1537 में उन्होंने ही बेंगलुरु शहर की नींव रखी थी।

यह सम्मान तो उन्हें मिलना ही चाहिए लेकिन क्या आप जानते हैं कि बस स्टेशन का निर्माण भी एक ऐसी झील को पाटकर बनाया गया है जिसका निर्माण केम्पेगौड़ा के समय में किया गया था। इस झील का नाम धर्मनबुद्धि किसने रखा ये तो पता नहीं लेकिन बंगलौर के संस्थापक कहे जाने वाले केम्पेगौड़ा ने अगर उस समय बंगलौर पेठे और अपने किले के आसपास हजार झीलों की कल्पना की थी, तो जरूर ये धर्मबुद्धि ही रही होगी।

उनकी इसी धर्मबुद्धि के कारण बंगलौर को झीलों और बगीचों का शहर कहा जाता था। लेकिन आधुनिक बुद्धि धर्मबुद्धि पर ऐसी हावी हुई कि उसने धर्मनबुद्धि नामक झील को ही पाट दिया। हां, शायद कोई राजनीतिक लाभ हानि या फिर केम्पेगौड़ा को सम्मान देने का भाव रहा होगा इसलिए उनकी बनाई झील को पाटकर जो बस स्टेशन बनाया उसे केम्पेगौड़ा का ही नाम दे दिया। शायद इतना करने से पाप कुछ कम हो गये होंगे। केम्पेगौड़ा द्वारा बनवायी गयी झील मिटाकर भी कम से कम केम्पेगौड़ा का नाम बस स्टेशन के कारण तो जिन्दा ही रखा।

बेंगलुरु को झीलों का शहर कहा जाता है और इसको झीलों का शहर बनाने वाले विजयनगर साम्राज्य के सरदार और स्थानीय राजा केम्पेगौड़ा प्रथम थे। ऐसा कहा जाता है कि 1537 में उन्होंने जहां वर्तमान बेंगलुरु बसा है वहां एक मिट्टी का किला और सवा दो वर्गकिलोमीटर में बेंगलुरु पेठे का निर्माण करवाया था। इसी के आसपास उन्होंने एक हजार झीलें बनवाई और सैकड़ों बगीचे लगवाये थे। इसलिए केम्पेगौड़ा को वर्तमान बेंगलुरु का संस्थापक कहा जाता है।

वोक्कालिग्गा समुदाय के केम्पेगौड़ा ने इस क्षेत्र पर 56 साल राज किया था। 27 जून 1510 को उनका जन्म वर्तमान बेंगलुरु के एक उपनगर येलहंका में हुआ था। उस समय येलहंका ही गौड़ा की राजधानी थी जिसे केम्पेगौड़ा वहां से दूर बेंगलुरु ले गये और वहां एक किला तथा बंगलुरू पेठे का निर्माण करवाया। कन्नड़ में पेठे का अर्थ बाजार होता है। सवा दो वर्ग किलोमीटर में उन्होंने इस बाजार का निर्माण करवाया था जहां हर प्रकार के व्यापार की सुविधा प्रदान की जाती थी।

इस बंगलुरु पेठे में हर प्रकार के व्यापार के लिए अलग बाजार बनाया गया था। जैसे कपड़ों के व्यापार के लिए चिक्कापेठे और नागरथ पेठे, चूड़ियों और वाद्ययंत्रों के लिए बालेपेठे, अनाज व्यापार के लिए थेरागुटपेठे, फूल व्यापार के लिए कब्बोनपेठे। इसी तरह तेल निकालने वाले के लिए, कपड़ा बुननेवाले के लिए, आभूषण बनाने वाले के लिए भी अलग अलग बाजार बनाये गये थे। केम्पेगौड़ा की इस व्यावयासिक सोच के कारण उन्हें King of prosperity अर्थात समृद्धि का राजा भी कहा जाता है।

कैम्पेगौड़ा के शासन के बाद बेंगलुरु पर हैदर अली और टीपू सुल्तान ने भी शासन किया। इन्होंने केम्पेगौड़ा द्वारा बनवाये गये लाल किला की मरम्मत भी करवाई। लेकिन बेंगलुरु का जो व्यावसायिक चरित्र केम्पेगौडा ने निर्धारित किया था, वह आज भी लगभग बरकरार है।

हां, बंगलौर के आधुनिक विकास क्रम में वहां के पर्यावरण और झीलों का बहुत नुकसान हुआ है। हजार झीलों वाला शहर अब सौ झीलों का शहर भी नहीं रह गया है इसमें भी सिर्फ 6 झीलें ऐसी हैं जिन्हें प्रमुख झीलें बताकर बचा लिया गया है। इस साल बेंगलुरु में जब बाढ आयी तो शहर के कई मंहगे इलाके पानी में डूब गये। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि यहां मंहगी कालोनियों को बनाने के लिए यहां की झीलों और तालाबों को पाटकर वहां कंक्रीट का निर्माण कर दिया गया था। जब भी भारी वर्षा होती है तो केम्पेगौड़ा का बसाया बेंगलुरु इसी तरह डूब जाता है।

केम्पेगौड़ा का नाम तो खैर भुला ही दिया गया था क्योंकि कर्नाटक से बाहर कर्नाटक की जब चर्चा होती है तो टीपू सुल्तान की उपलब्धियों का बखान ही किया जाता है। ऐसे में केम्पेगौड़ा एयरपोर्ट को भी लोग उस जगह का नाम ही समझते हैं। किसी को अंदाज भी नहीं लगता कि आज की सिलिकॉन वैली कही जाने वाली ये घाटी उसी कैम्पेगौड़ा ने बसाई थी जिनकी प्रतिमा का आज मोदी ने अनावरण किया है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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