Kashi Vishwanath: क्या काशी दोहरा रही है अयोध्या का इतिहास?
Kashi Vishwanath: काशी में ज्ञानवापी आने से पहले अयोध्या की राम जन्मभूमि चलते हैं। वह साल था 1986।
फैजाबाद जिला अदालत में एक याचिका आयी जिसमें निवेदन किया गया था कि रामलला जन्मस्थान पर हिन्दुओं को पूजा पाठ करने की अनुमति दी जाए और वहां लगा ताला खोल दिया जाए।

उस समय जो जज थे उन्होंने इस मामले की छानबीन की तो पता चला कि वहां रामजन्मभूमि परिसर में ताला लगाने का तो कोई वैधानिक या प्रशासनिक आदेश ही नहीं है। फिर वहां ताला लगा क्यों है? 1949 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जीबी पंत के मौखिक आदेश पर ताला लगाया गया था लेकिन लिखित आदेश की कोई प्रति जिला प्रशासन के पास मौजूद नहीं थी। जिला जज केएम पांडेय ने आदेश दिया कि जब ताला लगाने का कोई आदेश ही नहीं है तो वहां ताला लगाकर रखने का औचित्य क्या है? इसके बाद अयोध्या के मस्जिद ए जन्मस्थान में रामलला विराजमान का ताला खोल दिया गया।
अब कुछ ऐसी ही घटना काशी में घटित हुई है। 1992 में जब रामलला जन्मस्थान को कारसेवकों ने अतिक्रमण से मुक्त करवा लिया तब उस समय उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार को केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने बर्खास्त कर दिया था। इसके बाद राज्य में मुख्यमंत्री बने मुलायम सिंह यादव।
उत्तर प्रदेश में जहां इन मुद्दों से बीजेपी का हिन्दू वोट बैंक मजबूत हो रहा था, वहीं मुलायम सिंह यादव मुस्लिम वोटबैंक मजबूत करने में जुटे थे। अयोध्या में गोलीकांड करनेवाले मुलायम ने काशी के ज्ञानवापी में भी हिन्दुओं के प्रवेश पर तालाबंदी करवा दी। ज्ञानवापी परिसर में मंदिर को तोड़कर बनी मस्जिद की सुरक्षा बढ़ा दी गयी और उस सुरक्षा घेरे के अंदर हिन्दुओं के प्रवेश पर रोक लगा दी गयी।
उस समय तक हिन्दू समुदाय उस परिसर में मां श्रृंगार गौरी का पूजन करता था जो पुराने मंदिर के अवशेष पर खड़ी मस्जिद की पश्चिमी दीवार पर है। क्योंकि वह मंदिर की वही पुरानी दीवार है जिसे तोड़कर उस पर तीन गुंबद वाली मस्जिद बनायी गयी थी इसलिए श्रद्धालु वहां मां श्रृंगारगौरी का पूजन करते आ रहे थे। मुस्लिमों ने भी कभी इस पर कोई आपत्ति नहीं की थी। इसी के साथ ज्ञानवापी परिसर में ही स्थित तीन तहखानों में दो मुस्लिम पक्ष के पास थे और एक काशी के व्यास परिवार के पास था। इसे व्यासजी का तहखाना कहा जाता था जहां उनका परिवार नियमित पूजा पाठ करता था।
1993 से पहले तक यह सब सुचारु रूप से हो रहा था और दोनों पक्ष लगभग एक दूसरे के हक को स्वीकार कर चुके थे। व्यास जी के तहखाने में तो देशी विदेशी पर्यटक भी आते जाते थे। लेकिन 1993 में मुलायम सिंह यादव सरकार ने श्रृंगार गौरी के पूजन को वर्ष में एक बार सीमित कर दिया और व्यास जी के तहखाने पर ताला मारकर उन्हें बाहर निकाल दिया।
हाल ही में 31 जनवरी को वाराणसी जिला जज अजय कृष्ण विश्वेश ने फैसला सुनाया तो ठीक वही बात बोली जो 1986 में अयोध्या मामले में वहां के जिला जज केएम पांडेय ने कही थी। जज अजय विश्वेश ने पाया कि 1993 में व्यासजी के तहखाने को बंद करने का कभी कोई लिखित आदेश ही पारित नहीं हुआ था फिर उस पर ताला लगाकर रखने का क्या औचित्य है? इसलिए ब्रिटिश काल से कानूनी रूप से उस तहखाने के अधिकारी व्यास परिवार को जज ने वहां फिर से पूजा पाठ करने का अधिकार दे दिया। जिला प्रशासन ने उसी रात सारी व्यवस्था करके व्यास तहखाने में पूजा पाठ शुरु भी करवा दिया।
इन दोनों ही घटनाओं को देखें तो यह बात समान रूप से नजर आती है कि दोनों ही स्थानों पर एक समुदाय विशेष को खुश करने के लिए गैर कानूनी तरीके से हिन्दुओं के अधिकार को सीमित किया गया। इसके लिए कोई लिखित प्रशासनिक आदेश देने की बजाय सत्ता के बल पर मौखिक आदेश से मुख्यमंत्रियों ने जो चाहा वो किया। फिर वो अयोध्या के मामले में जीबी पंत हों या फिर काशी के मामले में मुलायम सिंह यादव। इसलिए जब इन प्रतिबंधों की वैधानिक जांच की गयी तो पता चला कि ऐसा तो कोई लिखित आदेश ही नहीं है तो फिर ताला लगाकर रखने का क्या औचित्य रह जाता है?
इसे संयोग कहें या शायद दैवीय विधान कि काशी की ज्ञानवापी अयोध्या के रामजन्मभूमि मंदिर का इतिहास दोहराते हुए नजर आ रही है। जिस तरह जिला अदालत के दखल के बाद वहां ताला खुला था उसी तरह ज्ञानवापी में भी जिला अदालत के आदेश के बाद व्यासजी के तहखाने का ताला खुल गया है। जिस तरह अदालत के आदेश के दो घण्टे बाद ही ताला खोलकर रामलला का पूजा पाठ शुरु हो गया था उसी तरह वाराणसी जिला अदालत के आदेश वाली रात ही ज्ञानवापी परिसर में गैरकानूनी तरीके से बंद की गयी पूजा शुरु हो गयी।
दिसंबर 1993 तक व्यासजी के तहखाने में पूजा पाठ पर मुस्लिम समुदाय को भी कोई आपत्ति नहीं थी। कुछ असामाजिक तत्व परेशान जरूर करते थे लेकिन ज्ञानवापी परिसर में स्थित व्यासजी के तहखाने में पूजा पाठ कभी बंद नहीं हुआ। अब क्योंकि अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के तुरंत बाद ही ज्ञानवापी का फैसला आया इसलिए मुस्लिम समुदाय इस पर भी आपत्ति दिखा रहा है। अंजुमन इंतजामिया कमेटी ने तत्काल न सिर्फ भड़कानेवाली बयानबाजी शुरु कर दी बल्कि सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट जाने के लिए कहा और शुक्रवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने व्सासजी के तहखाने में फिर से शुरु हुई पूजा पाठ को रोकने से इंकार कर दिया। हाईकोर्ट में भले ही अगली सुनवाई अब 6 फरवरी को हो लेकिन शुक्रवार को ही देश के अधिकांश मस्जिदों से भड़कानेवाले बयान जारी किये गये। शुक्रवार को मौलाना जो जुमे का खुतबा देते हैं उसमें उन्होंने कहीं खुलकर तो कहीं इशारों इशारों में इस अदालती आदेश को अपने साथ अन्याय बताया और 'अपना समय आने पर सबकुछ ठीक कर लेने' की धमकियां भी दी।
ज्ञानवापी परिसर स्थित व्यासजी के तहखाने को लेकर स्थानीय जिला अदालत ने ऐसा कोई फैसला नहीं दिया है जो वहां पहले से नहीं हो रहा था। अदालत ने इसे व्यास परिवार का अधिकार मानते हुए तहखाने में उनके पूजा के अधिकार को लौटा दिया है। लेकिन इसे भी मुस्लिम मौलाना अपने समुदाय में इस तरह फैला रहे हैं जैसे मुसलमानों के अधिकार को छीन लिया गया है और मुसलमानों को जानबूझकर पीछे धकेला जा रहा है।
यह एक गैरजिम्मेदार और न्याय विरुद्ध रवैया है, यदि मुस्लिम उलेमा, मौलाना इसका त्याग कर देंगे तो दोनों पक्षों को सच जानने और समझने का मौका मिलेगा। मुस्लिम समुदाय में फैलायी गयी हर झूठी और उकसावे वाली जानकारी केवल मुसलमानों को ही नहीं बल्कि हिन्दुओं को भी उत्तेजित करेगी। इससे समाज में अस्थिरता और अशांति फैलेगी जो हिन्दू-मुस्लिम ही नहीं पूरे देश के माहौल के लिए अच्छा नहीं होगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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