Karnataka Congress: कर्नाटक में सबसे बड़ा सवाल, सिद्धारमैया या शिवकुमार?
कर्नाटक में कांग्रेस या भाजपा की सरकार बनने से ज्यादा कांग्रेस की सरकार बनने पर सिद्धारमैया या डीके शिवकुमार में से कौन मुख्यमंत्री बनेगा, इसकी चर्चा हो रही है। कर्नाटक के चुनावी मैदान से समीर चौंगावकर का विशेष लेख।

Karnataka Congress: कर्नाटक में कांग्रेस को भाजपा पर मिल रही बढ़त की खबरों के बहुत पहले पिछले साल अगस्त से ही कांग्रेस के दो दिग्गज नेता डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया एक दूसरे पर बढ़त बढ़ाने और मुख्यमंत्री बनने की होड़ में जुट गए थे। मौका था 3 अगस्त को सिद्धारमैया के जन्मदिन के आयोजन का जिसमें उनके समर्थकों ने सिद्धारमैया की 75वीं सालगिरह पर दावणगेरे में रैली का आयोजन किया था।
जानकार बताते हैं कि इस तरह की रैली पिछले कई सालों में नहीं देखी गई। भीड़ इस कदर उमड़ी कि मध्य कर्नाटक के इस कस्बे से गुजरने वाला हाइवे जाम हो गया। सिद्धारमैया के जन्मदिवस पर आयोजित रैली में राहुल गांधी और प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार भी मौजूद थे। सिद्धारमैया के शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखे इस जन्मदिन आयोजन को कांग्रेस ने बड़ी चतुराई से पार्टी के आयोजन में बदल दिया। राहुल गांधी के इशारे पर प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने सिद्धारमैया का हाथ थामा और गले लगाया। कांग्रेस नेतृत्व इस बात को लेकर सतर्क था कि सिद्धारमैया और राज्य कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार के बीच महत्वाकांक्षा की होड़ कहीं कर्नाटक में कांग्रेस की उम्मीदों पर प्रतिकूल प्रभाव न डाल दे।
डीके शिवकुमार जो इस समय कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं उन्होंने कांग्रेस में नयी जान फूंकी है। भाजपा ने जब कांग्रेस-जनता दल (सेक्युलर) की गठबंधन सरकार गिरायी थी उसके एक साल बाद 2020 में प्रदेश कांग्रेस की कमान शिवकुमार को सौंपी गयी थी। वो कांग्रेस को भाजपा के दमदार संगठन के सामने खड़ा करने में सफल रहे हैं। राज्य पार्टी के प्रमुख डीके शिवकुमार जहां अपने संगठन कौशल के लिए जाने जाते हैं वही पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया कांग्रेस के जननेता हैं। कांग्रेस के दोनों दिग्गज नेता दक्षिणी कर्नाटक के हैं। सिद्धारमैया मैसूरू के हैं और शिवकुमार बेंगलूरू से 60 किलोमीटर दूर कनकपुरा कस्बे से आते हैं।
अकूत धन संपत्ति के मालिक और चुनाव में पार्टी के लिए खुलकर पैसा खर्च कर रहे 60 वर्षीय डीके शिवकुमार पार्टी के वित्तीय प्रबंधन को भी संभाल रहे हैं। डीके शिवकुमार बेंगलूरू ग्रामीण में सथानूर और कनकपुरा क्षेत्रों से लगातार सात बार विधायक चुने गए हैं। जगदीश शेट्टार और लक्ष्मण सावदी जैसे वरिष्ठ भाजपा नेताओं को कांग्रेस में लाना डीके शिवकुमार की सधी हुई रणनीति के कारण ही संभव हुआ।
इस बार कांग्रेस के लिए सबसे ज्यादा टिकटों की मारामारी थी। कर्नाटक विधानसभा के इस चुनाव में 224 सीटों के लिए कांग्रेस में 1500 से ज्यादा आवेदन आए थे। यह डीके शिवकुमार ही थे जिन्होंने प्रदेश के दिग्गज नेता सिद्धारमैया और कर्नाटक से आने वाले कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष खड़गे के साथ बेहतर तालमेल कर टिकट वितरण जैसे पेचीदे मामले को निपटाया। यही नहीं विभिन्न दलों से कांग्रेस में आने वाले नेताओं के लिए सीट खाली करने के लिए कांग्रेस के नेताओं को मनाया भी।
डीके शिवकुमार की राजनीति को जानने वाले नेताओं का कहना है कि वह एक चतुर राजनेता हैं जिनकी कांग्रेस और गांधी परिवार के प्रति गहरी आस्था और पूरी वफादारी है। 1,358 करोड़ रुपए की संपत्ति के साथ वे कर्नाटक के सबसे अमीर विधायकों में एक हैं। वे प्रभावी वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं लेकिन अन्य समुदायों में भी उन्होंने घुसपैठ बना ली है। शिवकुमार ने मई 2018 में त्रिशंकु विधानसभा के परिणामस्वरूप सत्ता के लिए विधायकों की तोड़-फोड़ की कोशिशों के बीच अपनी पार्टी के विधायकों को 'सुरक्षित' रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
शिवकुमार ऊर्जा से लबरेज होकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं वही पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया आत्मविश्वास से भरपूर छोटी छोटी रैलियां और रोड शो कर कांग्रेस के पक्ष में माहौल बना रहे हैं। सिद्धारमैया कांग्रेस के भीड़-खींचने वाले नेता हैं जो 1978 में डी. देवराज अर्स के बाद पांच साल का कार्यकाल (2013- 2018) पूरा करने वाले कर्नाटक के इकलौते मुख्यमंत्री बने।
सिद्धारमैया की छवि पिछड़े वर्ग के नेता की है। सिद्धारमैया के भाषणों में गंवई अंदाज और हाजिरजवाबी के साथ जमीन से जुड़े नेता का पुट होता है। कर्नाटक में कांग्रेस के इस सबसे लोकप्रिय नेता की निगाह दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने पर है। सिद्धरमैया ने सूझबूझ से तमाम जातियों का गठबंधन बनाकर उन जातियों में कांग्रेस की पहुंच मजबूत की है जिसे अहिंदा कहा जाता है। कन्नड़ भाषा में अल्पसंख्यातुरू (अल्पसंख्यक), हिंदू लिदावारू (पिछड़े वर्ग) और दलितारू (अनुसूचित जाति) का संक्षिप्त रूप है अहिंदा। कांग्रेस की यह मूल ताकत है। सिद्धारमैया राज्य के प्रमुख ओबीसी समूह कुरुबा से आते हैं, जिसकी राज्य के कुल वोट में 7 प्रतिशत हिस्सेदारी है। शिवकुमार प्रभावशाली वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं जिसकी कुल मतदाताओं में 12 फीसदी हिस्सेदारी है।
पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, जो अपनी पार्टी में मुख्यमंत्री पद की दावेदारी में प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार से तगड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं अपने कार्यालय में लगातार कार्यकताओं से मिल रहे हैं और अपने प्रचार अभियान में इस बात का जिक्र करते हैं कि "यह चुनाव कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर पर पुनरुद्धार की शुरुआत करेगा और 2024 के आम चुनाव के लिए बुनियाद रखेगा।"
फिलहाल सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार दोनों ने कांग्रेस की सरकार वापसी सुनिश्चित करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। अब तक दोनों ने अपनी महत्वाकांक्षाओं और मिजाज पर नियंत्रण रखा है। दोनों ने स्वीकार किया है कि यह पार्टी के विधायक तय करेगें कि किसे मुख्यमंत्री होना चाहिए। हालाकि कांग्रेस के एक नेता का कहना है कि, "दोनों में एकजुटता सियासी मजबूरी है क्योकि दोनों में से कोई भी कांग्रेस से अलग होकर अपने दम पर पार्टी चलाने की क्षमता नहीं रखता।"
दरअसल कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद की क्षमता वाले कई नेता हैं। सिद्धारमैया-शिवकुमार फैक्टर के अलावा कांग्रेस के कई दूसरे नेता ख़ुद को छिपे रुस्तम की तरह देख रहे हैं। प्रचार समिति के प्रमुख और बड़े नेता एम. बी. पाटिल ने हाल में एक इंटरव्यू में कहा, "मुख्यमंत्री के पद के लिए कई दमदार दावेदार हैं, जिनमें मैं भी हूं।" पाटिल ने कहा कि सबसे कद्दावर नेता एआइसीसी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और सिद्धारमैया हैं। उनके बाद दूसरी कतार के नेता हैं, जिनमें शिवकुमार और वह खुद शामिल हैं।
शिवकुमार ने भी एक इंटरव्यू में खड़गे का नाम लेकर कहा था कि "मैं उनके (खड़गे के) मातहत काम करना पसंद करूंगा। वे मुझसे 20 साल सीनियर हैं।" हालांकि, खड़गे ने साफ कर दिया है कि वे दौड़ में नहीं हैं। वे पूछते हैं, "कांग्रेस अध्यक्ष के नाते जब मैं विभिन्न राज्यों में मुख्यमंत्री नियुक्त करने की हैसियत में हूं, तो फिर मुझे खुद मुख्यमंत्री बनने में दिलचस्पी क्यों होगी?"
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फिलहाल पार्टी के सामने प्रमुख चुनौती बहुमत पाना है और उसके बाद सर्वसम्मति से मुख्यमंत्री का चुनाव करना उससे भी बड़ी चुनौती होगी। डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया में से किसी एक को चुनना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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