Karnataka BJP: बगावत की राह पर क्यों हैं भाजपा के दिग्गज नेता?
लक्ष्मण सावदी के बाद अब जगदीश शेट्टार ने भी कांग्रेस ज्वाइन कर ली। जगदीश शेट्टार न सिर्फ मजबूत लिंगायत नेता हैं बल्कि भाजपा के CM भी रह चुके हैं। आखिर भाजपा के ये दिग्गज ऐन चुनाव के मौके पर पार्टी क्यों छोड़ रहे हैं?

Karnataka BJP: सोमवार को कर्नाटक में हुबली धारवाड़ सीट पर भाजपा ने महेश टेंगीनकाई को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। वो भाजपा के प्रदेेश महासचिव हैं और लिंगायत समुदाय से आते हैं। लेकिन सोमवार को जब तक भाजपा इस सीट पर अपना उम्मीदवार घोषित करती जगदीश शेट्टार भाजपा छोड़कर कांग्रेस में जा चुके थे। जगदीश शेट्टार इसी सीट से चुनाव लड़ते आये हैं और इस बार भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने उन्हें टिकट देने से मना कर दिया था।
जगदीश शेट्टार अकेले नेता नहीं है जिन्होंने ऐन चुनाव से पहले भाजपा में बगावत की है। जगदीश शेट्टार के अलावा कर्नाटक भाजपा के एक महत्वपूर्ण नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री लक्ष्मण सावदी ने भी भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देकर कांग्रेस का हाथ मजबूत करने का फैसला ले लिया है। सावदी ने 14 अप्रैल को कांग्रेस का दामन थाम लिया था। अब वे कांग्रेस टिकट पर अथानी विधानसभा से चुनाव लड़ेंगे।
कर्नाटक में लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर दक्षिण के इस दरवाजे को मजबूत करने में जुटी भारतीय जनता पार्टी अपने नेताओं की बगावत से परेशान है। कर्नाटक विधानसभा में मतदान के लिए 22 दिन से भी कम वक्त बचा है, लेकिन भाजपा अपने नेताओं के विद्रोह से उबर नहीं पा रही है।
जगदीश शेट्टार की बगावत का असर
किसान बाहुल्य और लिंगायतों के वर्चस्व वाले कित्तूर को पहले मुम्बई कर्नाटक के नाम से जाना जाता था। कित्तूर कर्नाटक के छह जिले बेलगावी, हुब्बली धारवाड़, विजयपुर, हावेरी, गदग और बागलकोट में कुल 50 विधानसभा सीटें आती है। कर्नाटक की 224 सदस्यों वाली विधानसभा का यह लगभग 22 फीसदी है।
2018 के विधानसभा चुनाव में 50 सीटों में से 30 भाजपा को मिली थी। कांग्रेस को 17 और जेडीएस को केवल 2 सीटें हाथ लगी थी। 2013 के चुनाव में यहा कांग्रेस को 31 और भाजपा को 13 सीटें मिली थी। 2013 में भाजपा के दिग्गज नेता येदियुरप्पा ने अपनी अलग पार्टी कर्नाटक जनता पक्ष बनाकर चुनाव लड़ा था और इस क्षेत्र में भाजपा को तगड़ा नुकसान पहुंचाया था। इस साल 2023 के चुनाव में जगदीश शेट्टार के विद्रोह के बाद भाजपा को इस क्षेत्र में नुकसान होना तय है।
येदियुरप्पा खुद कह चुके हैं कि शेट्टार के कारण 20 सीटों के परिणाम प्रभावित हो सकते हैं। इस क्षेत्र में भाजपा लिंगायत मतों पर निर्भर रही है। भाजपा के सबसे बड़े लिंगायत नेता येदियुरप्पा इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे है और लिंगायत मुख्यमंत्री बसवराज बोम्बई भले मुख्यमंत्री हो लेकिन भाजपा ने इस बार उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है और सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है। लिंगायतों के एक और नेता जगदीश शेट्टार जो इसी कित्तूर कर्नाटक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, ने भाजपा से बगावत करके कांग्रेस का दामन थाम लिया है। ऐसे में भाजपा के लिए इस क्षेत्र में अपना दबदबा बनाना आसान नहीं होगा।
जगदीश शेट्टार को टिकट न देना समझ से परे
कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार का टिकट भाजपा हाईकमान ने क्यों काटा, इसका कारण कर्नाटक भाजपा के किसी भी नेता को नहीं मालूम। कर्नाटक के दिग्गज नेता येदियुरप्पा, प्रदेश संगठन महामंत्री के साथ प्रदेश अध्यक्ष ने भी शेट्टार को टिकट देने की पैरवी की थी। लेकिन प्रदेश के दिग्गज नेताओं के कहने के बाद भी भाजपा हाईकमान ने जगदीश शेट्टार को टिकट न देने का फैसला किया।
करीब तीन दशक के लंबे राजनीतिक सफर के बाद भाजपा का साथ छोड़ने वाले पूर्व सीएम जगदीश शेट्टार के परिवार का जनसंघ से पुराना रिश्ता रहा है। जगदीश शेट्टार के पिता शिवप्पा शेट्टार हुब्बल्ली-धारवाड़ निगम में जनसंघ के पहले महापौर थे जबकि चाचा सदाशिव शेट्टार ने 60 के दशक में उत्तर कर्नाटक में जनसंघ के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। सदाशिव शेट्टार 1967 में राज्य विधानसभा के लिए चुने गए पहले चार जनसंघ नेताओं में से एक थे। तब पहली बार दक्षिण में जनसंघ ने जीत दर्ज की थी। जगदीश शेट्टार ने 1994 में हुबली ग्रामीण सीट से मौजूदा मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई को हराकर विधानसभा में प्रवेश किया था। बाद में शेट्टार विपक्ष के नेता, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री जैसे पदों तक पहुंचे।
पार्टी ने नहीं बताया कि टिकट क्यों कटा?
कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और अब भाजपा से बगावत कर कांग्रेस में शामिल हो चुके जगदीश शेट्टार ने संपर्क करने पर बातचीत में साफ कहा कि भाजपा हाईकमान उनके टिकट काटने का कोई ठोस और उचित कारण नहीं बता सका। शेट्टार ने कहा कि भाजपा अध्यक्ष नड्डा ने उन्हें भविष्य मे कहीं समायोजित करने का आश्वासन जरूर दिया लेकिन टिकट काटने का कारण नहीं बता सके। शेट्टार का कहना है कि दूसरे दलों के नेताओं को तुंरत टिकट दिया जाता है लेकिन अपने ही समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी की जा रही है। शेट्टार ने कहा कि वह अपमानित महसूस कर रहे हैं और बिना किसी वजह के उनका टिकट कटने के कारण कांग्रेस के टिकट पर अपनी परंपरागत सीट पर ताल ठोक रहे हैं।
भाजपा के ये नेता छोड़ चुके हैं पार्टी
कर्नाटक सरकार में मंत्री और 6 बार के विधायक एस अंगारा, राज्य के उपमुख्यमंत्री रह चुके विधायक लक्ष्मण सावदी, हुबली-धारवाड़ (सेंट्रल) सीट से विधायक और पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार, मुदिगेरे से विधायक एमपी कुमारस्वामी, दो बार के हावेरी से विधायक नेहरू ओलेकर, होसदुर्गा से विधायक गोलीहट्टी शेखर, कुदलिगी से विधायक एनवाई गोपालकृष्ण के अलावा टिकट नहीं मिलने पर पूर्व विधायक सोगडू शिवण्णा और पूर्व सांसद एस. पी. मुद्दहनुमेगौड़ा ने पार्टी छोड़ने की घोषणा की है। तुमकूरु नगर क्षेत्र के पूर्व विधायक शिवण्णा ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने और निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। शिवण्णा ने कहा है कि वे लगातार 4 बार जीते। 2013 में हारे और 2018 में आलाकमान के आदेश पर मुकाबले से पीछे हटे थे। कुणिगल क्षेत्र से टिकट मिलने की उम्मीद के साथ भाजपा में शामिल हुए पूर्व सांसद एस.पी. मुद्दहनुमेगौड़ा ने भी पार्टी छोड निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने की घोषणा की है।
केंद्रीय नेतृत्व के निर्देशों के बाद प्रदेश के शीर्ष नेता डैमेज कंट्रोल में जुटे हैं। केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, प्रहलाद जोशी, सीएम बसवराज बोम्मई, पूर्व सीएम बीएस येदियुरप्पा के अलावा प्रदेश अध्यक्ष नलिन कुमार कतील असंतुष्टों को समझाने और शांत करने के प्रयास कर रहे हैं। संघ के कुछ नेताओं को भी इस काम पर लगाया गया है। केंद्रीय नेता भी नाराज वरिष्ठ नेताओं के संपर्क में है, लेकिन फिलहाल इसका कोई हल निकलता नजर नहीं आ रहा है।
हिमाचल प्रदेश में बगावत के कारण सत्ता गंवा चुकी भाजपा के लिए कर्नाटक में भी अपने नेताओं की बगावत के कारण सत्ता की राह मुश्किल हो गई है। 224 विधानसभा सीटों में से 35 सीटों पर भाजपा विपक्ष के साथ साथ अपने ही बागी नेताओं से तगड़ी चुनौती का सामना कर रही है। इसमें से कितनी सीटें भाजपा हारती है इसके लिए 13 मई का इंतजार करना होगा, जब चुनाव परिणाम घोषित किये जाएंगे।
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लेकिन इतना तो साफ दिख रहा है कि केन्द्रीय नेतृत्व का अत्यधिक दखल, स्थानीय नेताओं में तालमेल का अभाव, चुनाव जीतने के लिए गुजरात फार्मूले को लागू करने की जिद्द में बीजेपी यहां इतनी उलझ गयी है कि ऐन चुनाव के मौके पर उसे सुलझा पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन लग रहा है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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