Nepotism in BJP: परिवारवाद के दलदल में धंसता कमल
भारतीय जनता पार्टी सबसे जोरदार तरीके से परिवारवाद पर हमला करती है लेकिन सच्चाई यह है कि धीरे धीरे कमल दल भी परिवारवाद के दलदल में धंसता जा रहा है।

Nepotism in BJP: सत्ता प्राप्ति के लिए राजनीतिक दल अपने उन सिद्धांतों से भी किनारा कर लेते हैं जो उनकी पहचान से जुड़े होते हैं और उनके सहारे वे विपक्षी राजनीतिक दलों पर हमलावर होते हैं। दक्षिण के अपने एकमात्र दुर्ग को बचाने की मंशा से भाजपा ने भी ऐसे ही कुछ समझौते किए हैं। यानी जीत की गारंटी बन चुके चुनावी रणनीति के 'गुजरात मॉडल' को कर्नाटक में दोहराने से पार्टी ने बचने की कोशिश की है। यही कारण है कि अपने बुजुर्ग नेताओं को टिकट देने के बदले पार्टी ने दो दर्जन से अधिक नेता पुत्र-पुत्रियों व संबंधियों को विधानसभा टिकट दिए हैं। इनमें ऐसे विधायकों, मंत्रियों, सांसदों के नेता पुत्र हैं जिनका बड़ा राजनीतिक रसूख है किन्तु गिरते स्वास्थ्य व बढ़ती आयु ने उनके राजनीतिक कैरियर पर ब्रेक लगा दिए हैं।
देखा जाए तो 'राजनीति में परिवारवाद' से पल्ला झाड़ने की भाजपा नेतृत्व की कोशिशों को कर्नाटक में पलीता लगा दिया गया है। भाजपा संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांसदों से कहा था, 'अगर विधानसभा चुनाव में आपके बच्चों के टिकट कटे हैं तो उसकी वजह मैं हूं। मेरा मानना है कि वंशवाद लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। परिवारवाद से जातिवाद को बढ़ावा मिलता है। पार्टी में पारिवारिक राजनीति की इजाजत नहीं दी जाएगी। दूसरी पार्टियों की वंशवाद की राजनीति के खिलाफ लड़ाई लड़ी जाएगी।'
हालांकि उनके वक्तव्य के बाद कर्नाटक में टिकट वितरण में पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के बेटे विजयेंद्र, विधायक आनंद सिंह के बेटे सिद्धार्थ सिंह, पूर्व विधायक उमेश कट्टी के बेटे निखिल कट्टी, पूर्व एमएलसी और मंत्री जनार्दन रेड्डी के भाई जी करुणाकर रेड्डी, पूर्व विधायक चिक्केगौड़ा के पोते एसडी दिलीप कुमार, विधायक ईश्वर खंडरे के चचेरे भाई प्रकाश खंडरे, विधायक जीटी देवगौड़ा के दामाद रामचंद्र गौड़ा, लोकसभा सांसद कराडी संगन्ना की बहू मंजुला अमरेश, पूर्व मंत्री अरविंद लिंबावली की पत्नी मंजुला, वरिष्ठ नेता कट्टा सुब्रमण्य नायडू के बेटे कट्टा जगदीश जैसे पारिवारिक सदस्यों को इस बार विधानसभा चुनाव में कमल खिलाने की जिम्मेदारी दे दी गई है।
अश्विनी संपांगी, सोमन गौड़ा पाटिल, एसडी दिलीप कुमार जैसे कुछ और नाम हैं जिनके परिवार के सदस्य राजनीति में रहे हैं और ये अपनी किस्मत भाजपा से आजमा रहे हैं। भाजपा के इन पारिवारिक उम्मीदवारों पर तंज कसते हुए कांग्रेस ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी जिसका बचाव करते हुए राज्य के भाजपा नेताओं ने दलील दी थी कि वे जिस परिवारवाद को समाप्त करने की बात करते हैं उसका स्वरूप दूसरा है क्योंकि उनकी पार्टी में एक ही परिवार का परिवारवाद नहीं चलता। तो क्या राजनीति में परिवारवाद की परिभाषा भी भिन्न है?
लोकतंत्र में परिवारवाद और जनता का मूड
क्या राजनीति में परिवारवाद एक बुराई है? यह प्रश्न जितना सीधा है इसका उत्तर उतना ही विविधता भरा है। कुछ लोगों के लिए परिवारवाद एक बुराई है तो कुछ के लिए यह मायने ही नहीं रखता क्योंकि यदि उन्हें परिवारवाद से समस्या होती तो वास्तव में वे हर उस उम्मीदवार को चुनाव में हरा देते जिस पर परिवारवाद का ठप्पा है। लोकतंत्र में परिवारवाद का सबसे बड़ा उदाहरण गांधी-नेहरू परिवार रहा है और इसके बाद नंबर आता है उन क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का जिनकी स्थापना ही परिवारवाद को 'राजनीतिक पोषण' की सोच के कारण हुई है।
बिहार में लालू प्रसाद यादव, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव, आन्ध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू और रेड्डी परिवार, तेलंगाना में केसीआर, महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार, तमिलनाडु में करूणानिधि परिवार, उड़ीसा में पटनायक परिवार, हरियाणा में हुड्डा परिवार, पंजाब में बादल परिवार, जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला और मुफ़्ती परिवार, कर्नाटक में देवगौड़ा परिवार जैसे बड़े पारिवारिक घराने आज भी राज्य की राजनीति में या तो शीर्ष पर हैं अथवा उनकी उपस्थिति मुख्य विपक्षी दल की है।
अर्थात सीधे शब्दों में कहें तो जनता भी परिवारवाद को गलत नहीं मानती क्योंकि ऐसा होता तो इनकी एक पीढ़ी बाद ही राजनीतिक जमीन खिसका दी जाती। किन्तु देखने में आया है कि इनकी तीसरी-चौथी पीढ़ी भी राजनीति में है और जनता का आशीर्वाद भी उसे प्राप्त हो रहा है। कुल मिलाकर लोकतंत्र के सही मायने समझने में यह जनता और समाज की विफलता है।
राजनीति अपने साथ वर्चस्व भी लाती है और जिसने एक बार अपना वर्चस्व बना लिया, फिर जनता के लिए उसके तिलिस्म को तोड़ना कठिन होता जाता है क्योंकि यह तिलिस्म जाति, धर्म, क्षेत्रवाद, भाषावाद से पुष्ट होता है और जनता को इसके जाल में लंबे समय तक रखना आसान होता है। पहली दुनिया से लेकर तीसरी दुनिया के कई देशों की राजनीति में भी परिवारवाद हावी है जिसका अर्थ है कि लोकतंत्र आज भी अपने वास्तविक अर्थ को खोज रहा है।
भाजपा में फलता-फूलता परिवारवाद
1999 से 2014 के बीच चुने गए वंशवादी सांसदों में से 31 सांसद भाजपा के थे वहीं कांग्रेस 36 वंशवादी सांसदों को ढो रही थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा से कुल 22 प्रतिशत सांसद वंशवाद की बेल थे। 1980 में अपनी स्थापना के बाद से लगभग एक दशक तक तो भाजपा में परिवारवाद की राजनीति नगण्य थी किन्तु 1992 के बाद उत्तर भारत में पार्टी के विस्तार में लगे कद्दावर नेताओं के परिवारीजनों ने भी धीरे-धीरे राजनीति का स्वाद चखा और जैसे-जैसे भाजपा बढ़ी, स्थानीय स्तर पर बड़े नेताओं के पुत्र-पुत्रियों ने राजनीति को विरासत समझकर उसमें हस्तक्षेप प्रारंभ किया।
फिर कई राज्यों में भाजपा ने सरकार बनाने के लिए ऐसे क्षेत्रीय दलों से गठबंधन किया जिनकी राजनीति ही वंशवाद पर आधारित थी। जब आप चारों ओर से बुराई से घिरे हों तो आपमें भी उसका अंश आना तय है, उसकी मात्रा कम या अधिक हो सकती है। इसी कारण भाजपा में भी वंशवाद की राजनीति का चलन बढ़ा है। हालांकि यह थोड़ा सुखद है कि तीन-चार पीढ़ियों वाली वंशबेल को राजनीति में लाना अभी भाजपा में अपेक्षाकृत कठिन है अतः नेताओं के पुत्र-पुत्रियों या संबंधियों तक ही परिवारवाद सिमटा हुआ है किन्तु भाजपा में भी परिवारवाद है इसे नकारा नहीं जा सकता।
अन्य राज्यों में भी है परिवारवाद
भाजपा का 'कर्नाटक मॉडल' यदि कामयाब होता है और पार्टी पुनः सत्ता में वापसी करती है तो देश के हृदय मध्य प्रदेश में भी 'गुजरात मॉडल' के स्थान पर 'कर्नाटक मॉडल' लागू करने की मांग उठ सकती है। क्योंकि लम्बे समय से सत्ता पर काबिज भाजपा के वर्तमान विधायकों व मंत्रियों के प्रति जनता में नाराजगी है और वे टिकट कटने की सूरत में अपने सगे-संबंधियों के लिए टिकट की मांग करेंगे।
इसके अलावा कई ऐसे हैवीवेट नेता-मंत्री हैं जिनके पुत्र-पुत्रियों ने स्वयं ही टिकट की दावेदारी शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पुत्र कार्तिकेय सिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के पुत्र महाआर्यमन सिंधिया, केंद्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर के पुत्र देवेंद्र सिंह तोमर, वरिष्ठ मंत्री गोपाल भार्गव के पुत्र अभिषेक भार्गव, गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा के पुत्र सुकर्ण मिश्रा, मंत्री कमल पटेल के बेटे सुदीप पटेल, मंत्री गोविन्द सिंह राजपूत के बेटे आकाश सिंह राजपूत, मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया के पुत्र अक्षय, पूर्व सांसद प्रभात झा के बेटे तुष्मुल झा, पूर्व मंत्री गौरीशंकर बिसेन की पुत्री मौसम बिसेन कई वर्षों से अपनी दावेदारी कर रहे हैं और इस बार यह दावेदारी कईयों की किस्मत चमका सकती है।
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27 अप्रैल को ही मध्य प्रदेश के पूर्व वित्त मंत्री जयंत मलैया के पुत्र सिद्धार्थ मलैया की भाजपा में वापसी हुई है जिन्हें उपचुनाव में बगावत और पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण निष्कासित कर दिया गया था। सिद्धार्थ मलैया इस बार टिकट के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 230 उम्मीदवारों में से 48 उम्मीदवार ऐसे उतारे थे जिनका परिवार पूर्व से ही राजनीति में स्थापित था जबकि कांग्रेस ने 23 पारिवारिक उम्मीदवारों को चुनाव में उतारा था। वर्तमान में कई नेता पुत्र-पुत्री विधायक हैं और इस बार भी उनका टिकट कटने की संभावना नगण्य है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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