Justice Abdul Nazeer: विपक्ष का विरोध सैद्धांतिक या राम मंदिर निर्णय की चिढ़?

न्यायपालिका के दुरूपयोग का सबसे बड़ा उदाहरण जस्टिस बहारुल इस्लाम का है। जो 1962 से 1972 तक कांग्रेस के राज्यसभा सांसद थे। 1972 में इंदिरा गांधी ने उन्हें पहले हाईकोर्ट का जज, फिर पदोन्नत कर सुप्रीमकोर्ट का जज बना दिया।

Justice Abdul Nazeer Oppositions protest principled or irritation of Ram Mandir decision

जस्टिस एस अब्दुल नजीर चार जनवरी को सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए और 12 फरवरी को उन्हें आंध्र प्रदेश का राज्यपाल बना दिया गया। जस्टिस अब्दुल नजीर उस बेंच में एकमात्र मुस्लिम जज थे, जिसने सर्वसम्मत्ति से रामजन्मभूमि के पक्ष में फैसला दिया था। जस्टिस एस अब्दुल नजीर को राज्यपाल बनाए जाने का विरोध करने हुए सपा नेता अमीक जमी ने कहा कि उनकी नियुक्ति भारत के लोकतंत्र के भविष्य के लिए गलत परंपरा है। एआईएमआईएम के सैयद असीम वकार ने जस्टिस अब्दुल नज़ीर की नियुक्ति पर उनके रामजन्मभूमि पर दिए गए फैसले से जोड़ते हुए सवाल उठाया है। टीएमसी नेता मजीद मेमन ने कहा कि जस्टिस गोगोई के मामले में भी ऐसा पहले हो चुका है, जब उन्हें सांसद नियुक्त किया गया था।

कांग्रेस के नेता रशीद अल्वी उन लोगों में सबसे पहले थे, जिन्होंने उन्हें राज्यपाल बनाए जाने के तुरंत बाद एतराज किया, उनके एतराज का बड़ा कारण यह था कि अब्दुल नजीर उस बैंच में शामिल थे, जिसने रामजन्मभूमि के पक्ष में फैसला किया था। कांग्रेस के इस मुस्लिम नेता के एतराज को कांग्रेस पार्टी के महासचिव जयराम रमेश ने भी सही ठहराया, जिससे साफ़ हो गया कि कांग्रेस के एतराज का कारण भी वही है जो रशीद अल्वी का है।

Justice Abdul Nazeer Oppositions protest principled or irritation of Ram Mandir decision

इससे पहले कांग्रेस ने तब भी एतराज किया था, जब अयोध्या के रामजन्मभूमि पर फैसला करने वाली बैंच के प्रमुख चीफ जस्टिस रंजन गोगोई को मोदी सरकार ने राज्यसभा का सदस्य नियुक्त करवाया था। जस्टिस रंजन गोगोई नवंबर 2019 में रिटायर हुए और मार्च 2020 में उन्हें राज्यसभा में नामित कर दिया गया था।

कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और जयराम रमेश ने अपनी प्रतिक्रिया में सैद्धांतिक तड़का लगाया है, ताकि कांग्रेस को रामजन्मभूमि पर आए फैसले के खिलाफ न मान लिया जाए। जयराम रमेश ने भाजपा के दिवंगत नेता अरुण जेटली के 2013 में दिए गए एक भाषण का हवाला दिया है और अभिषेक मनु सिंघवी ने उनके 2012 में राज्यसभा में दिए गए भाषण का हवाला दिया है। इन दोनों ही भाषणों में अरुण जेटली ने न्यायपालिका की स्वतन्त्रता और गरिमा के लिए जजों के रिटायर होने के बाद दो साल का कुलिंग पीरियड होने की वकालत की थी।

30 सितंबर 2012 में राज्यसभा में दिए भाषण में अरुण जेटली ने कहा था कि "दो तरह के जज होते है, एक जो क़ानून जानते है और दूसरे जो क़ानून मंत्री को जानते हैं। जज रिटायर नहीं होना चाहते हैं। रिटायर होने के बाद सरकारी पद पाने की इच्छा रिटायर होने से पहले के जज के फ़ैसलों को प्रभावित करती है, यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए ख़तरा है। इसलिए कम से कम दो साल का कुलिंग पीरियड होना चाहिए।"

रिटायर होने वाले जजों के कूलिंग ऑफ़ पीरियड को लेकर अन्य मंचों पर भी सवाल उठते रहे हैं। चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा ने अपने रिटायरमेंट के दिन 30 सितंबर 2014 को अपने भाषण में कहा था, "जजों को कोई पद स्वीकार करने के लिए दो साल का कूलिंग ऑफ़ पीरियड होना चाहिए।" असल में उनकी रिटायरमेंट से कुछ दिन पहले ही पूर्व चीफ जस्टिस पी सदाशिवम को केरल का राज्यपाल बनाया गया था। तब कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि सदाशिवम को भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह से जुड़े उनके फैसले के लिए इनाम दिया जा रहा है। चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा के रिटायर होने के बाद अक्टूबर में सुप्रीमकोर्ट में कुलिंग पीरियड को लेकर एक जनहित याचिका दायर की गई थी, लेकिन उसी सुप्रीमकोर्ट ने कुलिंग पीरियड तय करने से इनकार कर दिया था।

कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा है कि जस्टिस नजीर जैसी नियुक्तियां न्यायपालिका की निष्पक्षता के लिए खतरा है। लेकिन क्या यह खतरा पहले नहीं था, जब 1952 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस फ़ज़ल अली को रिटायर होने के तुरंत बाद ओडीशा का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। 1958 में तो विधि आयोग ने जजों के रिटायर होने के बाद सरकारी पद लेने पर रोक की सिफ़ारिश की थी, लेकिन कांग्रेस सरकार ने उस सिफारिश को कूड़ेदान में फैंक दिया था।

न्यायपालिका के दुरूपयोग का सबसे बड़ा उदाहरण जस्टिस बहारुल इस्लाम है। जो 1962 से 1972 तक कांग्रेस के राज्यसभा सांसद थे। 1972 में इंदिरा गांधी ने उन्हें हाईकोर्ट का जज बना दिया, फिर पदोन्नत कर सुप्रीमकोर्ट का जज बनाया, उन दिनों सरकार ही जजों की नियुक्तियां करती थी। जस्टिस बहारुल इस्लाम जैसे ही जनवरी 1983 में सुप्रीम कोर्ट के जज के पद से रिटायर हुए, इंदिरा गांधी ने छह महीने के भीतर जून में उन्हें फिर से कांग्रेस का राज्यसभा सांसद बना दिया था। न्यायपालिका के राजनीतिकरण का ऐसा उदाहरण तो दुनिया के किसी देश में नहीं मिलेगा। इसलिए पत्थर मारने का हक उसे है, जिसने कोई पाप न किया हो।

न्यायपालिका और जजों के दुरूपयोग का दूसरा बड़ा उदाहरण रंगनाथ मिश्रा को राज्यसभा सदस्य बनाए जाने का है। कांग्रेस ने 1998 में सुप्रीमकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रंगनाथ मिश्रा को राज्यसभा का सदस्य बनाया था। रंगनाथ मिश्रा वही जज थे, जिन्होंने दिल्ली के सिख विरोधी दंगों में कांग्रेस को क्लीन चिट दी थी। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने देश भर में हजारों सिखों को मार दिया था।

इंदिरा गांधी की हत्या के कुछ घंटो बाद ही प्रधानमन्त्री बन गए राजीव गांधी ने इन हत्याओं को स्वाभाविक प्रतिक्रिया बताते हुए कहा था कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती हिलती ही है। बाद में जब राजीव गांधी पर न्यायिक जांच का दबाव बना तो उन्होंने जस्टिस रंगनाथ मिश्रा की एक सदसीय जांच कमेटी बना दी, जिसने अपनी रिपोर्ट में कांग्रेस को क्लीन चिट दी थी। रिपोर्ट में लिखा गया वाक्य उनकी कांग्रेसपरस्ती की पोल खोलता है। रिपोर्ट में उन्होंने लिखा था- "अगर कांग्रेस पार्टी या पार्टी के किसी ताक़तवर धड़े ने कोई भूमिका निभाई भी होती तो ये उस तरह से इसे अंजाम नहीं दे सकते थे जिसके लिए उन्हें उत्तरदायी ठहराया गया है।'' 1998 में कांग्रेस पार्टी ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य बना दिया।

पर अहम सवाल यह है कि क्या चीफ जस्टिस रंजन गोगोई को राज्यसभा सांसद बनाने और जस्टिस नजीर को राज्यपाल बनाने का विरोध सैद्धांतिक है या उनके रामजन्मभूमि फैसले के कारण है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टियों ने अयोध्या पर आए फैसले का स्वागत नहीं किया था। इन सभी पार्टियों ने जस्टिस नजीर को राज्यपाल बनाए जाने का विरोध करने के लिए अपने मुस्लिम नेताओं को ही आगे किया है।

रंजन गोगोई की नियुक्ति के समय भी विपक्ष के नेता उनके रामजन्मभूमि फैसले को मुद्दा बनाते रहे थे। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेता और राज्यसभा सांसद एए रहीम ने तो अपने ट्विटर हेंडल पर बिना लागलपेट लिख ही दिया कि , "वह अयोध्या मामले में फैसला देने वाली पीठ के सदस्य थे।" तो स्पष्ट है कि किसी रिटायर्ड जज को राज्यसभा सदस्य या गवर्नर बनाए जाने का विरोध सैद्धांतिक नहीं, बल्कि हिन्दुओं के अराध्य देव भगवान राम और रामजन्मभूमि पर आए फैसले से उपजी चिढ़ है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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