Jharkhand CM: कल्पना सोरेन के बजाय चंपई सोरेन के मुख्यमंत्री बनने की अंतर्कथा
Jharkhand CM: जमीन घोटाले में गिरफ्तारी के बाद झारखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी हेमंत सोरेन के नीचे से सरककर बुजुर्ग नेता चंपई सोरेन के पास पहुंच गई है।
68 साल के चंपई सोरेन के चयन की वजह झारखंड मुक्ति मोर्चा सुप्रीमो शिबू सोरेन के परिवार में मचा विद्रोह रहा।

मुसीबत में फंसे हेमंत सोरेन आपात स्थिति में अपनी पत्नी कल्पना सोरेन को ही मुख्यमंत्री बना चाहते थे, ताकि राजनीतिक विरासत की बागडोर उनके हाथों से बंधी रहे। लेकिन शिबू सोरेन की बड़ी बहू व विधायक सीता सोरेन और हेमंत सोरेन के छोटे भाई व विधायक बसंत सोरेन कल्पना सोरेन को मुख्यमंत्री बनाने के प्रयास के सख्त खिलाफ रहे। इस नाराजगी से झामुमो में टूट होने की आशंका बढ़ गई थी। इसलिए न चाहते हुए भी जेल जाते हेमंत सोरेन को पत्नी कल्पना के नाम से पीछे हटना पड़ा।
उनकी जगह जो चंपई सोरेन झामुमो विधायक दल के नवनियुक्त नेता चुने गये हैं, वो 1991 में पहली बार सरायकेला से निर्दलीय विधायक बने थे। चंपई सोरेन अलग झारखंड आंदोलन के दिनों में झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन के संपर्क में आए और संघर्ष के साथी बने रहे।
पहली बार चंपई सोरेन को मंत्री बनने का मौका झामुमो के साथ बनी भाजपा की अर्जुन मुंडा सरकार में मिला। संयोगवश भाजपा नेता अर्जुन मुंडा के राजनीतिक सफर की शुरुआत भी झामुमो विधायक के तौर पर हुई थी। तब मुंडा को झामुमो का टिकट दिलाने में झारखंड टाइगर के नाम से कोल्हान में मशहूर चंपई सोरेन की ही भूमिका थी। बाद में मुंडा भाजपा में शामिल हो गये। चंपई सोरेन की तरह ही अर्जुन मुंडा भी ओडिशा व बंगाल से लगने वाले कोल्हान क्षेत्र से ही आते हैं।
मूल रूप से उत्तरी छोटानागपुर के हजारीबाग जिला से आने वाले झामुमो सुप्रीमो के परिवार ने दक्षिण कोल्हान से दूर उत्तर में बिहार और पूर्व में बंगाल से लगे संथाल परगना में पांच दशकों से राजनीतिक आधार बना रखा है। झारखंड में स्थायी प्रभाव की तलाश में प्रतिद्वंदी भाजपा लगातार संथाल परगना में मजबूत शिबू सोरेन के गढ़ को ही ध्वस्त करने की कोशिश में है। भाजपा के जोरदार प्रयासों का नतीजा है कि शिबू सोरेन पिछला लोकसभा चुनाव भाजपा सांसद सुनील सोरेन के हाथों हार चुके हैं और फिलहाल राज्यसभा के सदस्य हैं।
झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी की राजनीति में खास अहमियत संथाल परगना की वजह से है। 1998 लोकसभा चुनाव में दुमका सीट से उन्होंने शिबू सोरेन को हराकर पहली बार लोकसभा पहुंचने के मंसूबे को साकार किया था। इनाम स्वरूप वाजपेयी सरकार में उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाया गया और 2000 में जब झारखंड राज्य का गठन हुआ तो बाबूलाल मरांडी भाजपा की ओर से प्रथम मुख्यमंत्री बने।
शिबू सोरेन परिवार के तीनों विधायक संथाल परगना से आते हैं। स्वयं शिबू सोरेन को भ्रष्टाचार के मामले में फंसकर जब सांसदी गंवानी पड़ी तो उन्होंने इसी संथाल परगना के दुमका से पत्नी रूपी सोरेन को लोकसभा चुनाव लड़वाना पसंद किया। लिहाजा यह पहला मौका है कि आंतरिक पारिवारिक कलह से मजबूरी में फंसे शिबू सोरेन को न केवल अपने परिवार के बाहर से बल्कि अपनी राजनीतिक पकड़ वाली जमीन के बाहर से किसी व्यक्ति को उत्तराधिकारी के रूप में ढूंढना पड़ा है।
राजनीति में शिबू सोरेन के असली वारिस के तौर पर बड़े पुत्र विधायक दुर्गा सोरेन सक्रिय थे। 2009 में दुर्गा सोरेन के निधन के बाद से उनकी पत्नी सीता सोरेन दिवंगत पति की पारंपरिक जामा विधानसभा सीट से प्रतिनिधित्व कर रही हैं। मगर घर में हेमंत सोरेन को राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाने की वजह से लगातार खफा भी चल रही हैं। विधायक सीता सोरेन की नाराजगी का नतीजा है कि उनकी दोनों पुत्रियों राजश्री और जयश्री सोरेन ने दिवंगत पिता का स्थान पाने के लिए बीते तीन साल से दुर्गा सोरेन सेना नामक मंच बना रखा है।
हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन को विकल्प के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश का हेमंत की विधायक भाभी सीता सोरेन ने ही स्पष्ट विरोध नहीं किया, बल्कि हेमंत के छोटे भाई बसंत सोरेन ने भी भाभी कल्पना सोरेन की राह में काटें बिछाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। जब भी मौका आया उन्होंने जताने में कमी नहीं छोड़ी कि परिवार में उनकी जगह कल्पना सोरेन से ऊंची है।
पिछले विधानसभा चुनाव में हेमंत सोरेन को पारंपरिक दुमका विधानसभा सीट से हार का मुंह देखना पड़ा था। उपचुनाव में उन्हें संथाल परगना की बरहेट विधानसभा सीट से जीतकर आना पड़ा। मौजूदा विधानसभा चुनाव उन्होंने दो सीटों अर्थात दुमका और बरहेट दोनो से लड़ा और जीता। दो में से एक सीट से इस्तीफ़ा देने की बाध्यता में उन्होंने दुमका सीट खाली की। उपचुनाव में दुमका सीट से कल्पना सोरेन के चुनाव लड़ने की चर्चा हुई, मगर हेमंत सोरेन को पत्नी की बजाय भाई बसंत सोरेन को दुमका सीट से उतारना पड़ा।
जमीन घोटाले की जांच में गला फंसता देख मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को आपात स्थिति का अंदाजा हो चला था। इसीलिए गिरफ्तारी और पद से इस्तीफे की आशंका को परखते हुए अल्पसंख्यक बहुल गांडेय विधानसभा सीट को तत्कालीन विधायक सरफराज अहमद से खाली करा लिया था, ताकि जरूरत पड़ने पर गैर विधायक कल्पना सोरेन को मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई जा सके और उपचुनाव के जरिए छह महीने में विधानसभा सदस्य होने की संवैधानिक बाध्यता भी पूरी की जा सके।
खास डीलिंग के तहत विधायक सरफराज अहमद के अचानक इस्तीफे के बाद ही शिबू सोरेन परिवार की अंदरूनी कलह सतह पर आ गई। नतीजा, सबके विरोध के बाद परिवार की बहू कल्पना के बजाय परिवार के बाहर से आनेवाले चंपई सोरेन को सीएम पद के लिए चुना गया जो कद्दावर नेता तो हैं ही, शिबू सोरेन के भी विश्वासपात्र हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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