Jawan Film Review: ‘जवान’ के स्क्रीनशास्त्र में शाहरुख खान का राजनीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र
Jawan Film Review: जवान मूवी में शाहरुख और उनके निर्देशक एटली ने जबरदस्त स्क्रीन मैनेजमेंट किया है। कोई सीन ऐसा ना जाए कि आप बोर होने लगें। कुछ ना कुछ ऐसा कर दो स्क्रीन पर कि दर्शक पिछले सीन को भूलकर नए में फंस जाए। कुछ नहीं तो एक नया किरदार ही लांच कर दो या ऐसा अप्रत्याशित सीन डाल दो कि लोग ठिठक जाएं कि अब क्या होगा?
थोड़ा गौर से देखेंगे तो पाएंगे कि किसान आत्महत्या पर भाषण दे रहे शाहरुख के पीछे मेट्रो की दीवार पर मुथूट गोल्ड लोन का एड है और शाहरुख के हाथ में पोको का फोन और हॉल में बिना मतलब के भी शाहरूख के हर सीन पर तालियां और सीटियां बजाते लड़के, तीनों का कनेक्शन शाहरुख का अर्थशास्त्र दिखाता है। साथ ही राजनीतिक शास्त्र को भी कहानी में ऐसा गुंथा है कि एंटरटेनमेंट की चाशनी में दो बार लपेटने के बावजूद झलक साफ दिखती है।

ये शाहरुख की समझ में आ गया है कि फुल लेंथ में हाथ फैलाकर युवाओं के दिलों को जीतने के दिन अब लद गए हैं। पठान से उन्होंने एंटरटेनमेंट, एक्शन और स्पेशल इफैक्ट्स की नई ट्रिपल डोज भी शुरू की, ऊपर से भगवा बिकिनी का विवाद भी छिड़का। फॉर्मूला काम कर गया, दीपिका सलमान का तड़का भी मददगार साबित हुआ। लेकिन पिछली बार कहानी कमजोर थी, इस बार कहानी को भी इतना ड्रामेटिक बना दिया है कि जवान देखने वाले शुरूआत में कन्फ्यूज ही रहते हैं कि ये जवान शाहरुख है कि बुड्ढा शाहरुख है।
लेकिन 'पठान' से शाहरुख ने अर्थशास्त्र का एक नया फंडा ढूंढा कि फिल्म के शुरूआती शो में इतनी एडवांस बुकिंग करवा दो कि मीडिया और फिल्म समीक्षक भी बुरा लिखने बोलने से पहले दस बार सोचें। इस बार भी आपको हॉल में ऐसे लड़कों की भीड़ अलग ही नजर आएगी, जो तालियां सीटियां बजा रहे होंगे, पूरी फिल्म में, भले ही बाकी हॉल को कोई मतलब ना हो।
जाहिर है इन सबके लिए भी एक बजट रखना पड़ता होगा लेकिन वो बजट निकाला कैसे जाए, इसके लिए भी शाहरुख ने तमाम मेहनत की है। पोको, मुथूट जैसे तमाम एड फिल्म में नजर आते हैं जो आसानी से नोटिस में नहीं आते हैं। लेकिन इस मूवी के एक एक सीन को देखकर आप कह सकते हैं कि काफी पैसा खर्च किया गया है।
पहले सीन से ही आपको एक बिलकुल अलग दुनियां देखने को मिलती है, नॉर्थ ईस्ट के एक गांव की। वहां पर बेहोश गिरते शाहरुख की, उसके कोमा में जाने की, गांव पर हमले के वक्त मसीहा की तरह उनको बचाने की। दूसरा सीन भी कम खर्चीला नहीं था। एक मेट्रो की हाइजैकिंग और उसका शूट सोचिए कितनी मुश्किल से शूट हुआ होगा जिसमें एक बार में ही सैकड़ों कलाकारों, तकनीशियनों की जरुरत रही होगी। जाहिर है इसके लिए तमाम विदेशी विशेषज्ञ भी लिए गए होंगे।
उसके अलावा भी शाहरुख ने संजय दत्त, दीपिका पादुकोण के साथ साथ नयनतारा, विजय सेतुपति और प्रियमणि, सान्या मल्होत्रा जैसी हीरोइन को फिल्म में लिया है। शाहरुख को ये भी पता था कि उनको भी पहले की तरह एक ही लुक में लोग पसंद नहीं करेंगे तो कभी जेलर की वर्दी वाले लुक में दिखते हैं तो कभी फौजी जवान वाले में, कभी दाढ़ी बढ़ाए रजनीकांत लुक में तो कभी पट्टियों से चेहरा बांधे हुए, तो एक बार गंजे के लुक में भी। मूछों, दाढ़ी और क्लीन शेव, सभी तरह के लुक में आपको शाहरुख खान इस मूवी में दिखेंगे। फिल्म को सुपरहिट करवाने के लिए वो दर्शकों को सोचने तक का मौका नहीं देना चाहते, इसलिए लगातार कहानी में भी ट्विस्ट चलता ही रहता है।
लेकिन यही स्पीड कभी कभी जल्दबाजी लगती है, कैसे कोई जेलर केवल बच्चे से मिलकर उसकी मां से शादी करने को हां कर सकता है? कैसे इतनी जल्दी शादी, झगड़ा सब दिखाए जाते हैं? दीपिका के केस में भी जैसे कहानी भागती है वह कन्फ्यूजन पैदा करती है। इसी तरह राजनीति के मामले में भी शाहरुख बिना कोई मैसेज दिए रह नहीं सकते थे।
इस मूवी में भी उन्होंने एकदम स्पष्ट राजनीतिक मैसेज दिया है जिसे आदित्यनाथ योगी चाहें तो निजी तौर पर भी ले सकते हैं। जिस डॉक्टर कफील खान को गोरखपुर में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था उसके जैसे सान्या मल्होत्रा के किरदार को न सिर्फ इसमें हीरो की तरह पेश किया गया है, बल्कि ऐसा साफ लगता है कि शाहरुख ने कफील खान को ही क्लीन चिट दे दी है और इसके लिए स्वास्थ्य सचिव को जिम्मेदारी कुबूल करवा दी है, जबकि कफील खान का अभी मामला कोर्ट में है।
हालांकि फिल्म के हीरो विक्रम राठौर (शाहरुख) सिस्टम की कई कमियों के खिलाफ मोर्चा खोलता है। एक एक करके कृषि मंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और रक्षा मंत्री यहां तक कि चुनाव आयोग भी निशाने पर लिया जाता है। ये अलग बात है कि इनमें से सभी सड़क छाप जैसे दिखाए जाते हैं। कृषि मंत्री को किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं के लिए निशाने पर लिया जाता है, स्वास्थ्य मंत्री को अस्पतालों की खस्ता हालत के लिए निशाने पर लिया जाता है तो रक्षा मंत्री को जवानों को घटिया बंदूकें दिलवाने के लिए।
लेकिन राजनीतिक मसलों को फिल्माने के लिए राजनीतिक समझ भी होना जरूरी है, जो इस मूवी में उतनी दिखती नहीं। अंत तक स्पष्ट नहीं होता कि किसी प्रदेश के मंत्री दिखाए जा रहे हैं या केन्द्र के। मेट्रो चकाला, अंधेरी जा रही है, तो समझ आता है कि ये मुंबई है। किसानों के कर्ज आदि मोटे तौर पर राज्य सरकारों का मामला होता है, लेकिन उसी सरकार में इनसेफेलाइट्स वाले मसले में स्वास्थ्य मंत्री को पश्चिम बंगाल के हरिपुरा के अस्पताल में उठाकर ले जाते हैं। वो सरकारी हॉस्पिटल जाहिर है प्रदेश सरकार का होगा, तो ऐसा क्यों दिखाया जाता है कि महाराष्ट्र और बंगाल में एक ही सरकार है? अगर उन्हें केन्द्र के मंत्री दिखा रहे हैं तो बंगाल के छोटे से सरकारी हॉस्पिटल से केन्द्र के स्वास्थ्य मंत्री का क्या ताल्लुक?
ऐसे ही ईवीएम चोरी चले जाने पर स्टेट हेड या राज्य प्रमुख के बात करने का क्या मतलब? समझ ही नहीं आता कि सीएम से बात हो रही है या पीएम से? सीएम से तो मुमकिन हो नहीं सकता क्योंकि देश भर की 53 फैक्ट्रियों पर ताला कैसे लगता? और अगर पीएम थे, तो पीएम को स्टेट हेड जैसे नामों से क्यों सम्बोधन दिया जा रहा है? उसी तरह एक स्पेशल ऑपरेशन को अंजाम देने वाले सैन्य अफसर की पत्नी के साथ जो सुलूक फिल्म में दिखाया गया है, वो हैरान कर देने वाला है। ये मुमकिन ही नहीं लगता, उलटे उसे फांसी दे दी जाती है। आजादी के इतिहास में आज तक शबनम अली को फांसी की सजा का ऐलान हुआ है, उसे भी आज तक अंजाम नहीं दिया गया और शाहरुख की फिल्म में एक बड़े सैन्य अफसर की पत्नी दीपिका पादुकोण को फांसी दे दी गई।
लेकिन फिल्म इतनी लाउड है कि कई और खामियों पर शाहरुख फैंस की नजर ही नहीं गई। शाहरुख पूरी ट्रेन हाईजैक करके निकल गया, मेट्रो स्टेशन के अंदर बाहर और यहां तक कि मेट्रो कम्पार्टमेंट के अंदर भी सीसीटीवी होते हैं, कोई फोटो ना उनका लिया गया और ना ही उनकी टीम का। शाहरुख इस मूवी में जेलर के किरदार में भी हैं, 12 साल से कोई किसी एक जेल में ही कैसे टिका रह सकता है, जबकि उसी जेल में वो पैदा हुआ था? उसके अलावा वहां कोई और अधिकारी दिखा भी नहीं। पद डीआईजी लिखा हुआ था, जो आमतौर पर जेल में नहीं ड्यूटी देता। फिर जेल में इतने अत्याधुनिक सैन्य हथियार वो लाया कहां से?
महाराष्ट्र के राजस्व या बैंक अधिकारियों को इतना जालिम दिखाया जाता है कि वो पति की लाश को अग्नि दे रही महिला के गले से मंगलसूत्र छीनकर ले जाते हैं। ये सरकारी विज्ञापन कैसे हो सकता है कि आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवार को दो लाख का मुआवजा मिलेगा? ये बात भी खटकती है कि किसी भी खुफिया या सैन्य ऑपरेशन पर जाने से पहले कोई भी कमांडो या सैन्य अफसर अपने हथियारों को पहली बार क्या दुश्मन पर ही चलाता है और हथियार फेल हो जाता है? क्या कभी वह प्रैक्टिस में उन्हें नहीं चलाता? क्योंकि सबसे बड़ा ट्विस्ट तो इसी सीन से फिल्म में आता है।
शाहरुख पूरी फिल्म में केवल कफील खान या बैंक के कर्ज से परेशान किसान आत्महत्याओं का राजनीतिक मसला ही नहीं उठाते बल्कि वो उन बिजनेसमैन का मुद्दा भी उठाते हैं, जिनका हजारों करोड़ बैंक माफ कर देते हैं। आम पब्लिक के दिमाग में जो बात राजनेता डालना चाहते थे, वो अब शाहरुख ने अपनी मूवी के जरिए डाल दी है कि कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए बैंक के कर्ज माफ करवा दिये जाते हैं।
शाहरुख खान ने यह भी दिखाने की कोशिश की है कि कैसे एक बिजनेसमैन अपनी मनमर्जी की सरकार चुनना चाहता है ताकि मनमर्जी का बिजनेस कर सके, सारे नियम कानून तोड़कर। सोच लीजिए इशारा कहां तक हो सकता है। ऐसे में शाहरूख के जबरा फैंस के लिए इस मूवी के हर सीन में मसाला तो है लेकिन राजनीतिक तड़का भी मौजूद है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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