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दूसरी बार मुख्यमंत्री बनकर भी अब पहले जैसा नहीं होगा उमर अब्दुल्ला का रुतबा

हाल ही में संपन्न हुए जम्मू कश्मीर विधानसभा के चुनावों में 42 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी नेशनल कांफ्रेंस के नवनिर्वाचित विधायकों ने आज अपनी बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को सर्वसम्मति से अपना नेता चुन लिया। उन्हें सहयोगी दल कांग्रेस के 6 विधायकों के साथ ही 4 निर्दलीय विधायकों का समर्थन प्राप्त है इस तरह अब उमर अब्दुल्ला का दूसरी बार मुख्य मंत्री बनना तय हो गया है। लेकिन दूसरी बार मुख्यमंत्री बनकर भी अब उनका रुतबा पहले जैसा नहीं होगा।

उमर अब्दुल्ला 2009 में जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तब जम्मू-कश्मीर एक पूर्ण राज्य था। 2019 में संविधान के अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावीकरण के जरिए जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा समाप्त कर उसे केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। इसलिए उमर अब्दुल्ला अब एक केंद्र शासित प्रदेश के मुख्यमंत्री कहलाएंगे जिसकी महत्वपूर्ण शक्तियां अब उपराज्यपाल को हस्तांतरित कर दी गई हैं।

Omar Abdullah

इसलिए उनकी स्थिति भी दिल्ली प्रदेश के मुख्यमंत्री जैसी ही होगी। बहुत से महत्वपूर्ण विषयों पर उनकी सरकार स्वतंत्र फैसले नहीं ले सकेगी । उनकी सरकार के महत्वपूर्ण फैसले उपराज्यपाल की स्वीकृति मिलने के बाद ही लागू किए जा सकेंगे। ऐसी स्थिति में इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री के अधिकारों में यह कटौती आगे चलकर‌ दिल्ली की भांति उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच टकराव की स्थिति पैदा करती रहेगी।

हो सकता है कि अरविंद केजरीवाल और उमर अब्दुल्ला की कार्यशैली में भिन्नता होने के कारण उपराज्यपाल के साथ उनके संबंधों में वैसी कड़वाहट देखने को न मिले जो दिल्ली में जब तब देखी जा सकती है लेकिन मुख्यमंत्री के अधिकारों में कटौती का मलाल तो उमर अब्दुल्ला को हमेशा सताता रहेगा । उमर अब्दुल्ला दिल्ली से जम्मू-कश्मीर की तुलना को उचित नहीं मानते। उनका कहना है कि दिल्ली को कभी भी पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त नहीं था जबकि जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य से केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया है। राज्य विधानसभा के चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि नेशनल कांफ्रेंस के नेतृत्व में गठित होने वाली नयी सरकार नवनिर्वाचित विधानसभा में सबसे पहले यही प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजेगी कि जल्द से जल्द जम्मू कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल किया जाए। उन्हें हमेशा उपराज्यपाल और केंद्र सरकार से तालमेल बनाकर सरकार चलाने की चुनौती का सामना करना होगा वैसे वे खुद भी मानते हैं कि उपराज्यपाल और केंद्र से तालमेल बना कर चलने से राज्य की विकास यात्रा को जारी रखना संभव हो पाएगा।

डेढ़ दशक पूर्व जब उमर अब्दुल्ला पहली बार जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे थे तो वे राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री होने का गौरव अर्जित किया था और जम्मू कश्मीर की जनता ने उनसे बहुत उम्मीदें लगा रखी थीं। शुरू में उन्होंने शिक्षा और रोजगार के मामलों में कुछ अच्छे कदम भी उठाए परंतु एक साल बाद ही राज्य में अलगाववाद के पनपने पर उनकी मुश्किलें बढ़ती गई। अलगाववाद की इस कठिन चुनौती से निपटने में उनकी असफलता से उनकी लोकप्रियता में भारी गिरावट आई और 2014 में संपन्न विधानसभा चुनावों में नेशनल कांफ्रेंस को सत्ता से बाहर होना पड़ा और राज्य में पहली बार पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन सत्ता पर काबिज हुआ। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के मुखिया मुफ्ती मोहम्मद सईद उस गठबन्धन सरकार के मुख्य मंत्री बने।

मुफ्ती मोहम्मद सईद के आकस्मिक निधन के बाद कुछ समय तक जम्मू-कश्मीर राष्ट्रपति शासन के आधीन रहा। फिर उनकी बेटी मेहबूबा मुफ्ती ने भाजपा और पीडीपी की गठबन्धन सरकार की मुख्यमंत्री बनीं लेकिन उनके कार्यकाल में भाजपा और पीडीपी के संबंध कभी मधुर नहीं रहे । मेहबूबा मुफ्ती के ऊपर आतंकवादियों और अलगाववादयों के साथ नरमी से पेश आने के आरोप भी लगे और अंततः भाजपा ने मेहबूबा मुफ्ती सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। राज्य में एक बार फिर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। 5 2019 को सरकार ने संसद में वह ऐतिहासिक ्बिल पेश किया जिसमें जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को समाप्त करने का प्रावधान था। केंद्र की मोदी सरकार के इस कदम की देश भर में सराहना हुई। इसी के साथ जम्मू-कश्मीर भी एक केंद्र शासित प्रदेश बन गया।

जम्मू कश्मीर में दस साल बाद विधानसभा के चुनाव कराये गये हैं लेकिन केंद्र शासित प्रदेश की इस विधानसभा में 90 निर्वाचित सदस्यों के अलावा 5 सदस्यों के मनोनयन का अधिकार उपराज्यपाल को दिया गया है। उमर अब्दुल्ला इसे उचित नहीं मानते। मुख्यमंत्री का कहना है कि इन सदस्यों के नाम उपराज्यपाल को राज्य सरकार की सलाह से तय करना चाहिए। उपराज्यपाल अगर अपनी मर्जी से यह नाम तय करते हैं तो विपक्ष में बैठना मनोनीत विधायकों की मजबूरी बन जाएगी ।

गौरतलब है कि जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती की पार्टी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी भी इस बार सदन के अंदर विपक्ष में बैठेगी जो 1999 में अपने गठन के बाद इस बार सबसे कम तीन सीटों पर सिमट कर रह गई है। नये सदन में आम आदमी पार्टी और सीपीएम ने भी एक एक सीट पर जीत हासिल की है । उमर अब्दुल्ला की सरकार को सीपीएम का भी समर्थन प्राप्त होगा क्योंकि वह इंडिया गठबंधन का हिस्सा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र शासित प्रदेश के रूप में जम्मू-कश्मीर की पहली सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में इंडिया गठबंधन के कितने दलों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं।

(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)

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