Israel Arab War: एक ऐसा युद्ध जिसका कोई अंत नहीं
Israel Arab War: शनिवार की सुबह इजराइल पर हमास के भीषण हमले के बाद इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने जो पहला संदेश जारी किया उसमें कहा "हम युद्ध में हैं और हम इसे जीतेंगे।" उन्होंने यह नहीं कहा कि हम पर हमला हुआ है। न ही उन्होंने यह कहा कि हम इसका मुंहतोड़ जवाब देंगे। उन्होंने जिन शब्दों का इस्तेमाल किया उसके अर्थ बहुत गहरे हैं और इतिहास में हजार साल तक पीछे जाते हैं।
इजराइल देश का नाम बाद में हुआ उसके पहले यह जैकब का उपनाम था। जैकब मतलब यहूदियों के पितामह माने जाने वाले इब्राहिम के पोते और इशाक के बेटे। जैकब ने जब जब स्वर्गदूतों के साथ कुश्ती लड़ी तो उन्हें यह नाम दिया गया इजराइल, जिसका अर्थ होता है ईश्वर का योद्धा। यहूदी मान्यताओं के मुताबिक जैकब के जो 12 बेटे हुए, उन्हीं से यहूदियों के 12 कबीले बने और सब अपने आप को इजराइल का वंशज यानी 'ईश्वर का योद्धा' मानते हैं। इस्लामिक किताबों में इन्हीं की पहचान 'बनी इजराइल' के तौर पर की जाती है।

इजराइल और फिलिस्तीन के झगड़े की शुरुआत भी इस्लाम के उदय के साथ ही हो गयी। जो इस्लामिक किताबें लिखी गयीं उनमें 'बनी इजराइल' को अल्लाह का दुश्मन घोषित किया गया और उनसे लड़ने का आदेश दिया गया। कुरान हो या इस्लामिक हदीसें उनमें इस्लाम के मानने वालों को बताया गया कि वो इजराइल की संतानों से श्रेष्ठ हैं। हदीसें लिखी गयीं कि कैसे उनके पैगंबर ने मदीना से इनका सफाया कर दिया था। इस्लामिक किताबों के मुताबिक मदीना में उस समय तीन यहूदी कबीले थे। बनू कुनैजा, बनू कुरैजा और बनू नादिर। इसमें से बनू कुरैजा के सफाये का विस्तृत विवरण हदीस की प्रामाणिक पुस्तकों में दिया गया है।
ऐसे में यहूदियों से लड़ाई करना मुसलमानों के लिए अपने ईमान पर अमल करना है। वो दुनिया भर में जहां होते हैं इजरायलियों को लानते भेजते हैं। मौका मिलते ही मारने का प्रयास भी करते हैं। जैसे हमास के हमले के बीच मिस्र में एक पुलिसवाले ने ही दो यहूदी टूरिस्टों को गोली मार दी। खुद हमास के मुजाहिदों ने इजराइल के भीतर घुसकर जिस तरह की बर्बरता दिखाई है उससे यहूदियों के प्रति उनकी नफरत साफ दिखाई देती है।
याद करिए 2008 का मुंबई पर पाकिस्तानी आतंकवादियों का हमला। मुंबई हमले के दौरान यहूदी समुदाय के कॉफी हाउस लियोपोल्ड कैफे को भी निशाना बनाया गया था और आतंकियों ने 10 लोगों की हत्या कर दी थी। मतलब पाकिस्तान में बैठे आतंकियों ने जब मुंबई पर आतंकी हमले का प्लान बनाया तो उन्हें यह पता था कि मुंबई में कुछ यहूदी भी रहते हैं इसलिए उनके कॉफी हाउस को निशाना बनाया गया ताकि यहूदियों को मारकर सुन्नत पर अमल किया जा सके।
इसलिए हमास के ताजा हमले के बाद बेंजमिन नेतन्याहू ने बहुत चुनकर "हम युद्ध में हैं और हम इसे जीतेंगे" शब्द का प्रयोग किया। यहूदी जानते हैं कि वो चाहें न चाहें उन्हें युद्धभूमि से बाहर जाने नहीं दिया जाएगा। इसलिए नेतन्याहू ने साफ साफ हम युद्ध में हैं, शब्द का प्रयोग किया है। अब हर यहूदी यह समझ गया है जब तक धरती पर इस्लामिक किताबों पर ईमान लानेवाले मुसलमान हैं वो चाहें न चाहें उन्हें इस युद्ध में घसीटा जाता रहेगा। इसलिए 1948 में ब्रिटिश आधिपत्य वाले फिलिस्तीन से अलग करके ब्रिटिश शासकों ने जब यहूदियों को अपना देश इजराइल दे दिया उसके बाद उन्होंने एक कौम के रूप में नहीं बल्कि एक राष्ट्र के रूप में चुनौतियों का सामना करने की योजना पर काम शुरु किया।
1948 में एक देश के रूप में इजराइल को पा लेने के बाद यहूदियों ने समझ लिया कि वो एक ऐसे युद्ध में हैं जिसका कभी कोई अंत नहीं होगा। उन्हें इसी युद्ध में अपने आप को जिन्दा रखना है इसलिए न केवल आर्थिक और वैज्ञानिक रूप से बल्कि सैन्य और सामरिक रूप से भी उन्होंने अपने आप को संगठित किया।
इसलिए 1967 में पहली बार यहूदियों ने किसी युद्ध में ऐतिहासिक विजय प्राप्त की। इस युद्ध में इजराइल की संतानों ने गाजा पट्टी, वेस्टबैंक, सिनाई और गोलान हाईट्स को कब्जे में ले लिया। इस युद्ध के बाद लगभग दस लाख अरब मुस्लिम यहूदियों के कब्जे में आ गये। इसके बाद 1995 में जो ओस्लो समझौता हुआ तो वेस्ट बैंक के तीन हिस्से कर दिये गये। एक हिस्सा वह जिस पर फिलिस्तीनियों का शासन है। एक हिस्सा वह जिस पर इजराइल का शासन है और एक हिस्सा वह जिस पर दोनों का संयुक्त शासन है।
वेस्ट बैंक में 4.5 लाख यहूदी और लगभग 25 लाख फिलिस्तीनी रहते हैं। मेनलैण्ड इजराइल में 60 लाख यहूदी और 16 लाख फिलिस्तीनी रहते हैं। सिर्फ गाजापट्टी वो जगह है जो पूरी तरह से फिलिस्तीनियों के कब्जे में है और वहां एक भी यहूदी नहीं रहता। यही गाजापट्टी पर अब इखवानुल मुसलमीन (मुस्लिम ब्रदरहुड) से अलग होकर बने हमास का कब्जा है। वैसे तो वेस्टबैंक के इलाके में इजराइली और फिलिस्तीनियों के बीच रोजाना का संघर्ष रहता है लेकिन इस बार इजराइल के खिलाफ जो हमला गाजापट्टी की ओर से हुआ वो बहुत योजनाबद्ध तरीके से हुआ जिसमें 1967 के बाद पहली बार इजराइल को इतना बड़ा नुकसान हुआ है।
लेकिन इजराइल और फिलिस्तीन के झगड़े की जड़ 1948 में नहीं है जब ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने यहूदियों को इजराइल सौंपा था। इसकी जड़ें उससे अधिक गहरी हैं जो टेम्पल ऑन माउण्ट या फिर डोम ऑफ द रॉक में निहित हैं। वेस्टबैंक में इजराइल फिलिस्तीन संघर्ष भले ही कल को गाजा पट्टी तक सिमट जाए लेकिन येरुसलेम पर जो इस्लामिक दावा है वह भला मुसलमान कैसे छोड़ देगा? अगर ओल्ड जेनेसिस (हिब्रू बाइबल) उसे किंग डेविड का शहर बता रहा है तो इस्लाम भी अपने पैगंबर के मेराज का सफर भी यहीं से करवा रहा है। बात अगर जमीन की हो तो एकबार को जीत हार से फैसला हो भी जाता है लेकिन यहां तो मसला मजहब और ईमान का है।
इसलिए अगर बेंजामिन नेतन्याहू यह कह रहे हैं कि 'हम जीतेंगे' तो निश्चित ही इसके लिए इजराइल की संतानों ने पीढियों के संघर्ष का खाका जरूर खींचा होगा। पच्चीस पचास साल में तो इस युद्ध का कोई परिणाम निकलने वाला नहीं है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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