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Pasmanda Muslim Reservation: क्या तेलंगाना का पसमांदा मुस्लिम आरक्षण असंवैधानिक है?

हाल में ही तेलंगाना में अमित शाह ने कहा है कि राज्य में बीजेपी की सरकार आयी तो वह पसमांदा मुस्लिमों को दिये जा रहे आरक्षण को समाप्त कर देगी क्योंकि यह असंवैधानिक है। लेकिन आखिर सच क्या है?

Is Telanganas Pasmanda Muslim Reservation Unconstitutional?

Pasmanda Muslim Reservation: करीब दो सप्ताह पहले तेलंगाना के रंगारेड्डी जिले के चेवेल्ला में 'विजय संकल्प सभा' के नाम से आयोजित एक जनसभा को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पसमांदा मुस्लिमों (मुस्लिम धर्मावलंबी आदिवासी, दलित एवं पिछड़े) को ओबीसी की केटेगरी बीसी-ई में मिल रहे 4 प्रतिशत आरक्षण को धर्म आधारित बता असंवैधानिक करार दिया। उन्होंने कहा कि अगले विधानसभा चुनाव में तेलंगाना में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनते ही ऐसे सभी असंवैधानिक आरक्षण को समाप्त कर दिया जाएगा।

इस बयान का विरोध करते हुए एआईएमआईएम प्रमुख असद्दुदीन ओवैसी ने पसमांदा के आरक्षण का बचाव किया। हैरत की बात है कि जब इसी आरक्षण यानी ओबीसी की केटेगरी बीसी-ई (4%) में पसमांदा मुसलमानों की ओबीसी आरक्षण से बची हुई अर्ह जातियों को शामिल करने की बात हो रही थी तो ओवैसी ने वर्तमान सरकार पर मुसलमानों को बांटने का आरोप लगाते हुए इसका बहुत तीव्र विरोध किया था। ज्ञात रहे कि बीसी-ए और बीसी-बी में मेहतर और दूदेकुला, नूरबाश, पिंजारी पहले से शामिल हैं।

ओवैसी ने पीएस कृष्णन द्वारा तैयार किए जिस डाटा को एंप्रिकल डाटा बता कर अमित शाह का विरोध करते हुए आरक्षण को न्यायोचित ठहराया है, उसी डाटा को इन्होंने उस समय आउटडेटेड डाटा बताकर खारिज किया था और पीएस कृष्णन की कटु आलोचना करते हुए आरोप लगाया था कि कृष्णन मुसलमानों में भी जातिवाद बढ़ाना चाहते हैं।
सिर्फ इतना ही नहीं हैदराबाद के चोटी के अशराफ उलेमा ने आरक्षण के खिलाफ फतवा भी दिया कि इस्लाम के हिसाब से पसमांदा मुस्लिमों को आरक्षण देना ठीक नहीं है और यह मुसलमानों को बांटने की चाल है। विभिन्न इस्लामी संस्थानों ने भी इनका साथ देते हुए पसमांदा को आरक्षण का विरोध किया था।

ये लोग आरक्षण के लिए योग्य शैक्षिक एवं सामाजिक रुप से पिछड़े मुसलमानो की जातियों (पसमांदा) के स्थान पर पूरे मुस्लिम समुदाय के लिए आरक्षण की मांग कर रहे थे। यहां गौरतलब है कि सामाजिक न्याय का आरक्षण शैक्षिक और सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर है। धार्मिक पहचान के आधार पर आरक्षण संविधान सम्मत नहीं है। एससी आरक्षण को छोड़ कर इसमें ईसाई और मुस्लिम धर्म के दलित अभी भी बाहर हैं। ओवैसी की पार्टी ने विधान सभा में इस आरक्षण के बिल का विरोध कर अपने पसमांदा मुस्लिम विरोधी चरित्र को जाहिर कर दिया था।

ओवैसी, विभिन्न इस्लामी संगठन और अशराफ उलेमा एकजुट होकर पूरी शक्ति के साथ मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय का विरोध करते हुए पसमांदा आरक्षण के विरुद्ध खड़े थे ऐसे समय में एक हिन्दू ब्राह्मण पीएस कृष्णन, सामाजिक न्याय की आबरू बनकर सामने आते हैं।

ओवैसी और अशराफ उलेमा का यह तर्क था कि इस्लाम में जाति नहीं है इसलिए सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े मुस्लिम जातियों को आरक्षण न देकर सभी मुसलमानों को आरक्षण दिया जाय। कृष्णन ने वंचित पसमांदा के आरक्षण को विवादित होने से बचाने के लिए बड़े ही कौशल से अपने न्यायिक चरित्र का प्रदर्शन करते हुए कास्ट (जाति) शब्द का अपनी 281 पेज की रिपोर्ट में नाम तक नहीं लिया। इसकी जगह ग्रुप (समूह) शब्द का प्रयोग करते हुए अनुशंसा की कि 13 विभिन्न मुस्लिम समूह ओबीसी आरक्षण के पात्र हैं। इस प्रकार देशज पसमांदा के सामाजिक न्याय का मार्ग प्रशस्त किया।

ऐसा प्रतीत होता है कि ओवैसी इस विरोध की आड़ में एक ओर देशज पसमांदा समाज को प्रधानमंत्री के पसमांदा नीति के प्रति भ्रमित करने का प्रयास कर रहें हैं तो दूसरी ओर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आए मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय के मुद्दे पर कुठाराघात कर इस मुद्दे को कमज़ोर करना चाह रहें हैं, ताकि उनका मुस्लिम सम्प्रदायिकता का विमर्श जिन्दा रहे। याद रखें कि सम्प्रदायिकता और सामाजिक न्याय एक दूसरे के विपरीत हैं। यानी अगर सम्प्रदायिकता बढ़ेगी तो सामाजिक न्याय घटेगा और सामाजिक न्याय बढ़ेगा तो सम्प्रदायिकता घटेगी।

गृह मंत्री अमित शाह ने कर्नाटक सरकार द्वारा ओबीसी की केटेगरी 2 बी (एक्सक्लूसिव मुस्लिम आरक्षण-4%) को समाप्त करने की कड़ी के रूप में जोड़ते हुए तेलंगाना के ओबीसी की केटेगरी बीसी-इ (4%) को समाप्त करने की बात की है। जबकि कर्नाटक के ओबीसी के केटेगरी 2 बी और तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश के ओबीसी की केटेगरी बीसी-इ में मूलभूत रूप से बहुत अंतर है। जहां कर्नाटक वाला 2 बी (एक्सक्लूसिव मुस्लिम आरक्षण) आरक्षण शुद्ध रूप से धार्मिक पहचान पर आधारित था, यहां तक कि इस कैटेगरी के लिए बनने वाले सर्टिफिकेट पर भी कास्ट के आगे मुस्लिम लिखा रहता था जो संविधान सम्मत नहीं था। यहां गौरतलब है कि सामाजिक न्याय के आरक्षण के लिए अर्ह मुस्लिमों की अधिकतर पसमांदा जातियों को पहले से ही ओबीसी के कैटिगरी 1 (4%), 2A (15%) और एसटी (7%) में रखा गया है, जो यथावत बरकरार भी है। यानी पसमांदा जातियों को पहले की तरह ओबीसी के 19% और एसटी के 7% आरक्षण का लाभ मिलता रहेगा।

जबकि तेलंगाना और आंध्रा के ओबीसी की केटेगरी बीसी-इ (4%) मजहबी पहचान/धर्म के आधार पर नहीं बल्कि शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़े होने की पहचान के आधार पर चिन्हित पिछड़ी मात्र 13 मुस्लिम जातियों को ही दिया गया है। बाकायदा इन एक एक जातियों का स्थानीय नाम तेलुगु भाषा में लिखा हुआ है। ठीक इसी प्रकार केटेगरी बीसी-सी में केवल ईसाई धर्म की वंचित जातियां दर्ज हैं।

हां यह बात ठीक है कि इन दोनों कैटिगरी में केवल मुस्लिम और ईसाई धर्म विशेष की वंचित जातियां ही दर्ज हैं जिससे यह भ्रम उत्पन्न होता है कि यह आरक्षण धर्म के आधार पर है जबकि यह पूरी तरह से संवैधानिक मंशा के अनुरूप शैक्षिक एवं सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर है। इस भ्रम को दूर करने के लिए ओबीसी के वर्गीकरण पर पुनः विचार किया जा सकता है और बिहार मॉडल के अनुरूप ओबीसी आरक्षण का धर्म निरपेक्ष वर्गीकरण किया जा सकता है। ना कि इनका आरक्षण ही समाप्त कर दिया जाय जो कि असंवैधानिक होगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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