Inflation: पूंजी निवेशक मालामाल, कम कमाई वालों का जीना मुहाल
Inflation: भारतीय शेयर बाजार के संवेदी सूचकांक का छोटी मोटी गिरावट के बावजूद 71 हजार के ऊपर के रिकॉर्ड स्तर पर रहना इस बात का संकेत है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में निवेशकों का भरोसा कायम है। थोड़े उतार-चढ़ाव के साथ बाजार में चहल-पहल है, बेंचमार्क इंडेक्स का प्रदर्शन भी संतोषजनक बताया जा रहा है लेकिन करीब दो महीने पहले बाजार में आम उपभोक्ता वस्तुओं की खुदरा कीमतों में गिरावट की वजह से आम लोगों को जो राहत मिली थी वह एक बार फिर छिनती हुई दिख रही है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी एनएसओ की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक खाने-पीने की वस्तुओं के दाम में बढ़ोतरी की वजह से खुदरा महंगाई दर पिछले तीन महीने के उच्च स्तर यानी 5.5 प्रतिशत पर पहुंच गई है। आटा, दाल, नमक, तेल, चावल आदि के लगातार बढ़ते दामों से कम कमाई पर गुजर-बसर करने वालों का जीवन और अधिक कठिन होता जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि बीते अगस्त महीने से खाद्य वस्तुओं के दाम में कमी आने की वजह से महंगाई दर में लगातार कमी दर्ज की जा रही थी। यही कारण है कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई अक्टूबर के महीने में 4.57 प्रतिशत पर आ गई थी। तब लोगों के मन में यह आस जगी थी कि कोरोना महामारी के बाद से बाजार में जिन बहुत सारी जरूरत की वस्तुओं तक आम आदमी की पहुंच नहीं हो पा रही थी, उससे अब धीरे-धीरे राहत मिलेगी। बाजार के जानकारों ने भी ऐसी ही भविष्यवाणियां की थी। मगर दुर्भाग्य से यह भाव ज्यादा दिन तक स्थाई नहीं रह सका। अक्टूबर महीने में रोजमर्रा के जरूरी सामानों की कीमतों में नरमी की वजह से जो आस जगी थी वह नवंबर में ही छीन गई। दिसंबर के पहले पखवाड़े में बाजारी कारोबार के बढ़ने के चलते शेयर के भाव तो उंचे चढ़ते गए, पर महंगाई डायन भी अपना डायना फैलाने लगी।
वर्तमान में महंगाई दर 5.5 प्रतिशत आंकी गई है। हालांकि यह रिजर्व बैंक की ओर से तय अधिकतम सीमा के दायरे में ही है, लेकिन यह महंगाई की ओर रेखांकित करने वाली सीमा रेखा के करीब भी है। मालूम हो कि वस्तुओं की खुदरा कीमतें इस स्तर पर पहुंचने के बाद एक बड़ी आबादी खाने-पीने तक को लेकर अपने हाथ समेटने लगती है। हालांकि माना जाता है कि ठंड के मौसम की शुरुआत के बाद खासतौर पर बाजार में सब्जियों की आमद बढ़ने की वजह से कीमतों में कमी आती है लेकिन ताजा आंकड़े इसके अनुकूल नहीं दिखाई दे रहे हैं।
यह सही है कि करीब तीन साल पहले कोरोना महामारी की वजह से जो हालात पैदा हुए उससे उबरने में देश को काफी समय लगा और अब भी कई क्षेत्र खुद को संभालने की लगातार कोशिश में है। बहुत सारे मामलों में बाजार में सहजता आई है और इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर भी देखने में आया है। निवेशकों के भरोसे के कारण शेयर बाजार की उड़ान इसी का नतीजा है। कमजोर वैश्विक आर्थिक संकेतों के बावजूद भारत में शेयर बाजारों के सूचकांक हौसला देने वाले हैं। भारत की सार्थक उड़ान के पीछे दूरगामी संभावनाओं के साथ-साथ तात्कालिक वैश्विक तथा घरेलू कारक भी हैं। भारत की मजबूत आर्थिक बुनियाद निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण साबित हुई है। वैश्विक विकास भले ही सुस्त हो पर भारतीय बाजार में तेजी के लक्षण हैं।
चीन की अर्थव्यवस्था में मंदी की वजह से दुनिया के निवेशक अब चीन की जगह भारत को प्राथमिकता दे रहे हैं। 'भारत में बेचें-चीन में खरीदे' की रणनीति में बदलाव लाते हुए विदेशी निवेशकों ने 'भारत में खरीदे और चीन में बेचें' को महत्व देना शुरू कर दिया है। इसके अलावा विदेशी निवेशक विकसित दुनिया के देश खासकर अमेरिका भारत को चीन प्लस वन नीति का प्रमुख साझेदार मानते हैं। चीन के प्रति बदलती धरणा ने भारत में बड़े पैमाने पर विदेशी संस्थागत निवेश (एफपीआई) के प्रवाह को गति दी है।
इस वर्ष के पहले दो महीनों में लगभग 35,000 करोड़ रुपए के शेयर बेचने वाले एफपीआई बड़े पैमाने पर अब खरीदार बन गए और मई के बाद से अब तक सवा लाख करोड़ रुपए से अधिक के शेयर खरीदार बन गए। भारतीय रिजर्व बैंक के मुताबिक वर्ष 2023-24 के लिए मुद्रा स्फीति 5.1% अनुमानित है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में बदलाव के कारण डॉलर के मुकाबले रुपया अभी भी कमजोर बना हुआ है। अगला साल चुनावी साल है इसलिए मौद्रिक नीतियों के कठोर होने की संभावना ना के बराबर है, फिर भी स्थिरता को बनाए रखने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक को खुदरा मुद्रास्फीति की दर को नियंत्रण में रखने के लिए फौरी कदम उठाने ही चाहिए। इन सबके बावजूद समग्र आर्थिक सूचक भारतीय अर्थव्यवस्था की दूरगामी संभावनाओं की गुलाबी तस्वीर पेश कर रहे हैं।
अब जबकि आर्थिक स्थितियों में सुधार आने के साथ-साथ औद्योगिक से लेकर खाद्यान्न उत्पादन के स्तर पर भी अच्छी उम्मीदें जगी हैं तब ऐसी स्थिति में बढ़ती महंगाई न सिर्फ चौंकाने वाली है बल्कि एक प्रतिकूल स्थितियों के पैदा होने का संकेत देने वाली है। खास तौर पर खाने-पीने के सामान की कीमतें अगर आम लोगों की पहुंच से दूर होने लगती है तो इसका सीधा असर उनके बाकी के खर्चों और उनसे जुड़े हुए लोगों के जीवन पर भी पड़ता है। महंगाई के मोर्चे पर तात्कालिक राहत मिलने के बाद उम्मीद के धुंधले होने की वजह कोई छिपी नहीं रही है। खुदरा मुद्रा स्फीति में तेजी के लिए खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेज बढ़ोतरी को जिम्मेदार ठहराया गया है।
नवंबर महीने से ही खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी लगातार जारी है जिसके कारण खाद्य महंगाई दर 8.70 % जा पहुंची है। यह अक्टूबर महीने में 6.61 प्रतिशत थी। सवाल यह है कि अगर महंगाई बढ़ने के लिए इस कारण को चिन्हित किया गया है तब सरकार हाथ पर हाथ धर कर क्यों बैठी है? सरकार के संबंधित महकमें यह सुनिश्चित करने में नाकाम क्यों हो जाते हैं कि बाजार की मांग के अनुपात में जरूरी वस्तुओं खासतौर पर खाने-पीने के सामान की आपूर्ति में सहजता बनाकर रखी जा सके।
यह सब जानते हैं कि अगर मौसम में उथल-पुथल से उत्पादन प्रभावित होने या फिर अन्य वजह से बाजार में किसी वस्तु की आपूर्ति कम होती है तो इसका फायदा उठाकर कुछ कारोबारी कीमतों के मामले में मनमानी करना शुरू कर देते हैं। मतलब साफ है कि उत्पादन से लेकर आपूर्ति और बिक्री के स्तर पर उपजने वाली मुश्किल या फिर अव्यवस्था को अगर सही समय पर नियंत्रित नहीं किया जाता तो इसका असर वस्तुओं की खुदरा कीमतों पर ही पड़ता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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