Inflation: मंहगाई काबू में तो क्या त्यौहारी सीजन में सुधरेगा बाजार का हाल?
Inflation: देश का औद्योगिक उत्पादन पिछले पांच महीने के उच्चतर स्तर पर पहुंचा है, वहीं त्यौहारी सीजन के शुरू होते ही आम उपभोक्ताओं के लिए महंगाई के मोर्चे पर भी संतोषजनक खबर आई है। साग सब्जियों के दाम में नरमी बने रहने के कारण अगस्त में मुद्रास्फीति की दर घटकर 6.83 प्रतिशत पर आ गई है। हालांकि यह अब भी भारतीय रिजर्व बैंक के संतोषजनक चार प्लस माइनस दो के स्तर से मामूली ऊपर है, लेकिन राहत देने वाला है, क्योंकि पिछले महीने खुदरा महंगाई की दर डेढ़ साल के सर्वोच्च 7.44 प्रतिशत तक पहुंच गई थी।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार खाद्य मुद्रास्फीति अगस्त महीने में 9.94 प्रतिशत रही जो इसके पिछले महीने जुलाई में 11.5 प्रतिशत थी। जानकारी के मुताबिक तेल और वसा उत्पादन के साथ-साथ मांस मछली अंडा चीनी कन्फेक्शनरी गैर अल्कोहलिक पेय पदार्थ फल तथा तैयार भोजन एवं नमकीन चिप्स आदि में भी सालाना आधार पर महंगाई के स्तर में गिरावट दर्ज की गई है।

चालू महीने में महंगाई पर कमोबेश अंकुश लगा है तो औद्योगिक उत्पादन में बढ़त हासिल हुई है। एनएसओ के अनुसार वित्त वर्ष 2023-24 के पहले 4 महीने, अप्रैल से लेकर जुलाई तक आईआईपी वृद्धि 4.8% रही जो एक साल पहले इसी अवधि में 10% थी। मार्च 2020 से कोरोना महामारी के कारण परिस्थितियां असामान्य थी। लेकिन सरकार ने दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय देते हुए ठोस कार्य नीति के साथ बिजली उत्पादन में 8%, खनन उत्पादन में लगभग 11%, और उपयोग आधारित पूंजीगत वस्तुओं के मोर्चे पर 4.6 प्रतिशत की वृद्धि हासिल की है।
त्यौहारी सीजन में आम उपभोक्ताओं की बाजार में चहल-पहल अमूमन बढ़ जाती है। ऐसे में निश्चित रूप से महंगाई को काबू में रखना राहत देने वाली खबर है। हालांकि अभी भी यह बहुत खुश होने जैसी स्थिति नहीं है, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ही निर्धारित दो प्रतिशत घट बढ़ के साथ 6% के दायरे से यह थोड़ा ऊपर है। इस महीने खाने-पीने की चीजों की दामों में कमी आई है।
लेकिन इससे इतर खाद्य वस्तुओं एवं सब्जियों की कीमतों को लेकर स्थानीय बाजारों का आकलन किया जाए तो सरकारी आंकड़ों से अलग तस्वीर उभरती है। आम उपभोक्ता आज भी जब सब्जी या फल की दुकान के सामने से गुजरता है तो पहले कसमसाता है और फिर अक्सर अपनी ही जेब टटोलता नजर आता है। आम आदमी की जेब अभी खुलकर खरीदारी करने की इजाजत नहीं दे रही है। खुदरा बाजार के ताजा आंकड़े संतोष दे रहे हैं, इसे आम उपभोक्ता के लिहाज से अच्छा माना जा रहा है लेकिन अभी सुधार की जरूरत है। हर घर की रसोई में इस्तेमाल किये जानेवाले खाद्य तेल के दाम में कुछ नरमी आई है लेकिन आटा, चावल, मसाला, दाल, सब्जियां इन सबकी कीमतें चुपचाप धीरे-धीरे बढ़ती ही जा रही है।
कीमतों को काबू करने के प्रयास के तहत सरकार ने गेहूं चावल का भंडार खुले बाजार में जारी करने, चीनी के निर्यात पर रोक लगाने और दलहन, तिलहन के आयात की अनुमति देने जैसे अनेक कदम उठाए हैं। महंगाई दर पर इसका सीधा असर दिख रहा है। बाजार विशेषज्ञ भी आशा व्यक्त कर रहे हैं कि आने वाले दिनों में महंगाई की दर और अधिक काबू में आएगी।
कोरोना महामारी के बाद से ही बाजार में उतार चढ़ाव के साथ महंगाई और मंदी का खतरा आम लोगों को आशंकित करता रहा है। दुनिया के बड़े-बड़े बैंकों के दिवालिया हो जाने, और महामारी के दौरान भारत में बेरोजगारी दर में अप्रत्याशित रूप से उछाल आने से कारोबार में गतिरोध उत्पन्न हुआ था, उसका डर अब भी आम लोगों में व्याप्त है। लेकिन धीरे-धीरे स्थितियां बदल रही है। बाजार सुधार रहे हैं जमीन और मकान की कीमतें भी बढ़ने लगी है। लेकिन जिन लोगों की जिंदगी पटरी से उतर चुकी थी उनकी मुसीबतें किसी न किसी रूप में अब भी बनी हुई है।
ऐसे में महंगाई को काबू में रखने से इस वर्ग में भरोसा पैदा हुआ है। कम बजट के बावजूद यह वर्ग बाजार तक पहुंच रहा है, जिससे कारोबारी गतिविधियां बढ़ने की आशा जगी है। भारत की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए स्थानीय बाजार में जरूरी मांग की आवश्यकता होती है और अगर महंगाई दर काबू में रही तो निश्चित रूप से लोग बाजार की गतिविधियों में हिस्सा लेंगे। मालूम हो कि जल्दी ही शुरू होने वाले नवरात्र से लेकर होली तक किसी न किसी बहाने बाजार में खरीदारी आती है। कोरोना के बाद जो लोग हाथ बांधकर बैठे रहे अगर वे खुलकर बाजार में आ जाते हैं तो हमारी अर्थव्यवस्था को भी बड़ी मजबूती प्राप्त होगी।
बहरहाल सरकारी आंकड़ों से आम आदमी का बहुत कुछ लेना-देना नहीं होता है। रोज कमाने खाने वाले लोगों को आए दिन दुकानदारों से दो-चार होना पड़ता है। इसलिए सरकार को ऐसे उपाय खोजने होंगे जिससे खाद्य वस्तुएं लोगों की पहुंच से बाहर न होने पाए। चूंकि महंगाई का सबसे अधिक असर निम्न और निम्न मध्य वर्ग के लोगों पर पड़ता है, और यह वर्ग अपना बजट संतुलित बनाए रखने में अभी भी उतना सहज नहीं हो सका है जितना होना चाहिए। इसलिए भी सरकार को त्यौहारी सीजन को ध्यान में रखते हुए महंगाई को बांधे रखने के लिए और भी चुस्त दुरुस्त नीति के साथ आगे आना चाहिए। आखिरकार महंगाई के आग पर पानी पड़ने से सबसे अधिक सहूलियत गरीब परिवारों को ही होती है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications