Inflation: महंगाई बन रही है रिजर्व बैंक के समक्ष चुनौती

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा नीतिगत रेपो दर स्थिर रखते हुए महंगाई पर काबू रखने के प्रयास अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। खाद्य उत्पादों की कीमत बढ़ने से जून में खुदरा महंगाई बढ़कर तीन महीनों के उच्च स्तर 4.81% पर पहुंच गई है।

ताजा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर मुद्रास्फीति के आंकड़े जारी करते हुए सरकार ने महंगाई के लिए भारी बारिश के चलते देश के प्रमुख उत्पादक राज्यों में सब्जियों के फसल खराब होने को मुख्य कारण बताया है।

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वर्तमान में खाद्य महंगाई का आलम यह है कि दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा टमाटर उत्पादक देश होने के बावजूद भारत में टमाटर आम ही नहीं, खास लोगों की भी पहुंच से दूर होता जा रहा है।

पिछले दिनों जब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने इस वित्त वर्ष में दूसरी दफा रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया तो बाजार के जानकार लोगों के कान खड़े हुए थे। बाजार कयास लगाए बैठा था कि कुछ तो कटौती जरूर होगी। सरकार के आर्थिक संतुलनकारों ने कोशिश तो बहुत की पर महंगाई अब तक रिजर्व बैंक के पूरे नियंत्रण में नहीं आई है। कुछ समय के लिए भले ही यह छह प्रतिशत से नीचे आई थी, लेकिन, अमूमन इसकी चाल ऊपर की ओर ही ज्यादातर दिखाई देती रही। पर क्या महंगाई अब उतना प्रमुख मुद्दा नहीं रह गया है?

यहां यह गौर करने लायक है कि अब महंगाई के छह प्रतिशत से थोड़ा नीचे आने पर ही केंद्र सरकार राहत की सांस लेने लगती है। पांच-छह प्रतिशत के इर्द गिर्द आने पर महंगाई की चाल नीचे की तरफ होने की बातें होने लगती हैं। याद करें कि पिछले साल नवंबर और दिसंबर में ही खुदरा महंगाई (सीपीआई) छह प्रतिशत से नीचे आई थी। यह इसके पिछले 11 महीनों से छह फीसद से ऊपर चल रही थी। दो महीनों की सुस्ती के बाद इस साल इसने फिर बढ़ना शुरू किया। जनवरी में यह 6.52 फीसद और फरवरी में 6.4 फीसद के स्तर पर पहुंच गई। लेकिन बाद में इसमें तेजी से गिरावट दर्ज की गई।

मई में खुदरा मुद्रास्फीति 4.31% रही थी जबकि साल भर पहले जून 2022 में यह 7% थी। जून में खाद्य उत्पादों की मुद्रास्फीति 4.49% थी जबकि मई में यह 2.96% थी। भारतीय रिजर्व बैंक ने पिछले महीने की मौद्रिक समीक्षा में नीतिगत रेपो दर को 6.5% पर कायम रखा था, इसके साथ ही उसने अप्रैल-जून तिमाही में खुदरा मुद्रास्फीति के 4.6% रहने का अनुमान जताया था।

रिजर्व बैंक ने हालांकि महंगाई को लेकर चिंता जरूर जताई है। यह उसके बर्दाश्त की ऊपरी सीमा चार फीसद से फिर भी अधिक है। मौजूदा वित्त वर्ष में महंगाई के बारे में अनुमान है कि यह 5.1 फीसद रह सकती है। सरकार का मंसूबा खुदरा महंगाई को आदर्श स्थिति में चार फीसद दायरे में रखना होता है। इसके बावजूद रेपो रेट में कोई बदलाव न होना आर्थिक पहेली की तरह तो है ही आगे और महंगाई के बढ़ने का संकेतक भी हो सकता है।

समस्या को सिरे से समझने के लिए केंद्रीय बैंक के आकलन के बारे में ही बात की जाए। यह उसका अनुमान भर है। लेकिन, विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संस्थान अंदेशा जता चुके हैं कि यह साल दुनिया के लिए चुनौतीपूर्ण होने वाला है। मंदी आनी ही है। दुनिया की विकास दर में गिरावट तय है। खाद्यान्न संकट टलने के आसार नहीं है।

यही वजह है कि अमेरिकी फेडरल बैंक ने ब्याज दरों में इजाफे का सिलसिला बरकरार रखा। यह जरूर है कि पिछली दफा ब्याज दरें महज चौथाई प्रतिशत बढ़ाई। इसके मुखिया जेरोम पॉअल ने साफ कहा कि महंगाई को दो प्रतिशत तक लाना ही पड़ेगा। काबिलेगौर है कि तीन बैंकों के फेल होने के बाद भी फेडरल बैंक ने अपना रुख नहीं बदला था। लेकिन इस बार भी बरकरार रखा तो दुनिया के कई बैंकों को अपनी चाल बदलनी ही पड़ेगी।

लेकिन, इसके उलट महंगाई के चार फीसद तक आने की अब कोई बात भी नहीं करता। 5.1 प्रतिशत के अनुमान के बावजूद भारतीय रिजर्व बैंक ने कोई नीतिगत बदलाव नहीं किया। तो क्या भारत के लिए स्थितियां आसान है? ग्लोबल बदलाव से क्या हम लोग पूरी तरह बचे हुए हैं? अगर यह सही होता तो दीपक पारेख जैसे सम्मानित बैंकर यह न कहते कि दुनिया के आर्थिक हालात से कोई भी बिल्कुल अछूता नहीं रह सकता। हालांकि, भारत का आधार मजबूत है।

इसके अतिरिक्त मौसम की बेरुखी भी स्थितियाँ दुरूह बना रही है। फरवरी में तापमान में तेजी रही। मार्च में बेमौसमी बारिश ने भी किसानों पर आफत बरपाई है। गेहूं और सरसों की फसल पर काफी असर पड़ा है। 'स्काईमेट' द्वारा इस साल मानसून में कम बारिश का अनुमान जताने के उलट भारत के कई राज्यों में भारी बारिश के कारण दलहनी फसलों के साथ-साथ सब्जियों के फसलों का भारी नुकसान हुआ है। यह एजेंसी मौसम का पूर्वानुमान लगाती है। यानी इस साल पैदावार कम होने की आशंका है।

यदि ऐसा होता है तो सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसे हालात में कृषि उत्पादों की आपूर्ति श्रृंखला पुख्ता रखने की है। साथ ही कीमतों पर भी अंकुश लगाए रखना होगा। नौ राज्यों में चुनाव और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर महंगाई पर लगाम लगाना सरकार की पहली प्राथमिकता होने वाली है। सरकार इसे समझ भी रही है, इसलिए गेहूं का अतिरिक्त स्टॉक बाजार में जारी किया गया, ताकि कीमतें काबू में रहें।

मौसम की मेहरबानी के दिन खत्म हो गए हैं। ला नीना के स्थान पर इस बार अल नीनो आ रहा है। यह आमतौर पर सूखा लाता है। इसमें हवाएं पूर्व से पश्चिम के बदले पश्चिम से पूर्व की ओर चलने लगती हैं। नतीजतन, लातीनी, कैरेबियाई देशों में भरपूर बारिश होती है। ऑस्ट्रेलिया, भारत या दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में कम बारिश होती है। मौसम विज्ञानियों में इस बात पर बहस है कि अल नीनो कमजोर रहेगा या नहीं। यदि कमजोर रहा तो कृषि पर कोई बहुत असर नहीं पड़ेगा। इसके उलट रहा तो चुनौती गंभीर भी हो सकती है।

जलवायु परिवर्तन के असर के कारण बारिश का ट्रेंड भी बदल चुका है। एक दिन में ही बहुत ज्यादा बारिश हो जाती है, जिसका कोई उपयोग नहीं हो पाता। काबिलगौर है कि ला नीना की मेहरबानी के चलते दो पहिया और ट्रैक्टर की बिक्री के आंकड़े पिछले कुछ सालों में दुरुस्त रहे हैं। लेकिन, अल नीनो यह तस्वीर बेरंग भी कर सकता है।

ऐसे में असली चुनौती रिजर्व बैंक के सामने बढ़ती हुई महंगाई है। कुछ समय से धीमी होती खपत परेशानियां बढ़ा रही हैं। इसके चलते बिक्री, उत्पादन, नौकरियों का चक्र टूटता है। बेरोजगारी बढ़ती है। इस दुष्चक्र में न फंसना ही सरकार का लक्ष्य होना चाहिए। बहरहाल, महंगाई के मोर्चे पर सरकार कोई जोखिम नहीं उठा सकती है।

कम से कम वर्तमान सियासी हालात में तो कतई नहीं। फिर भी यह समझ से परे है कि रिजर्व बैंक ने महंगाई से निपटने के लिए खराब मौसम को जिम्मेवार ठहराने की बजाय कोई कारगर आर्थिक कार्य नीति क्यों नहीं तैयार की? जमीनी सच्चाई यही है कि महंगाई न ठिठकी है, न रुकी है बल्कि अब तो पिछले तीन माह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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