इंडिया गेट से: शंकराचार्य के मौन से मिला था इंदिरा गांधी को इमरजेंसी हटाने का संदेश

47 साल पहले आज के दिन 26 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए आपातकाल लगाया था। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि देश पर थोपी गयी उनकी यह इमरजेंसी दो साल भी नहीं टिक पायी? क्या वो विपक्ष के आंदोलनों से भयभीत हो गयी थी या फिर उनके भीतर कोई ऐसा भय पल रहा था जिसके कारण उन्होंने 18 जनवरी 1977 को इमरजेंसी हटाकर आम चुनाव की घोषणा कर दी थी? क्या कांची कामकोटि के शंकराचार्य चंद्रशेखरेन्द्र सरस्वती के मौन ने उन्हें इमरजेन्सी हटाने के लिए प्रेरित किया?

Emergency

आपातकाल में हुई ज्यादतियों का इतिहास भरा पड़ा है। हर लेखक ने उसे अपने ढंग से लिखा है। तब के सारे विपक्षी नेता बाद में विभिन्न गैर कांग्रेसी सरकारों में प्रधानमंत्री , मुख्यमंत्री, केन्द्रीय सरकारों और राज्य सरकारों में मंत्री बने। अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवानी, राजनारायण, चरण सिंह, मधु दंडवते आदि दर्जनों नेता बाद में मोरारजी सरकार में मंत्री बने। लालू यादव , मुलायम सिंह, कल्याण सिंह, नितीश कुमार, भैरो सिंह शेखावत, प्रकाश सिंह बादल, शांता कुमार, सुंदर लाल पटवा, भगतसिंह कोश्यारी मुख्यमंत्री जैसे आपातकाल का विरोध करने वाले नेता मुख्यमंत्री बने।
लेकिन यह आज भी रहस्य बना हुआ है कि इंदिरा गांधी ने जब 5 जनवरी 1976 को संसद से बिल पास करवा कर लोकसभा का कार्यकाल पांच साल से बढाकर छह साल करवा लिया था, फिर अचानक 18 जनवरी 1977 को लोकसभा भंग कर चुनाव की घोषणा क्यों की? जबकि उस समय लोकसभा कार्यकाल के 15 महीने बाकी पड़े थे।

इंदिरा गांधी के उस समय के सूचना सलाहाकार एच. वाई. शारदा प्रसाद के बेटे आर. वी. शारदा प्रसाद ने लिखा है कि इंदिरा गांधी ने नवम्बर में कांग्रेस के गुवाहाटी सत्र के बाद आपातकाल हटा कर चुनाव करवाने का मन बना लिया था। लेकिन वह नहीं चाहती थी कि संजय गांधी को उनके फैसले का पता चले, इसलिए उन्होंने अपने फैसले को गुप्त रखा। संजय गांधी कभी भी आपातकाल को हटाने के पक्ष में नहीं थे, अलबत्ता वो तो देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही बदलना चाहते थे।

आर. वी. शारदा प्रसाद लिखते हैं कि नवंबर 1976 के दूसरे सप्ताह में ही, इंदिरा गांधी ने अपने प्रमुख सचिव प्रोफेसर पीएन धर और उनके पिता, एच. वाई. शारदा प्रसाद से कहा था: "मैं आपातकाल को समाप्त करने और चुनावों का आह्वान करने जा रही हूं। मुझे पता है कि मैं हार जाऊंगी, लेकिन यह कुछ ऐसा है जो मुझे करना ही पड़ेगा।" लेकिन जब तक उन्होंने 18 जनवरी, 1977 को आकाशवाणी पर आमचुनाव की घोषणा नहीं की, तब तक उन्होंने इस बात का बहुत ध्यान रखा कि कांग्रेस में किसी को जरा भी भनक न लगे। वह इस बात का विशेष ध्यान रख रही थीं कि उनके पुत्र संजय गांधी को अंधेरे में रखा जाए; संजय गांधी को रेडियो प्रसारण से ही चुनाव की घोषणा का पता चला, और वह इसके लिए इंदिरा गांधी से बेहद नाराज़ हो गये थे।

बहुत लोग इस बात का श्रेय लेते हैं कि उन्होंने इंदिरा गांधी को लोकतंत्र की बहाली के लिए तैयार किया था। उनकी दोस्त पुपुल जयकर ने दावा किया कि उनके गुरु व दार्शनिक जिद्दू कृष्णमूर्ति ने उन्हें लोकतंत्र बहाली के लिए तैयार किया था क्योंकि इंदिरा गांधी ने 28 अक्टूबर, 1976 को कृष्णमूर्ति से कहा था: " मैं एक बाघ की पीठ पर सवार हूं, मुझे पता है कि बाघ मुझे मार रहा है लेकिन मुझे नहीं पता कि इसकी पीठ से कैसे उतरूं"? जिद्दू कृष्णमूर्ति ने इंदिरा गांधी को जवाब दिया कि अगर वह अपनी स्थिति के बारे में गहराई से सोचती हैं, तो उन्हें खुद जवाब मिल जाएगा। जयकर का दावा है कि जिद्दू कृष्णमूर्ति ने इंदिरा गांधी को "आपातकाल समाप्त करने के लिए राजी किया, फिर चाहे उसके कोई भी नतीजे निकलें"।

लेकिन इंदिरा गांधी को समझाने में ब्रिटेन की काउंसिल आफ लार्ड के प्रेसिडेंट और हाउस आफ कामन्स के नेता माइकल मैकिन्टोश फ़ुट की भूमिका कुछ ज्यादा लगती है। इंदिरा गांधी उन्हें अपना बड़ा भाई मानती थीं। अक्टूबर 1977 में वह भारत आए थे और उन्होंने इंदिरा गांधी से मुलाक़ात की थी। जिसमें उन्होंने राजनीतिक कैदियों को रिहा करके चुनाव करवाने की सलाह दी थी। इंदिरा गांधी ने उन्हें धैर्यपूर्वक सुना , लेकिन कोई जवाब नहीं दिया था। हालांकि इंदिरा गांधी ने उस बातचीत में उन्हें वह कारण बताए थे, जिनके कारण आपातकाल लगाना पड़ा था। लेकिन माइकल मैकिन्टोश फ़ुट ने बाद में एच. वाई. शारदा प्रसाद से कहा था कि इंदिरा गांधी चुनावों की घोषणा करेंगी।

इंदिरा गांधी द्वारा इमरजंसी के बाद भारत में लोकतंत्र बहाली का एक बड़ा कारण कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य चंद्रशेखरेन्द्र सरस्वती के मौन को भी माना जाता है। इंदिरा गांधी कांची कामकोटी पीठ के शंकराचार्य का बहुत सम्मान करती थी। वह जिस दिन उन्हें मिलने गईं थी उस दिन शंकराचार्य ने मौन धारण किया हुआ था। दोनों तीन घंटे तक आमने सामने बैठे रहे, लेकिन दोनों में कोई बातचीत नहीं हुई थी। एच. वाई. शारदा प्रसाद उस समय उनके साथ थे। बाहर निकलते हुए इंदिरा गांधी ने शारदा प्रसाद से कहा कि "अब मुझे शांति मिली है। मैंने अपने सारे प्रश्न उनके सामने रखे, और मुझे जो उत्तर चाहिए थे, वे मिल गए हैं। मैं अब स्पष्ट हूं कि मुझे क्या करना चाहिए।"

इंदिरा गांधी ने एच.वाई.शारदा प्रसाद से कहा था कि "क्या संवाद करने के लिए केवल शब्दों की आवश्यकता है?" लेकिन जब वह इस पसोपेश से बाहर निकली, तो उन्होंने अपने अंतर्मन के फैसले को अपने पुत्र संजय गांधी से छुपा कर रखा था, इसमें कोई दो राय नहीं है।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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