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Mission AI: आशंका और संभावना के बीच भारत का मिशन एआई

Mission AI: पिछले सप्‍ताह केंद्रीय मंत्रिमंडल ने करीब 10 हजार करोड़ के व्‍यय वाले भारत के महत्‍वाकांक्षी एआई मिशन को मंजूरी दे दी। निस्संदेह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में काम करने के इच्छुक युवाओं के लिए यह मिशन बड़ा सहारा बनेगा।

इसके संकेत तो पिछले साल जून में तभी मिल गए थे, जब ओपेन एआई के सीईओ सैम ऑल्‍टमैन ने अपनी कारोबारी भारत यात्रा के बाद प्रधानमंत्री की उत्‍साहवर्द्धक प्रतिक्रिया को लेकर प्रसन्‍नता जाहिर की थी और प्रधानमंत्री ने भी अपने ट्वीट में लिखा था कि भारत के तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र में, विशेष रूप से युवाओं के बीच एआई की क्षमता बहुत बड़ी है।

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यह वह वक्‍त था, जब अमेरिका और यूरोप के कई देश एआई की बढ़ती ताकत और प्रभाव को लेकर चिंतित थे और इसे सीमित करने के उपाय तलाश रहे थे। लेकिन, भारत की सोच धारा के विपरीत थी। यही प्रतिबद्धता, प्रधानमंत्री ने दिसंबर 2023 में दिल्‍ली में हुए ग्‍लोबल एआई समिट में भी दिखाई, जब उन्‍होंने मेकिंग एआई इन इंडिया की बात कही।

यकीनन दूसरे क्षेत्रों की तुलना में देश में इस दिशा में बहुत तेजी से काम हुआ है और सिर्फ दस ही महीने के भीतर न सिर्फ मिशन और इसके खर्च बजट को कैबिनेट का अप्रूवल मिला है, बल्कि हाथों-हाथ इसका रोडमैप भी घोषित कर दिया गया है।

मोटे तौर पर इस 10,372 करोड़ रूपए की राशि को अगले पॉंच सालों में एआई रिसर्च, डेवलपमेंट, एआई स्‍टार्ट-अप्‍स फंडिंग, इस क्षेत्र में काम कर रही निजी कंपनियों को फंडिंग जैसे कामों में खर्च किया जाएगा। इससे साइंटिस्‍टों और कंपनियों को नई चीजें सीखने-समझने, आर्टि‍फिशियल इंटेलिजेंस कम्‍प्‍यूटिंग क्षमता बढ़ाने और देश में कृत्रिम बुद्धिमत्‍ता के स्‍वदेशी मॉडल विकसित करने में मदद मिलेगी।

हाल ही में लिंक्‍डइन की 'फ्यूचर ऑफ वर्क: स्टेट ऑफ वर्क @ एआई' शीर्षक वाली एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत दुनिया के उन पॉंच देशों में शामिल है, जहॉं एआई से संबंधित स्किल सर्वाधिक तेजी से सीखे जा रहे हैं। लिंक्‍डइन पर अपने प्रोफेशनल प्रोफाइल में एआई को स्किल के तौर पर एड करने वाले यूजर्स की संख्‍या पिछले कुछ सालों में चौदह गुना बढ़ चुकी है।

अलग-अलग क्षेत्रों में एआई के बढ़ते दखल और सामर्थ्‍य को देखते हुए इंडिया एआई मिशन के उद्देश्‍यों और सफलता को लेकर शायद ही कोई असहमति हो। कृत्रिम बुद्धिमत्‍ता की दुनिया में हम आए दिन एक से बढ़कर एक चमत्‍कार होते देख रहे हैं, जो हमें आनंदित भी कर रहे हैं और आतंकित भी। इंडिया एआई मिशन को इसी आनंद और आतंक के बीच संतुलन बैठाना है, तभी वह उन लक्ष्‍यों को हासिल कर पाएगा, जिन्‍हें ध्‍यान में रखते हुए यह मिशन लॉन्‍च किया गया है।

एआई जिस तरह से हमारे जीवन का अभिन्‍न अंग बनता जा रहा है, कोई भी देश इसकी उपेक्षा करने का जोखिम नहीं उठा सकता। भारत भी इसका अपवाद नहीं है। ग्‍लोबल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) बाजार वर्तमान में सौ बिलियन डॉलर का आंका गया है। नेक्स्ट मूव स्ट्रैटेजी कंसल्टिंग के अनुसार, वर्ष 2030 तक यह बीस गुना बढ़कर दो ट्रिलियन डॉलर हो जाएगा। आखिर कौन सा देश होगा, जो इस विशाल बाजार में अपनी हिस्‍सेदारी का अवसर चूकना चाहेगा। खासकर, भारत जैसा देश जहॉं दुनिया की सबसे बड़ी आबादी निवास करती है और एआई के यूजर ही नहीं, बल्कि सेवा प्रदाताओं की संख्‍या भी तेजी से बढ़ रही है।

लेकिन, यह भी सच है कि जहॉं संभावनाएं अधिक होती हैं, वहॉं चुनौतियॉं भी इतनी ही ज्‍यादा होती हैं। एआई के जिस मौजूदा संस्‍करण का हम लाभ उठा रहे हैं, वह अभी अपनी शैशव अवस्‍था में ही है। अभी हमने सिर्फ इसके फायदे ही फायदे देखे हैं, दुष्‍प्रभावों पर उतनी ज्‍यादा चर्चा नहीं हुई है। अभी एआई की तुलना दो साल के उस बच्‍चे से की जा सकती है, जिसकी हर बात हमें आनंदित करती है। लेकिन, किशोरावस्‍था में या जवानी में उसका व्‍यवहार कैसा रहेगा, हम उसे कितना नियंत्रित कर पाएंगे, अभी यह अंदाजा हम नहीं लगा सकते।

उदाहरण के लिए, एआई से सबसे बड़ा खतरा तो नौकरियों को ही है। वर्ल्‍ड इकोनॉमिक फोरम की पिछले साल की 'फ्यूचर ऑफ जॉब्‍स-2023' में बताया गया है कि अगले पॉंच सालों में एआई और ऑटोमेशन टेक्‍नोलॉजी के चलते करीब 8.3 करोड़ लोग अपनी नौकरियॉं गंवाने जा रहे हैं। इनमें सर्वाधिक मार व्‍हाइट कॉलर जॉब्‍स पर पड़ेगी। हालांकि तर्क यह दिया जाता है कि इससे नए रोजगारों का सृजन होगा, लेकिन विशेषज्ञों का आकलन है कि एआई से पैदा होने वाली नई नौकरियों की संख्‍या सिर्फ 6.9 करोड़ ही होगी।

इसी तरह, एआई से एक और बड़ा खतरा पर्यावरण को भी है। एक एआई लार्ज लैंग्‍वेज मॉडल के प्रशिक्षण व परिचालन में बहुत ज्‍यादा बिजली की खपत होती है। इतनी ज्‍यादा बिजली के उत्‍पादन में जीवाश्‍म ईंधन का इस्‍तेमाल पर्यावरणीय जोखिमों को और अधिक बढ़ा देता है। अगर सिर्फ चैटजीपीटी की ही बात करें तो यह अकेला ही हर रोज अपने बीस करोड़ यूजर्स के सवालों का जवाब देने में पॉंच लाख किलोवॉट बिजली खा जाता है। बिजली ही नहीं, यह पानी भी बहुत पीता है। इसे प्रशिक्षित करते रहने के लिए डेटा सेंटरों में बड़े-बड़े सर्वर लगाए जाते हैं, जो बार-बार गर्म हो जाते हैं। इन्‍हें ठंडा रखने के लिए जल आधारित कूलिंग सिस्‍टम इस्‍तेमाल होते हैं।

पिछले साल इस बारे में कैलिफोर्निया विश्‍वविद्यालय में एक शोध हुआ। इसमें निष्‍कर्ष निकाला गया था कि अगर हम चैटजीपीटी में बीस से पचास प्रॉम्‍प्‍ट डालते हैं तो उसे उनका जवाब देने में आधा लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। अध्‍ययन में यह भी बताया गया कि जीपीटी-3 जैसे लॉर्ज लैंग्‍वेज मॉडल को प्रशिक्षित करने में सात लाख लीटर तक पानी की खपत होती है।

यह देखते हुए अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि जिस तरह से आए दिन नए-नए एलएलएम लॉन्‍च हो रहे हैं, उन्‍हें कितनी ज्‍यादा बिजली और पानी की जरूरत पड़ने वाली है। इसके अलावा समाज, व्‍यक्तित्‍व और संबंधों पर भी एआई ने जो नकारात्‍मक असर डाला है, वह पूरी दुनिया को आक्रांत किए हुए है। यही वजह है कि दुनिया के कई देश एआई पर लगाम लगाने के लिए तरह-तरह के रूल्‍स और रेगुलेशंस ला रहे हैं। लेकिन, एआई लगातार शक्तिशाली होता जा रहा है।

जाहिर है कि इन सवालों से हमें भी जूझना पड़ेगा। जैसे कि भारत पहले ही अपनी शिक्षित युवा आबादी को समुचित मात्रा में रोजगार उपलब्‍ध नहीं करा पा रहा है, इस चुनौती के साथ सामंजस्‍य कैसे बिठा पाएगा, यह चिंतन का विषय है। साथ ही हम उन देशों में भी शामिल है, जहॉं भविष्‍य में जल संकट बहुत अधिक गहराने वाला है। एआई को प्रोत्‍साहन देने में जो अतिरिक्‍त पानी की जरूरत होगी, वह कहॉं से आएगा, इस प्रश्‍न का उत्‍तर खोजा जाना भी जरूरी है।

अगर भारत की ही बात करें तो हमारे सामने गुणवत्‍ता और विश्‍वसनीयता भी एक गंभीर चुनौती होगी। क्‍योंकि, अभी तक देश में कई एलएलएम लॉन्‍च किए जा चुके हैं। लेकिन, कोई भी चैटजीपीटी या जेमिनी की तरह व्‍यापक पैमाने पर नहीं अपनाया गया है। कुछ ही महीने पहले लॉन्‍च हुए कृत्रिम ने हाल ही में एक प्रश्‍न के उत्‍तर में खुद को सैम ऑल्‍टमैन की कंपनी ओपेन एआई द्वारा विकसित किया गया एलएलएम बताया था। इसके अलावा, जिन लोगों ने इसका इस्‍तेमाल किया है, उन्‍हें यह काफी पेचीदा और असुविधाजनक लगा।

अच्‍छी बात यह है कि इंडिया एआई मिशन का मतलब सिर्फ एलएलएम मॉडल डेवलप करना नहीं है, बल्कि एआई और इससे संबंधित सभी पक्षों के लिए एक सम्‍पूर्ण पारिस्‍थितिकी तंत्र विकसित करना भी है। इसके लिए दस हजार करोड़ रुपए का बजट ही नहीं है, बल्कि एक पॉंच साला रोडमैप भी है। उम्‍मीद की जानी चाहिए कि इसमें एआई से संबंधित ऐसी सभी समस्‍याओं के जवाब भी खोजे जाएंगे, जो पूरी दुनिया को हलकान किए हुए हैं। यह भारत के लिए चुनौतियों से भरा तो है ही, लेकिन साथ ही एक ऐसा अवसर भी रच रहा है जो उसे एआई के क्षेत्र में विश्‍वगुरू बना सकता है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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