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Indian Rivers: नदियों के साथ बदलती सहजीवन की भारतीय संस्कृति

Indian Rivers: भाजपा के पूर्व महासचिव और इस समय राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संरक्षक गोविन्दाचार्य 80 साल की आयु में नदी संवाद यात्रा पर हैं। उनकी नदी संवाद यात्रा 11 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के नरौरा शहर से शुरु हुई है जो कानपुर पहुंचकर समाप्त होगी। वो नदियों के स्वास्थ्य के बारे में लोगों में जागरुकता पैदा करना चाहते हैं।

Indian rivers are part of culture

वो चाहते हैं कि लोग इस बात को समझें कि जैसे शरीर में एक सीमा से अधिक खून निकाल लेने पर शरीर कमजोर हो जाता है उसी तरह नदी का एक सीमा से अधिक दोहन करने से नदी बीमार हो जाती है।

गोविन्दाचार्य नदी के जिस दोहन की ओर इशारा कर रहे हैं वह नदी के साथ साथ इस समय पूरी प्रकृति का हो रहा है। समय बदलने के साथ जब मनुष्य ने अपनी जरूरतें बढाईं तो उसने प्रकृति का दोहन भी शुरू किया।

इस दोहन की जड़ में कहीं न कहीं वो ब्रिटिश व्यवस्था थी जो अपने देश के औद्योगीकरण के लिए उपनिवेश बना लिए गए देशों का शोषण करने पर आधारित थी। स्वतंत्रता के बाद भी हम प्रकृति और नदियों के साथ आज भी फिरंगियों वाली सोच से पेश आ रहे हैं। ऐसा संभवत: इसलिए हो रहा है क्योंकि अंग्रेज चले गये लेकिन हमारे दिमाग में अपनी शोषण वाली समझ बिठा गये।

भारत की नदियों की समझ, आधुनिक काल में, विशेषकर फिरंगी शिक्षा व्यवस्था के आने के बाद से कुछ वैसी ही बनी है, जैसी उपनिवेशवादी शासकों, यानि अंग्रेजों की थी। इसका नतीजा क्या हुआ?

इसका परिणाम ये हुआ कि उन्होंने थेम्स जैसी नदियाँ देखी थीं, उनके हिसाब से ही भारतीय नदियों को नापना परखना शुरू किया। करीब दो सौ वर्षों में हम उनकी शिक्षा प्रणाली से बाहर नहीं आये हैं। आज भी वही मैकले मॉडल भारत में शिक्षा देने के लिए प्रयोग किया जाता है, तो स्पष्ट ही है कि हमारी समझ अभी भी नहीं बदली है।

इसमें समस्या ये थी कि ब्रिटेन के पहाड़ आल्प्स जैसे थे, जो कम उंचाई के थे। उनसे आने वाली नदियों के पानी का वेग उतना ज्यादा नहीं होता था, न ही वो अपने साथ उतनी मिट्टी काटकर लाती थीं।

इसकी तुलना में भारतीय हिमालय की उंचाई कहीं अधिक है। लाखों वर्षों से ये पहाड़ उसी उंचाई के हैं और उनसे आने वाली गंगा हो या उसकी गंडक-कोसी जैसी सहायक नदियाँ, उनका वेग अधिक होता है। लगातार अपने साथ मिट्टी काटकर लाने से नदी में मैदानी क्षेत्रों में गाद भी जमती है।

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इसकी वजह से अगर पिछले दो सौ वर्षों में देखेंगे तो बिहार में कोसी नदी ने अपनी धारा बदल ली है। पहले वो जहाँ से बहती थी, आज वहां से नहीं बहती।

इस अधूरी, या गलत समझ के साथ सरकारें जब नदियों से पेश आयीं तो उसका नतीजा ये हुआ कि नदियों को तटबंधों से बांधने के प्रयास हुए। शुरू में लोगों को सुनने में तटबंधों और नहरों की योजना बड़ी अच्छी लगी, लेकिन किसानों को कुछ ही वर्षों में इसके दुष्परिणाम दिखने लगे।

सबसे पहला नतीजा तो ये होने लगा कि पुराने तटबंध कुछ दशकों में बेकार हो गए और उनसे कुछ किलोमीटर हटकर, नए तटबंध बनाने पड़े।

अब कई गाँव पुराने और नए तटबंधों के बीच फंस गए। अब जब बाढ़ आती है तो उनका गाँव डूबता है, जैसा पहले भी डूबता था। लेकिन पहले बाढ़ के वापस जाने पर जो पानी वापस नदी में चला जाता, वो अब दोनों तटबंधों के बीच फंस जाता और गाँव-खेत डूबे ही रहते थे।

डूबे खेतों में न खेती हो सकती है, न उन गावों में रहा ही जा सकता है। ऐसे में पलायन कई गांवो की मजबूरी हो गयी। इसके अलावा तटबंधों के लगातार रख रखाव की समस्या थी। अचानक कोई बाँध बाढ़ में टूट जाए रातों-रात आई बाढ़ से भी ग्रामीणों को निपटना था।

अगर ये समझना हो कि कृषि से जुड़े परंपरागत ज्ञान को छोड़ देने से क्या हुआ होगा, तो इतिहास में थोड़ा पीछे जाना होगा। ये वो दौर था जब हिंदी भाषा अपने शैशव काल में थी।

करीब दो सौ साल पहले यानि 1847 का ज़माना था। उस समय भारत में कोई इंजीनियरिंग कॉलेज भी नहीं था। ऐसे समय में जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भीषण अकाल आया तो फिरंगी सरकार बहादुर को लगान कम मिलने लगा। उस दौर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाके के गवर्नर थे, जेम्स थॉमसन।

अब थॉमसन साहब एक तो लगान कम मिलने से परेशान थे दूसरा वो थोड़े भले से थे तो उनसे लोगों का भूख से मरना भी नहीं देखा जा रहा था। लिहाजा उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी को ख़त लिख कर उस इलाके में नहर खुदवाने की बात की।

एक चिट्ठी पर जवाब ना आया तो दूसरा ख़त लिखा। जवाब फिर भी नहीं आया तो उन्हें समझ आया कि वो तरीका सही नहीं लगा रहे।

लिहाजा तीसरे ख़त में उन्होंने लिखा कि अगर सिंचाई होगी, तो फसल ज्यादा होगी। फसल ज्यादा होगी तो लगान ज्यादा वसूला जा सकेगा। इस बार भी हामी नहीं आई, इस बार पूछा गया कि सिंचाई की नहर तो ठीक है। मगर इंजिनियर तो हैं नहीं बनाएगा कौन नहर?

थॉमसन ने जवाब दिया जी, स्थानीय लोग, देहाती, बना लेंगे नहर। आप तो बस हुकुम कर दो। ये कोई मामूली नाला नहीं बन रहा था। हरिद्वार के पास गंगा से नहर निकालकर उसे दो सौ किलोमीटर आगे ले जाने की बात हो रही थी।

अब अगर आप बिना इंजिनियर दो सौ किलोमीटर के इलाके में नहर के बारे में सोचकर ये समझ रहे हैं कि नहर नहीं बनी होगी तो आप गलत सोच रहे हैं। नहर बनी और वो नहर आज भी है जिसे गंग नहर कहा जाता है। उसे स्थानीय लोगों ने अपने परंपरागत कौशल से बना दिया था।

जब स्थानीय लोगों ने अपने ज्ञान और कौशल से ये नहर बनायी तो उनसे उनका ज्ञान प्राप्त करने के लिए थॉमसन महोदय ने रुड़की इंजिनियरिंग कालेज की शुरुआत की जिसे आज रुड़की आईआईटी कहा जाता है।

इस तरह भारत का पहला इंजीनियरिंग कालेज बना जो देहाती लोगों को सिखाने के लिए नहीं बल्कि उनसे सीखने के लिए शुरु किया गया था। हालांकि घोषित तौर पर थॉमसन महोदय ने यही कहा था कि इस नहर के रख-रखाव के लिए इंजिनियर लगेंगे और वो अंग्रेजी हुकूमत को बढ़ाने में मददगार होंगे। रुड़की का इंजीनियरिंग कॉलेज देश का ही नहीं एशिया का पहला इंजीनियरिंग कॉलेज था।

यानि हमारा परंपरागत ज्ञान पहले से इतना सक्षम था कि नदियों के साथ मनुष्यों के सहजीवन की व्यवस्था कर सके। ये अवश्य है कि पिछले कुछ दशकों में नदियों और पर्यावरण-वन इत्यादि के बारे में सरकार और जनता की सोच थोड़ी बदलने लगी है।

नदियां जैसे बहती हैं, उन्हें अपने तरीके से रहने देना और उन्हें बाँधने के बदले स्वयं को नदियों और पर्यावरण के अनुकूल बनाना बेहतर है, ये मनुष्यों को याद आने लगा है। पिछले कुछ वर्षों में "सस्टेनेबल डेवलपमेंट" की बातें होने लगी है।

इस हेतु प्रकृति के उपासक हिन्दुओं की जीवनशैली से भी प्रेरणा ली जा रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि मनुष्य आने वाली पीढ़ियों में सुधरेगा ही, क्योंकि प्रकृति सुधारने पर आती है तो मनुष्यों के लिए परिणाम अच्छे नहीं होते।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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