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आतंकवादियों को सबक सिखाने में अमेरिका जैसा क्यों नहीं बन सकता भारत?

अमेरिका की ताकत, उसका पुरुषार्थ, उसकी ज़िद, अपने देश व नागरिकों की सुरक्षा के लिए कुछ भी कर गुज़रने की उसकी प्रतिबद्धता हमें चकित भी करती है और कुछ सीखने के लिए भी प्रेरित करती है। पिछले दशकों में हमने देखा है कि चाहे जो भी हो जाए, अमेरिका अपने दुश्मनों को नहीं छोड़ता। 11 सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हमले के एक महीने के भीतर आतंकी संगठन अल-कायदा के अपने दुश्मनों की खोज में उसने न सिर्फ अफगानिस्तान पर प्रचंड हमला बोल दिया, बल्कि लगभग 20 साल वहां रहकर चुन-चुनकर उसने आतंकवादियों को मारा।

India vs America in teaching a lesson to terrorists

हालांकि इस ऑपरेशन में उसके अपने काफी सैनिक भी मारे गये। जब उसे पता चला कि उसका सबसे बड़ा दुश्मन ओसामा बिन लादेन तो उसके मित्र देश पाकिस्तान के संरक्षण में एबटाबाद में छिपकर बैठा है, तो मई 2011 में उसके लगभग 25 नेवी सील कमांडो ने पाकिस्तान की सरहद में घुसकर उसे मार डाला और उसकी लाश को बैग में पैक करके समुद्र में बहा दिया। पाकिस्तान को इस पूरे ऑपरेशन की भनक तक नहीं लगने पाई।

और अब, जबकि अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद पूरी दुनिया समझ रही थी कि 11 सितंबर के हमले के खिलाफ छेड़े गये युद्ध को अमेरिका ने समाप्त कर दिया है, तब उसने अफगानिस्तान के काबुल में छिपे बैठे अयमान अल जवाहिरी को भी मार गिराया है। अफगानिस्तान से अमेरिका के जाने और वहां तालिबान राज कायम होने के बाद खुद को सुरक्षित समझते हुए जवाहिरी अपने घर की बालकनी पर आराम से टहल रहा था, लेकिन अपने सैटेलाइटों के जरिए अमेरिका इस दुश्मन को पैनी निगाहों से देख रहा था और सटीक निशाना मिलते ही उसने अपने उच्च-तकनीक ड्रोन के ज़रिए दो मिसाइलें दागीं और जवाहिरी का खेल खत्म कर दिया।

तालिबान ने इस हमले को अंतर्राष्ट्रीय नियमों और सिद्धांतों का खुला उल्लंघन बताया है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपने ट्वीट में बेहद सख्ती दिखाते हुए कहा है- "जो लोग हमें नुकसान पहुंचाना चाहते हैं, उन लोगों से अपने नागरिकों की रक्षा के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने संकल्प और अपनी क्षमता को प्रदर्शित करना जारी रखा है। आज रात हमने स्पष्ट किया कि चाहे कितना भी समय लगे, चाहे आप कहीं भी छिपने की कोशिश करें, हम आपको ढूंढ़ लेंगे।"

अपने देश और नागरिकों की सुरक्षा के लिए अमेरिका की यह शक्ति, ज़िद और प्रतिबद्धता इसीलिए कायम है, क्योंकि वहां की राजनीति कभी भी इसके आड़े नहीं आती। परस्पर विरोधी डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टियां भी इस मुद्दे पर मज़बूती से एकजुट रहती हैं। 2001 से 2022 के इस अंतराल में वहां अलग-अलग दलों के चार राष्ट्रपति हो चुके- जॉर्ज डब्ल्यू बुश, बराक ओबामा, डोनाल्ड ट्रंप और जो बाइडन। लेकिन वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हमला करने वालों के ख़िलाफ इनकी नीति में एक ग़ज़ब की निरंतरता और एकता दिखाई देती है।

2001 में अफगानिस्तान पर हमला करने की अनुमति देने वाले जॉर्ज डब्ल्यू बुश रिपब्लिकन थे, जबकि 2011 में पाकिस्तान में घुसकर ओसामा बिन लादेन को मारने की अनुमति देने वाले बराक ओबामा डेमोक्रैट थे। इसी तरह अफगानिस्तान से सैनिकों की वापसी का फैसला करने वाले डोनाल्ड ट्रंप रिपब्लिकन थे, जबकि उस फैसले को आगे बढ़ाने वाले और अब अफगानिस्तान में घुसकर जवाहिरी का काम तमाम करने वाले जो बाइडन डेमोक्रैट हैं।

अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद दुनिया भर में कई समालोचक मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन को कमज़ोर बता रहे थे, लेकिन अफगानिस्तान की सरहद में ड्रोन का इस्तेमाल करके जवाहिरी पर किये गये मिसाइल हमले और उनके ट्वीट ने बता दिया है कि अमेरिका कमज़ोर नहीं है, बल्कि वह केवल और केवल अपने हितों को ध्यान में रखकर कदम उठाता है एवं किसी भी कीमत पर इससे कोई समझौता नहीं करता। यानी अमेरिका के सभी राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए सरकारें और कुर्सियां आनी-जानी हैं, अमेरिका सर्वोपरि है।

एक तरफ अमेरिका है, जिसके राजनीतिक दलों और नेताओं की अपने देश और नागरिकों के लिए ऐसी अटूट और अविचल प्रतिबद्धता है, दूसरी तरफ हमारा प्यारा देश भारत है, जहां हर मुद्दे पर गंदी राजनीति होती है। यहां तक कि आतंकवाद और साम्प्रदायिक कट्टरता जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा के गंभीर विषयों पर भी। वोटों के लिए कुछ राजनीतिक दल ही हमारे यहां आतंकवाद और साम्प्रदायिक कट्टरता का पोषण करते हैं। आतंकवादियों के समर्थन और बचाव में जुलूस निकाले जाते हैं।

अगर अफ़ज़ल गुरु जैसे किसी आतंकवादी को बरसों के निष्पक्ष ट्रायल और अदालती फैसले के बाद भी फांसी दी गयी है, तो न केवल हमारे भ्रष्ट साम्प्रदायिक आतंकवाद-परस्त नेता, बल्कि जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के शिक्षक और स्कॉलर तक इसे न्यायिक हत्या कहना शुरू कर देते हैं। तुम कितने ऐसे मारोगे, घर-घर से ऐसे निकलेंगे, जैसे नारे लगाए जाते हैं। याकूब मेमन जैसे कई आतंकवादियों के तो जनाजे में भी हज़ारों की भीड़ उमड़ पड़ती है।

एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में अब तक हम आतंकवाद से निपटने की ताकत, तरीका और इच्छाशक्ति विकसित नहीं कर पाए हैं। आतंकवादियों ने बार-बार हमें झुकाया है और हम झुके हैं। 1989 में देश के गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रूबिया सईद को अपहरण से मुक्त कराने के लिए वीपी सिंह सरकार ने पांच कुख्यात आतंकवादियों को छोड़ दिया। इसी तरह, 1999 में कंधार विमान अपहरण कांड में भी यात्रियों को बचाने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को मौलाना मसूद अजहर समेत तीन कुख्यात आतंकवादियों को छोड़ना पड़ा।

इसके बाद भी भारतीय लोकतंत्र के दो सबसे बड़े प्रतीकों संसद और लाल किला सहित देश के अनेक शहरों में मंदिरों, मस्जिदों, होटलों, रेलवे स्टेशनों, भीड़-भाड़ वाले बाज़ारों इत्यादि में अनेक आतंकवादी हमले हो चुके हैं, जिनमें हज़ारों लोगों की जानें जाने के बाद भी गंदी राजनीति हमारे यहां कभी खत्म ही नहीं होती। अमेरिका में हर राजनीतिक दल और नेता के लिए अपने एक-एक नागरिक की जान बेशकीमती है, लेकिन हमारे यहां हज़ारों बेगुनाह नागरिकों की हत्याओं के बावजूद अनेक राजनीतिक दलों और नेताओं का एक रोआं तक नहीं सिहरता।

आज भी, हाफिज सईद, मौलाना मसूद अजहर और दाऊद इब्राहिम जैसे भारत और इसके नागरिकों के अनेक दुश्मन हमारा मुंह चिढ़ाते हुए पाकिस्तान में आराम से बैठे हैं। भारत की सरकारें पाकिस्तान को डोजियर पर डोजियर देती रहती हैं और पाकिस्तान उनकी अनदेखी करता रहता है। लेकिन भारत कभी इतनी शक्ति और इच्छाशक्ति नहीं दिखा पाता कि वह भी अमेरिका की तरह ट्रेस करके इन आतंकवादियों को ठिकाने लगा सके।

आखिर दिखाए भी कैसे, क्योंकि हाफिज़ और दाऊद के अनेकों दलाल तो भारत की राजनीति, पुलिस और बॉलीवुड समेत अनेक क्षेत्रों में मौजूद हैं। देश की खुफिया एजेंसियों के पास इसके प्रमाण भी हैं, लेकिन इन लोगों के खिलाफ भी शायद ही कभी कोई ठोस कार्रवाई हुई हो।

● क्या यह सच नहीं है कि कश्मीर के आतंकवादी संगठन जेकेएलएफ के नेताओं को राज्य के बड़े नेताओं द्वारा संरक्षण दिया गया और लंबे समय तक भारत के शीर्ष नेतृत्व द्वारा भी इसकी अनदेखी की गई?
● क्या यह सच नहीं है कि हुर्रियत कांफ्रेंस के अलगाववादियों को भी कुछ लोगों ने अपने दामादों से बढ़कर इज़्ज़त दी?
● क्या यह सच नहीं है कि अमेरिका में कैद आतंकवादी डेविड कोलमैन हेडली ने जिस इशरत जहां की आतंकवादी के रूप में पुष्टि की, उसे हमारे देश के कुछ नेताओं ने देश की बेटी बताया?
● क्या यह सच नहीं है कि मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस में हुए धमाकों में असली आतंकवादियों को बचाने के लिए सरकार और पुलिस द्वारा ही बेगुनाह साधुओं-संतों को फंसा दिया गया और भगवा आतंकवाद की झूठी थ्योरी हवा में उछाल दी गई?
और तो और,
● क्या यह सच नहीं है कि यदि ज़िदा पकड़ा गया अजमल कसाब पाकिस्तानी नागिरक सिद्ध न हो गया होता, तो मुंबई हमलों का पाप भी पाकिस्तान के माथे से हटाकर आरएसएस के माथे पर मढ़ देने की पूरी साज़िश रची जा चुकी थी और इस साज़िश में भारत के कुछ नेता, पत्रकार और पुलिस अधिकारी ही शामिल थे?

आज भी देश के कुछ बड़े नेता आइसिस जैसे कुख्यात वैश्विक आतंकवादी संगठनों के अपराधों को बेरोज़गारी की समस्या से जोड़कर लगभग उचित ठहरा देना चाहते हैं। आरएसएस जैसे राष्ट्रवादी संगठन से उसकी तुलना करके आतंकवाद का बचाव किया जाता है। आतंकवाद-परस्ती की यह बीमारी हमारे यहां के कुछ नेताओं, बुद्धजीवियों और अफसरों के भीतर किस हद तक घुसी हुई है, इसकी एक बानगी हाल में तब भी मिली, जब पटना के एसएसपी ने पीएफआई को आरएसएस की तरह काम करने वाला संगठन बता दिया।

सवाल है कि इस तरह की गंदी राजनीति के जारी रहते भारत आतंकवाद और इसे जन्म देने वाली सांप्रदायिक कट्टरता से किस तरह लड़ेगा? क्या भारत के नागरिक के रूप में हम यह स्वप्न देखने का अधिकार रखते हैं कि हमारे यहां भी अमेरिका की तरह देश की सुरक्षा को सर्वोपरि और नागरिकों की जान को अनमोल समझा जाएगा और आतंकवादियों एवं कट्टरपंथियों के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस नीति अपनाई जाएगी?

यह भी पढ़ेंः क्या इंदिरा गांधी ने भी नेशनल हेराल्ड चलाने के लिए किया था सत्ता का दुरुपयोग?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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