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चीन को भारत से मिल रहा है अब कड़ा जवाब

तिब्बत को लेकर अभी हाल ही में दो महत्वपूर्ण बयान सामने आये हैं। पहला, 20 मई 2022 को तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने अपने अधिकारिक फेसबुक अकाउंट पर लिखा, "मैं जब 16 वर्ष का था, मेरी स्वतंत्रता मुझसे छीन गयी, और जब मैं 24 का हुआ तो मैंने अपना देश खो दिया। इन बीतें 60 वर्षों से भी अधिक समय में बहुत सी दुखद खबरें मेरी मातृभूमि से आती रही है। इसमें हिंसक घटनाएं, तबाही और हत्याएं भी शामिल है।" दूसरा, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 6 जुलाई 2022 को अपने अधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर लिखा, "आज फोन पर परम पावन दलाई लामा को 87वें जन्मदिन की बधाई दी। हम उनकी लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं।"

Xi Jinping

दलाई लामा ने तिब्बत के सन्दर्भ में जो कहा वह एक वास्तविकता है इसलिए चीन उन्हें एक अलगाववादी नेता के तौर पर प्रचारित करता है। प्रधानमंत्री मोदी ने दलाई लामा को बधाई दी, वह एक अध्यात्मिक गुरु के प्रति सम्मान है। फिर भी चीन ने अधिकारिक रूप से प्रधानमंत्री मोदी के इस कदम का विरोध किया। जिसके खिलाफ भारत के विदेश मंत्रालय ने भी बयान जारी कर कहा, "प्रधानमंत्री ने पिछले साल भी दलाई लामा के साथ बात की थी, यह हमारी सरकार की एक सतत नीति रही है कि उन्हें भारत में एक अतिथि और एक सम्मानित धार्मिक नेता के रूप में माना जाता है। यहां पर बड़ी संख्या में उनके अनुयायी हैं। दलाई लामा का जन्मदिन भारत ही नहीं, विदेशों में भी मनाया जाता है। इस पर किसी को क्यों आपत्ति होनी चाहिए।"

इसी पहले भी 2009 में जब दलाई लामा अरुणाचल प्रदेश के दौरे पर थे तो भी चीन ने प्रतिक्रिया जताई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन ने स्पष्ट किया कि "दलाई लामा भारत के एक सम्माननीय अतिथि हैं और वह पूरे भारत में कहीं भी भ्रमण कर सकते हैं।"

चीन आमतौर पर भारत पर तिब्बत एवं दलाई लामा को लेकर इस प्रकार के दवाब बनाता रहता है। हालाँकि, पिछले कुछ सालों से भारत सरकार का तिब्बत एवं दलाई लामा के प्रति रुख स्पष्ट है और ऐसे किसी दवाब को अब स्वीकार नही किया जाता है। मगर इतिहास के पन्नों में ऐसा वक्त दर्ज है, जब भारत सरकार ने चीन के एक दवाब में आकर भारी भूल कर दी, जिसका खामियाजा आज तक भारत और तिब्बत दोनों उठा रहे है। अगर उस दिन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, चीन की बातों में न आकर दूरगामी दृष्टि रखते तो आज हालात बहुत कुछ भारत के पक्ष में होते।

दरअसल, दिसंबर 1948 में तिब्बती प्रशासन ने भारत सहित अन्य देशों के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित करने की एक योजना बनाई थी। वास्तव में, यह योजना उनकी स्वतंत्र और संप्रभु स्थिति को बरकरार रखने के लिए थी। इसके लिए उन्होंने एक प्रतिनिधिमंडल का गठन किया और अपने ऊनी कारखानों के लिए मशीन एवं निर्यात में छूट के मांग के लिए ब्रिटेन, अमेरिका, भारत और चीन के दौरे करने शुरू कर दिए।
चीनी अधिकारी इस प्रतिनिधिमंडल के पक्ष में नहीं थे, इसलिए भारत में चीनी राजदूत लो चियो-लुएन ने प्रधानमंत्री नेहरू को एक पत्र लिखकर तिब्बती नेताओं की प्रस्तावित यात्रा पर अपनी असहमति जताई। उन्होंने इसे चीन की संप्रभुता और प्रशासनिक अखंडता को प्रभावित करने वाला कदम बताते हुए कहा कि भारत सरकार इस तरह की चर्चा को हतोत्साहित करे एवं मिलने से मना करे।

चीन के विरोध के बावजूद, प्रधानमंत्री नेहरू ने 8 जनवरी 1949 को प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख और तिब्बत के वित्तीय विभाग के मुखिया त्सेपोन शाकब्पा से नई दिल्ली में मुलाकात की। त्सेपोन ने उनसे दो अनुरोध किए। पहला, सोने की खरीद के लिए तिब्बत को दो मिलियन डॉलर का अनुदान, जिससे वह अपनी तिब्बती मुद्रा को फिर से छाप सके; और दूसरा, भारत एवं तिब्बत के बीच आयात-निर्यात के लिए मुफ्त सुविधाएं हो। उन्होंने तिब्बत की बिगड़ते आर्थिक स्थिति का भी जिक्र किया और भारत सरकार से मदद की गुहार लगाई।

नेहरू ने त्सेपोन शाकब्पा को कुछ ठोस मदद देने के बजाय निराधार सलाह और काल्पनिक आश्वासन के साथ वापस भेज दिया। उनका कहना था कि भारत स्वयं अभी विपरीत हालातों से जूझ रहा है। जबकि उस दौर में भारत ने चीन में अपना दूतावास खोलने के लिए 7,23,400 रुपए की रकम आवंटित की थी जोकि अमेरिका में खोले गए भारतीय दूतावास के बाद दूसरी सबसे बड़ी राशि थी। यही नहीं, जब वे चीन को मान्यता दिलाने के लिए अमेरिका सहित यूरोपीय देशों को पत्र लिख सकते थे तो क्या तिब्बत की इन दो मांगों के लिए दुनियाभर के देशों को नहीं मना सकते थे?

यह पहला और आखिरी मौका नहीं था, जब प्रधानमंत्री नेहरू के पास इतिहास बदलने का एक बड़ा मौका हाथ लगा था। जुलाई 1949 में, तिब्बती सरकार ने ल्हासा से कुओमितांग मिशन को निष्कासित कर तिब्बत के स्वतंत्र होने की घोषणा कर दी थी। इस पर सितंबर 1949 में चीन ने बयान जारी कर कहा, "हम चाहते हैं कि ब्रिटिश, अमेरिकी और भारतीय हमलावर तिब्बत पर अतिक्रमण करने की सभी साजिशों को तुरंत बंद कर दें। यदि वे तिब्बती क्षेत्र में उकसावे की हिम्मत करते हैं तो उन्हें उचित सजा मिलेगी।"

चीन ने हिम्मत दिखाई और कठोर बयान जारी कर दिया लेकिन भारत ने समान व्यवहार करने के स्थान पर चुप्पी साध ली। यह कुछ अवसर थे, जब चीन से उभरते खतरों पर लगाम लगाई जा सकती थी। फ्रेंक मोरास की 1960 में प्रकाशित पुस्तक 'द रिवोल्ट इन तिब्बत' के पृष्ठ 118 पर इस नुकसान का स्पष्ट तरीके से वर्णन किया गया है, "1947 और 1949 के बीच तिब्बत को एक संप्रभु, स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता देने से परहेज नहीं करना चाहिए था। जबकि तब न तो चीनी कम्युनिस्ट और न ही [चीनी] राष्ट्रवादी प्रभावी रूप से हस्तक्षेप कर सकते थे। ऐसे समय में भारत ने तिब्बत को स्वतंत्र राष्ट्रों के मंच पर लाने का अवसर खो दिया। साथ ही अपने और चीन के बीच एक बफर राष्ट्र का अस्तित्व भी सुनिश्चित नहीं कर सका।"

जो अवसर प्रधानमंत्री नेहरू को मिले थे, वे अब मिलने मुश्किल हैं। इसलिए वर्तमान में चीन संबंधी जो मुद्दे मोदी सरकार के सामने आये, उनका एकदम मजबूती से सामना किया गया है। इसमें तिब्बत के मामलें में भारत की मुखरता, गलवान घाटी में चीनी हमलें का उसी की भाषा में जवाब देना, और चीनी कंपनियों पर लगाम कसने सहित भारत को माल उत्पादन की दिशा में चीन पर निर्भर न रहकर आत्मनिर्भर बनाने जैसे मामलें शामिल है। चीन का मुकाबला करने का यही रास्ता है, जिसे कभी तिब्बत के त्सेपोन शाकब्पा ने सोचा था, और मजबूत नेतृत्व एवं स्पष्ट दूरगामी सोच से ही यह संभव है।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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