Ramlila Maidan: पाला बदलती पॉलिटिक्स का साक्षी बन गया रामलीला मैदान

Ramlila Maidan: रामलीला मैदान से ही आज से बारह साल पहले अरविन्द केजरीवाल के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में लगभग पूरा विपक्ष प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कांग्रेस के खिलाफ लामबंद हुआ था। लेकिन वही रामलीला मैदान महज 12 साल में ही करवट लेती राजनीति का साक्षी बन गया।

बहुत कम लोगों को याद होगा कि अप्रैल 2011 में अन्ना आंदोलन शुरु होने से पहले फरवरी 2011 में रामलीला मैदान में एक छोटी सी रैली हुई थी। इस रैली का संयोजन अरविन्द केजरीवाल ने किया था जो उन दिनों भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के संयोजक थे।

India alliance rally

फरवरी वाली रैली में राजनीतिक दलों से बुलाये तो बहुत लोग गये थे लेकिन आये बहुत कम लोग थे। फिर भी कमोबेश हर दल से कोई न कोई वहां आया था। स्वर्गीय राम जेठमलानी से लेकर अन्ना हजारे तक। यही वह मंच था जिस पर अन्ना हजारे ने ऐलान किया था कि कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ 5 अप्रैल (2012) से वो जंतर मंतर पर अनशन करेंगे।

उन्होंने अनशन किया और वह कैसे एक विशाल आंदोलन में बदल गया इसे सबने देखा सुना है। जंतर मंतर की भीड़ बढ़ी तो अन्ना खुद रामलीला मैदान आ गये और करीब आठ दस महीने यह आंदोलन नये नये कलेवर धारण करता रहा। इसी आंदोलन में स्वामी रामदेव शामिल हुए और इसी आंदोलन से अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ।

लेकिन कहते हैं कि जीवन में हर 12 वें साल में समयचक्र बदल जाता है। व्यक्ति की अवस्था, उसकी सोच, उसके शरीर सबमें परिवर्तन आ जाता है। शायद राजनीतिक जीवन में भी आ जाता होगा, शायद इसीलिए जिन केजरीवाल ने कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ इतना बड़ा आंदोलन खड़ा किया था, आज राजनीति के मैदान में दोनों साथ खड़े हैं।

यह समय चक्र में आये परिवर्तन की ही मिसाल है कि रविवार 31 मार्च को दिल्ली के रामलीला मैदान में लगभग समूचा विपक्ष अरविन्द केजरीवाल की गिरफ्तारी के विरोध में उनसे राजनीतिक सहानुभूति दिखाने पहुंचा था। उस समय जिन नरेन्द्र मोदी ने केजरीवाल के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का सबसे अधिक राजनीतिक लाभ लिया, आज उन्हीं नरेन्द्र मोदी के खिलाफ उसी रामलीला मैदान में लगभग समूचा विपक्ष लामबंद खड़ा हो गया।

कांग्रेस से लेकर तृणमूल कांग्रेस तक, समाजवादी पार्टी से लेकर राष्ट्रीय जनता दल तक, कम्युनिस्ट पार्टियों से लेकर उद्धव ठाकरे की शिवसेना तक सब एक सुर में मोदी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को 'राजनीतिक दमन' बता रहे हैं। इनमें से कांग्रेस को छोड़कर अधिकांश वो लोग हैं जो 12 साल पहले केजरीवाल के आंदोलन का इसलिए समर्थन कर रहे थे क्योंकि आंदोलन कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ था।

लेकिन आज वही लोग कांग्रेस के साथ खड़े हैं। उस समय भी मंच या मौका अरविन्द केजरीवाल ने ही मुहैया कराया था। इस बार भी मंच और मौका केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने ही मुहैया कराया है जिन्हें ईडी ने शराब घोटाले के आरोप में गिरफ्तार किया है।

हालांकि जिस समय विपक्ष के कई बड़े नेता रामलीला मैदान में नरेन्द्र मोदी को घेर रहे थे उसी समय दिल्ली से थोड़ी दूर मेरठ में मोदी अपनी कार्रवाई का बचाव कर रहे थे। मोदी का कहना है कि वो भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं तो विपक्षी नेता उनपर हमला कर रहे हैं। क्या वो कुछ गलत कर रहे हैं?

असल में इस देश में भ्रष्टाचार सार्वजनिक जीवन का ऐसा शिष्टाचार है जिसे हर वो व्यक्ति करना चाहता है जिसे अपने अलावा बाकी सब भ्रष्टाचारी नजर आते हैं। राजनीति में वैसे भी नैतिकता के लिए कोई जगह बची नहीं है इसलिए हर राजनीतिज्ञ ये मान बैठा है कि अपने राजनीतिक खर्चों को पूरा करने के लिए अगर वह थोड़ा पैसा बना भी लेता है तो क्या गलत करता है?

कभी सार्वजनिक जीवन में नैतिकता के शिखर पर रही भारतीय राजनीति में यह उतार क्रमश: हुआ है। स्वतंत्रता के बाद जब देश के नेता, नौकरशाह और आम आदमी सबने मिलकर अपने भारत को गढ़ना शुरु किया था तब भी नेहरु सरकार पर जीप घोटाले का आरोप लग गया था। नेहरु सरकार पर आरोप लगा था कि उन्होंने सेना के लिए घटिया दर्जे की गाड़ियां खरीदीं। हालांकि संसाधनों की कमी से जूझ रहे भारत के लिए यह खर्चों में कटौती की बात भी हो सकती थी लेकिन स्वतंत्र भारत में इसे पहला घोटाला कहा गया।

इसके बाद इंदिरा गांधी सरकार हो या फिर राजीव गांधी सरकार। इन सरकारों पर घपले घोटालों के आरोप लगते रहे जो मनमोहन सिंह सरकार में आकर नई ऊंचाई को छू गये। कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, कोयला घोटाला और 2टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला इतना सिरे चढ़ा कि 2014 में कांग्रेस को ऐतिहासिक पराजय का सामना करना पड़ा।

इस उतार चढ़ाव का गवाह दिल्ली का रामलीला मैदान हमेशा से बना रहा। कभी इसी मैदान में जय प्रकाश नारायण लोकतंत्र बचाने की आवाज उठाने के लिए आये थे जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा दी थी। उसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी हों या वीपी सिंह, वे इंदिरा गांधी और राजीव गांधी सरकारों के खिलाफ आवाज उठाने इसी रामलीला मैदान आते रहे। यह खाली मैदान सबकी आवाजों का मूक साक्षी बना रहा।

लेकिन जैसा उलटफेर उसने बीते एक दशक में देखा है वैसा अपने इतिहास में कभी नहीं देखा। यह उलटफेर वैसा ही है जैसे इसी मैदान से जिस जेपी ने इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के खिलाफ आवाज उठायी थी मानो वही इंदिरा गांधी के समर्थन में उतर आये हों।

लोकतंत्र को बचाने की मुहिम हो या सरकारी व्यवस्था से भ्रष्टाचार को हटाने का अभियान। कम से कम इस एक बात पर सभी राजनीतिक दलों को एकराय होना पड़ेगा। अगर वो ऐसा करने में नाकाम रहते हैं तो उसी लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा हो जाएगा जिसकी बदौलत ये नेता ताकतवर हुए हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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