Imran Khan: फौज के दम पर शुरु, फौज के दर पर खत्म
इमरान खान को सियासत में स्थापित करने का जिम्मा जनरल कियानी ने उठाया था, अब उनको नेस्तनाबूद करने का बीड़ा जनरल आसिम मुनीर ने उठाया है।

पाकिस्तान की राजनीति में फौज के दम पर कदम रखने वाले इमरान खान अब उसी के सबसे बड़े घोषित दुश्मन बन चुके हैं। अब जानना सिर्फ इतना है कि आर्मी का दबाव झेलकर भी इमरान खान अपना अस्तित्व बचा पाते हैं या उनकी भी गति वही होनी है जो एमक्यूएम के नेता अल्ताफ हुसैन की हुई। कभी सिंध की राजनीति पर दबदबा रखने वाले अल्ताफ आज लंदन में निर्वासित जिंदगी जी रहे हैं।
इमरान खान का सियासी सफर
2002 में नेशनल एसेंबली की मात्र एक सीट जीतने वाली इमरान खान की पार्टी तहरीक ए इंसाफ 2011 तक एक बड़ी राजनीतिक ताकत बन गई तो इसके पीछे पाकिस्तानी फौज ही थी। पाकिस्तान के मशहूर टेलीविजन एंकर नदीम मलिक ने अपने एक प्रोग्राम में यह दावा किया था कि तहरीक ए इंसाफ के रूप में पाकिस्तान में एक तीसरी पार्टी को लाने का माॅडल जनरल कियानी का था। वे पीएमएल (एन) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी द्वारा बारी-बारी से सरकार बनाने के तरीके से खुश नहीं थे। जनरल कियानी ने ही इमरान खान को 2011 अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में लाहौर में एक बड़ा जलसा करने के लिए मनाया और फौज ने इस जलसे को सफल बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
लाहौर के इस जलसे में एक लाख से ज्यादा लोग आए और इसी जलसे में इमरान ने पाकिस्तान में एक नई क्रांति लाने का ऐलान किया था। जलसे में आई भीड़ को देखकर पाकिस्तान आर्मी को इमरान के रूप में एक नया विकल्प नजर आने लगा और आर्मी इमरान को आगे बढ़ाने में जुट गई। अब आर्मी के सामने एक ही समस्या थी कि इमरान की पार्टी को खड़ा कैसे किया जाए। तब इसकी जिम्मेदारी ली जनरल बाजवा ने।
2018 का चुनाव नजदीक था। पाकिस्तान में नवाज शरीफ की सरकार थी। पाकिस्तान आर्मी नहीं चाहती थी कि पीएमएल (एन) की सरकार आए। जनरल बाजवा एक तरह से नवाज शरीफ से दुश्मनी पर उतर आए थे। शरीफ पाकिस्तान के आर्थिक व विदेशी मामलों में आर्मी का दखल खत्म करने पर उतारू थे। पाकिस्तानी आर्मी नवाज शरीफ द्वारा भारत से रिश्ते सुधारने के प्रयास के भी खिलाफ थी। पीएमएल (एन) की सरकार के दौर में ही पूर्व जनरल परवेज मुशर्रफ द्वारा 1999 में मार्शल लॉ लगाने के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया। जनरल बाजवा किसी भी कीमत पर नवाज को पाकिस्तान की राजनीति से बाहर करने पर आमादा हो गए।
पाकिस्तान की आर्मी ने ही न्यायपालिका के जरिए नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम नवाज को हमेशा के लिए चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाले फैसले करवाए। जनरल बाजवा ने ही 2018 से पहले पीएनएल (एन) से लोगों को तोड़कर इमरान खान की पार्टी में ज्वाइन कराया। उस समय पाकिस्तान के सबसे बड़ी चीनी मिल के मालिक जहांगीर तरीन के हवाई जहाज का इस्तेमाल इस काम के लिए खूब किया गया। उन्हें इमरान का एटीएम तक कहा गया। 2018 के चुनाव में आर्मी के तमाम हस्तक्षेप के बावजूद इमरान खान को बहुमत नहीं मिला तो फिर जनरल बाजवा ने सरकार के लिए जरूरी नंबर का भी इंतजाम किया। तमाम छोटी पार्टियों को इमरान खान के इत्तेहादी बनने के लिए मजबूर किया गया।
लेकिन आर्मी के साथ इमरान खान का यह हनीमून पीरियड बहुत लंबा नहीं चल पाया। दो साल होते होते टकराव शुरू हो गए। टकराव की मुख्य बजह बना बाजवा की इमरान सरकार पर टोटल कंट्रोल रखने की ख्वाहिश। वित्त व विदेश मामलों पर जनरल बाजवा ने पहले ही कब्जा कर रखा था, धीरे धीरे आंतरिक मामलों में भी हस्तक्षेप बढ़ता गया। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि आर्मी और पुलिस की कार्रवाई को भी इमरान खान की जानकारी से दूर रखा गया। इस बीच पाकिस्तान की आर्थिक हालत और खराब हो गई और इमरान खान को आईएमएफ के पास जाना पड़ा।
एक तो इमरान खान प्रधानमंत्री के रूप में बुरी तरह फेल हो रहे थे और दूसरे पीएमएल (एन) और पीपुल्स पार्टी ने हाथ मिलाकर देश में सरकार विरोधी मोर्चा बना लिया था, जिसे पीडीएम का नाम दिया गया। इस पीडीएम ने इमरान खान को कम, पाकिस्तानी आर्मी और जनरल बाजवा को ज्यादा निशाना बनाया। फिर पंजाब में भ्रष्टाचार और खुद इमरान की बेगम की उसमें संलिप्त होने की खबरें आने लगी तो आर्मी के सामने खुद को बचाने का सवाल खड़ा होने लगा।
इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के रूप में फेल होने लगे तो आर्मी ने उनसे पल्ला झाड़ने का मन बना लिया। अक्टूबर 2021 में जब फिरकापरस्त तंजीम तहरीक ए लब्बैक ने कोहराम मचाया और इमरान खान की सरकार उस पर काबू करने में पूरी तरह विफल हुई तो फिर जनरल बाजवा ने सीधे हस्तक्षेप किया और इमरान खान को विश्वास में लिए बिना एक करार कर लिया, जिसका विवरण आज भी सार्वजनिक नहीं हुआ है। यहीं से इमरान खान के प्रति जनरल बाजवा का मोहभंग हुआ और वे पीएमएल (एन) की ओर फिर से देखने लगे।
इमरान खान ने सार्वजनिक रूप से यह कहा है कि जनरल बाजवा ने मार्च 2022 के पहले ही शहबाज शरीफ को प्रधानमंत्री बनवाने के लिए एक डील कर ली थी। जिसके तहत पीडीएम बाजवा को एक और साल के लिए सेवा विस्तार देगी और उन्हीं की देख रेख में 2023 में चुनाव कराया जाएगा। इस डील की खबर मिलने के बाद खुद इमरान खान अपनी ओर से उससे बेहतर डील लेकर गए और पाकिस्तान के सदर आरिफ अल्वी के यहां गुप्त मुलाकात कर सेवा विस्तार का ऑफर भी दे दिया। लेकिन उनकी बात सिरे नहीं चढ़ी।
इमरान खान सिर्फ अपनी सरकार बचाने के लिए जनरल बाजवा के साथ समझौता नहीं करना चाहते थे, बल्कि उनकी चिंता नवंबर 2022 में नए आर्मी चीफ की नियुक्ति को लेकर थी। वरीयता के आधार पर जिनके आर्मी चीफ बनने की संभावना सबसे ज्यादा थी, उन्हीं से इमरान खान को खतरा था। यानी वह वर्तमान आर्मी चीफ आसिम मुनीर को ओहदा संभालने से रोकना चाहते थे। कारण एक ही था कि उन्हें डर था कि मुनीर के आर्मी चीफ बनने के बाद उनकी राजनीति आसान नहीं होगी, क्योंकि आसिम मुनीर के साथ उनकी निजी दुश्मनी पहले ही हो गई थी जब वह आईएसआई चीफ थे। वे इमरान के करप्शन के बारे में बहुत कुछ जानते थे। इमरान ने वीटो लगाकर आसिम मुनीर को आईएसआई चीफ के पद से हटवाया था।
आसिम मुनीर को आर्मी चीफ बनने से रोकने के लिए इमरान खान ने कई ओछे हथकंडे भी अपनाए। प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने मुनीर और उनके परिवार के लोगों के बारे में पूरी जानकारी निकलवाई। सभी के आईटीआर मंगवाए गए। यह संभावना तलाश करने की कोशिश की गई कि क्या आसिम मुनीर को किसी करप्शन या आय से अधिक संपत्ति के मामले में फंसाया जा सकता है या नहीं।
इमरान खान के मंसूबे पूरे नहीं हुए, आसिम मुनीर आर्मी चीफ बन गए और जनरल बनते ही आसिफ मुनीर ने इमरान के खिलाफ कार्रवाई का मौका तलाशना शुरु कर दिया। यह मौका मिला 9 मई को जब इमरान खान की पार्टी ने लगभग पूरे पाकिस्तान में उपद्रव मचाया और फौजी अफसरों के घरों को भी निशाना बनाया। जब फौज ने इसी को बहाना बनाकर कार्रवाई शुरु की तो तहरीक ए इंसाफ के नेताओं के पास दो ही विकल्प बचे। या तो जेल चले जाएं और आर्मी कोर्ट के मुकदमों का सामना करे या इमरान का साथ छोड़ने की सार्वजनिक घोषणा करें।
इस समय पाकिस्तान में इमरान के करीबी होने का दावा करने वाले उनकी पार्टी के नेता भी दूसरे विकल्प को चुन रहे हैं। सिरीन मजारी, फवाद चौधरी जैसे नेता उन्हें छोड़कर जा चुके हैं। इमरान अकेले पड़ते जा रहे हैं। उन पर शिकंजा कसता जा रहा है। हालांकि उन्होंने महमूद कुरैशी की अगुवाई में एक कमेटी बनाकर बातचीत के जरिए रास्ता निकालने का ऐलान किया है लेकिन इससे बात बन जाएगी, ऐसा लगता नहीं है। पाकिस्तान का इतिहास ऐसा रहा है कि जो फौज के जनरल से टकराया है वह मिट्टी में ही मिल गया है। फौज का जनरल पाकिस्तान का अघोषित खुदा है। वह जिसके खिलाफ हो जाता है फिर पाकिस्तान में उसका साथ कोई नहीं देता।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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