Kokernag Encounter: कोकरनाग में आतंकियों के निशाने पर कैसे आ गये सैन्य अधिकारी?
Kokernag Encounter, मंगलवार दिनांक 12 सितंबर 2023 को कश्मीर में अनंतनाग जिले के कोकरनाग के जंगलों से समाचार आया कि सेना के एक कर्नल, एक मेजर और जम्मू कश्मीर पुलिस के एक डीएसपी आतंकवादियों के साथ एक मुठभेड़ में शहीद हो गए। समाचार इसलिए विचलित करने वाला था कि सेना के दो और पुलिस के एक अधिकारी का इस तरह शहीद होना बहुत कम ऑपरेशन में होता है।
शहीद होने वाले अधिकारियों में 19 राष्ट्रीय राइफल के कर्नल मनप्रीत सिंह, सेना मेडल; मेजर आशीष धोनचक, सेवा मेडल और जम्मू-कश्मीर पुलिस के उपाधीक्षक (डीएसपी) हुमायूं भट्ट सम्मिलित हैं। सेना के दोनों अधिकारी पूर्व में अपनी बहादुरी के लिए राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किये जा चुके हैं, जिन्हें बहादुरी के लिए "सेवा मेडल" प्रदान किया गया था।

इसमें लेशमात्र का भी संदेह नहीं है कि जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद अपने घुटने पर ला दिया गया है। छुट-पुट घटनाओं को अगर छोड़ दिया जाए तो कश्मीर से आतंकवाद को लगभग समाप्त कर दिया गया है। स्थानीय लोग भी अब आतंकवादियों का समर्थन नहीं करते। स्थानीय लोग राष्ट्र निर्माण में अपना सहयोग कर रहे हैं और अपने जीवन को संवार रहे हैं। घाटी में वातावरण बहुत अधिक बदल चुका है। कोकरनाग की घटना के बाद पूरी कश्मीर घाटी में और मुख्यतः कोकरनाग में सेना और पुलिस के समर्थन में लोगों ने शोक सभाएं की और काले झंडे बांधकर आतंकवादियों के खिलाफ अपना विरोध प्रकट किया। आतंकवादियों के विरुद्ध नारे लगाए और आतंकवाद की निन्दा की। यह बहुत ही सकारात्मक परिवर्तन है।
किंतु मुख्य प्रश्न यह है कि इस तरह से तीन अधिकारियों के बलिदान हो जाने का कारण क्या है? अति विश्वसनीय सूत्रों से पता चला है कि यह तीनों अधिकारी किसी स्थानीय सोर्स (source/ local informer) यानि खुफिया सूत्र द्वारा जंगल में आतंकवादियों के एक बड़े हाइड आउट (hideout) को देखने जा रहे थे। खुफिया सूत्र यानी सोर्स का यह दावा था कि उसकी जानकारी में आतंकवादियों का एक बहुत बड़ा हाइड आउट (छुपने का गुप्त स्थान) है, जहां पर काफी हथियार और आयुध रखे हुए हैं। खुफिया सूत्र के अनुसार यहां पर आतंकवादी भी छुपे हुए थे। लेकिन वहां पहुंचने के पहले ही रास्ते में उन पर घात लगाकर हमला किया गया। इस हमले में तीनों अधिकारी बहुत गंभीर रूप से घायल हुए।
विश्वस्त सूत्रों से यह भी पता चला है कि इन अधिकारियों ने पूरी सावधानी (precautions) बरती थी और उन्होंने बुलेट प्रूफ जैकेट पहन रखे थे। इसलिए कोई भी गोली उनके सीने या पीठ में नहीं घुस सकती थी। परन्तु आश्चर्य है कि गोली कर्नल मनप्रीत के गले में लगी। इसका मतलब यह है कि आतंकवादियों को न सिर्फ यह पता था कि सेना और पुलिस अधिकारी कहां और किस रास्ते से आएंगे बल्कि यह भी पता था कि उन्होंने बुलेट प्रूफ जैकेट पहन रखा है। इसलिए उन्होंने शरीर के उस स्थान को निशाना बनाया जहां पर बुलेट प्रूफ जैकेट नहीं होता।
ऐसी संदिग्ध जगहों पर ऑपरेशन करते समय सेना और पुलिस के अधिकांश लोग शरीर पर बुलेट प्रूफ जैकेट और सिर के ऊपर हेलमेट पहनते हैं ताकि उनके महत्वपू्र्ण अंग (vital organs) पूरी तरह सुरक्षित रहें। हेलमेट और बुलेट प्रूफ जैकेट के बीच गला ही खुला होता है। इससे स्पष्ट है कि जो खुफिया जानकारी देने वाला व्यक्ति था, या तो वह दोनों तरफ मिला हुआ था और या उसकी जानकारी के बिना ही आतंकवादियों को इस ऑपरेशन का पता चल गया था।
इसलिए इस विषय में बहुत ही गंभीर जांच की आवश्यकता है। सैन्य दृष्टि से यदि देखें तो कर्नल मनप्रीत 19 राष्ट्रीय राइफल्स के कमांडिंग ऑफिसर थे, जिनकी कम से कम 16 से 20 वर्ष की सेवा थी। कमांडिंग ऑफिसर बटालियन का प्रमुख होता है। बटालियन कमांडर या कमांडिंग ऑफिसर का क्या महत्व होता है इसे इस तरह समझा जा सकता है कि पूर्व सेनाध्यक्ष और वर्तमान में केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह से एक बार पूछा गया था कि सेवा में सबसे अधिक शक्तिशाली व्यक्ति कौन होता है तो उन्होंने कहा कि यदि आपको लगता है सेनाध्यक्ष (जनरल) होता है तो गलत है। सेना का सबसे अधिक शक्तिशाली व्यक्ति होता है कमांडिंग ऑफिसर (Commanding Officer) यानि बटालियन कमांडर।
कमांडिंग ऑफिसर या सीओ के साथ हमेशा एक त्वरित कार्यवाही दल (Quick Response Team) होता है, जिसमें बटालियन के सबसे अच्छे, फुर्तीले और सैन्य-प्रक्रिया में पारंगत जवानों को रखा जाता है। इनकी संख्या कहीं भी 15 से 20 के बीच होती है। यह कमांडिंग ऑफिसर को सिर्फ सुरक्षा ही नहीं प्रदान करते बल्कि आवश्यकता पड़ने पर किसी भी ऑपरेशन को टेक ऑन कर सकते हैं।
इसी तरह से कंपनी कमांडर (जो मेजर आशीष धानचोक थे) के पास भी अपनी एक QRT रही होगी, जो कमांडिंग ऑफिसर की QRT के बराबर नहीं लेकिन फिर भी उनकी सुरक्षा के अलावा दो-चार आतंकवादियों का सामना करने के लिए काफी होती है। तीसरे अधिकारी यानी डीएसपी हुमायूं भट भी अकेले ही नहीं गए होंगे। उनके साथ भी पुलिस के कुछ लोग अवश्य गए होंगे। तो फिर इतनी सुरक्षा होने के बाद और QRT के साथ होने के बाद यह कैसे संभव हो सकता है?
यह एक कटु सत्य है कि भारतीय सेवा के अधिकारी फ्रंट से लीड करते हैं। किसी भी ऑपरेशन में वे सबसे आगे होते हैं। लेकिन यह SOP यानी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर के अनुसार नहीं है। स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर के अनुसार कोई भी सेनाधिकारी किसी भी ऑपरेशन में सबसे आगे नहीं हो सकता। उसके आगे उसके स्काउट होते हैं, वैन गार्ड और एडवांस गार्ड (vanguard and advance guards) होते हैं। यह इसीलिए किया जाता है ताकि अधिकारी सुरक्षित रहे, इसलिए नहीं कि उनका जीवन किसी अन्य से अधिक महत्वपूर्ण है बल्कि इसलिए कि वह बटालियन के लिए और राष्ट्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
एक कमान अधिकारी के घायल होने या उसके शहीद हो जाने से पूरी बटालियन अनाथ सी हो जाती है, कमांड और कंट्रोल खत्म हो जाता है। कोकरनाग ऑपरेशन में भी यही हुआ। कमांडिंग ऑफिसर के घायल होने के बाद ऐसी अफ़रा-तफ़री और भ्रम फैला कि हेलीकॉप्टर वहां पर इनको सुरक्षित बाहर निकालने आया लेकिन लैंड नहीं कर पाया। जंगल का एरिया होने के कारण इन्हें सड़क मार्ग से चिकित्सालय पहुंचाना काफी कठिन था। कोकरनाग श्रीनगर से लगभग 88 किमी दूर है। घाटी में यह दूरी तय करने में कम से कम दो घंटे लग जाते।
कमान-कंट्रोल खत्म हो जाने और अफ़रा-तफ़री का फायदा उठाकर आतंकवादियों ने हेलीकॉप्टर पर ही फायरिंग की। मतलब यह कि कश्मीर में आतंकवाद भले ही लगभग खत्म हो चुका है लेकिन एक दो आतंकवादियों ने पूरे देश ही नहीं विश्व भर में यह समाचार प्रसारित कर दिया कि वे अभी जीवित हैं।
दूसरी बात यह है कि सेना के स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर के अनुसार कभी भी वरिष्ठ अधिकारी एक साथ ऑपरेशन में एक जगह जमा होकर नहीं चलते। यह डिसेंट्रलाइजेशन इसीलिए होता है ताकि किसी भी तरह की फायरिंग या एनकाउंटर होने पर सभी अधिकारी एक साथ घायल न हो या ट्रैप में न फंसे। सभी के लिए निर्देश होता है कि वह अपनी कंपनी को कमान करने के लिए अपनी कंपनी लोकेशन में ही रहेंगे। कोकरनाग में तीन अधिकारियों का एक साथ जाना भी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर का उल्लंघन लगता है।
जो कुछ हुआ वह अत्यंत दुखद है। हर घटना या दुर्घटना हमें कुछ न कुछ सीख देती है। भारतीय सेना ने 1990 से लेकर अभी तक काउंटर इंसरजेंसी ऑपरेशन यानी आतंकवादी विरोधी कार्यवाही में कश्मीर में बहुत कुछ सीखा है और स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर में भी बहुत सारे परिवर्तन किए गए हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इस बात पर जोर दिया जाए कि जो वरिष्ठ अधिकारी हैं, वे हमेशा स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर का पालन करें। इसमें एक पैसे का शक नहीं है कि भारतीय सेवा के अधिकारी विश्व के श्रेष्ठतम अधिकारियों में है लेकिन "लीडिंग फ्रॉम द फ्रंट" सुरक्षा को कंप्रोमाइज किये बिना ही होना चाहिए।
इसके साथ ही यह गोल्डन रूल है कि कोई भी खुफिया सोर्स 100% विश्वसनीय नहीं होता। उसकी हर बात को शक की दृष्टि से देखना आवश्यक होता है। इस दुर्घटना का सबसे बड़ा कारण जो मालूम पड़ता है वह है सोर्स का कंप्रोमाइज होना। यानि या तो जिसने सूचना दी वह स्वयं उस तरफ भी मिला हुआ था और या तो इसकी सूचना किन्हीं माध्यमों से आतंकवादियों तक पहुंच गई, वरना इतनी बारीक योजना बनाकर वह तीन अधिकारियों को शहीद करने में कभी सफल नहीं होते।
ऐसी घटनाएं न केवल उन परिवारों के लिए व्यक्तिगत अपूरणीय क्षति होती हैं बल्कि राष्ट्र की भी अपूरणीय क्षति होती है जिनकी भरपाई भले न किया जा सके लेकिन आवश्यक उपाय करके भविष्य में संभावित नुकसान से जरूर बचा जा सकता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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