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बीएसएनल को मिला 1.64 लाख करोड़ पैकेज: क्या यह सरकारी कंपनी अब फायदे में आ जाएगी?

केंद्र सरकार ने भारत संचार निगम लिमिटेड के लिए 1.64 लाख करोड़ रुपए के पैकेज को मंजूरी दी है। इस पैकेज के तहत बीएसएनएल को वित्तीय तौर पर आत्मनिर्भर बनाया जाएगा ताकि वह दूरसंचार सेवाओं में जारी प्रतिस्पर्धा में बना रहे। भारत में इस समय दूरसंचार के क्षेत्र में बीएसएनएल इकलौता सरकारी दावेदार है। बीएसएनल के अलावा, एयरटेल, जीओ, वोदाफोन और आइडिया ये निजी क्षेत्र की कंपनियां हैं।

How beneficial did BSNL get 1.64 lakh crore package?

इसके बावजूद बीएसएनएल ने कोई चौदह साल पहले लाभ कमाया था। तब से लेकर अब तक बीएसएनएल सिर्फ घाटे में ही रहता है। सरकारें उसके बेल आउट पैकेज जारी करती हैं और अगली बार वह फिर से नये घाटे में पहुंच जाता है। तब ऐसे में सवाल ये उठता है कि एक सरकारी कंपनी जो सिर्फ घाटे में रहने के लिए ही चल रही है तो इस नये पैकेज से फायदे में आ जाएगी इसकी क्या गारंटी है?

सरकारी आंकड़ों के अनुसार नवंबर 2021 तक भारत में दूरसंचार सेवाओं का उपभोक्ता आधार 118 करोड़ तक पहुंच चुका है। यह आंकड़ा गवाह है कि दूरसंचार सेवाएं भारत के तकरीबन प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंच चुकी हैं। अपनी आय बढ़ाने के लिए दूरसंचार कंपनियां अब मोबाइल उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ाने की बजाय इंटरनेट सेवाओं की कवरेज बढ़ाने और प्रति व्यक्ति द्वारा किये जा रहे रिचार्ज का खर्च बढ़ाने पर अधिक निर्भर हैं।

इन सब में बीएसएनएल कहां खड़ी है? जहां तक इंटरनेट कवरेज की बात है तो बाकी निजी कंपनियां जिस समय 5जी की दौड़ में हैं, उस समय इस सरकारी कंपनी ने अभी तक 4जी सेवाएं भी शुरू नहीं की हैं। मोबाइल पर टीवी, गेम्स और वीडियो सामग्री के बढ़ते चलन के दौर में बीएसएनएल की 4जी सेवाओं में गैर-मौजूदगी यह समझाने के लिए काफी है कि कंपनी ग्राहकों की जरूरतों के प्रति कितनी सजग है।

बहरहाल इंटरनेट सेवाएं छोड़ भी दें तो भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) द्वारा उपलब्ध करवाए गए कुल उपभोक्ता आंकड़ों के अनुसार भी 2019 से कंपनी के ग्राहकों की संख्या घट रही है जबकि दूरसंचार क्षेत्र के दो बड़े खिलाड़ियों एयरटेल और जियो ने इस दौरान अपने ग्राहकों की संख्या में वृद्धि की है। इस अवधि के दौरान टाटा इंडिकॉम बाजार से करीब-करीब बाहर हो चुकी है जबकि वोडाफोन और आइडिया एक साथ आकर किसी तरह टिके हुए हैं।

बीएसएनएल की दिक्कत सिर्फ आधुनिक प्रौद्योगिकी और सेवाओं तक ही सीमित नहीं है। सरकारी कंपनी के कर्मचारी होने के नाते इस कंपनी के कर्मचारी स्वयं को ग्राहक के प्रति उत्तरदायी समझने के बजाय खुद को सरकार ही समझते हैं। इस पैकेज के बाद बीएसएनएल अपनी इस कार्य संस्कृति को कैसे बदल पाएगी। यह बड़ी चुनौती है। दीगर है कि ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में दूरभाष सेवाएं उपलब्ध करवाने के चलते बीएसएनएल को सार्वभौमिक सेवा देयता निधि से सब्सिडी मिलती रही है। हालांकि दूरसंचार विभाग के तहत संबद्ध कार्यालय सार्वभौमिक सेवा देयता निधि (यूएसओएफ) की ही रिपोर्ट से पता चलता है कि ग्राहक सेवा के प्रति गैर-जिम्मेदार रवैये के कारण यह सब्सिडी प्राप्त सेवाओं में भी ग्राहकों की अपेक्षाएं पूरी नहीं कर पाई।

इसके साथ ही यह आंकड़ा भी गौरतलब है कि 2017-20 के दौरान पिछले तीन वर्षों के दौरान बीएसएनएल के 41,34,029 लैंडलाइन और 3,45,000 मोबाइल कनेक्शन सरेंडर किए गए हैं। यह आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि लैंडलाइन सेवाओं की शुरुआत करने वाली कंपनी होने और सब्सिडी मिलने के बावजूद बीएसएनएल कितनी प्रतिस्पर्धी सेवाएं दे पाई है।

इस पैकेज के बूते बीएसएनएल के पुनरुद्धार की संभावना का आंकलन करने के लिए यह भी जरूरी है कि इस कंपनी के हाल के वर्षों के वित्तीय प्रदर्शन को परखा जाए। कंपनी पिछले तीन वर्षों से लगातार घाटे में जा रही है और इस पर कर्ज बढ़ रहा है। मार्च 2020 तक कंपनी का ऋण 21,902 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। यह ऋण और लगातार घाटा इस बात के प्रमाण हैं कि कंपनी ग्राहकों का भरोसा गंवा चुकी है, ऐसे में पैकेज इसकी किस्मत बदल सकेगा, इसकी संभावना कम ही है।

बीएसएनएल को बचाने के पीछे एक तर्क यह दिया जा रहा है कि दूरदराज के इलाकों में दूरसंचार सेवाएं पहुंचाने के लिए किसी सरकारी कंपनी का होना जरूरी है। एयर इंडिया को बचाने के लिए भी कभी यही तर्क दिया जाता था कि दूरदराज के इलाकों तक हवाई सेवाएं पहुंचाने के लिए सरकारी कंपनी का अस्तित्व में रहना जरूरी है। हालांकि उड़ान योजना से यह प्रमाणित हो गया है कि दूरदराज या व्यावसायिक रूप से गैर-लाभकारी क्षेत्रों तक सेवाएं पहुंचाने के लिए सरकारी कंपनी के बजाय सरकारी प्रोत्साहन अधिक कारगर है।

ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में ब्रॉडबैंड और दूरसंचार सेवाएं पहुंचाने के लिए भी उड़ान सेवा जैसा मॉडल अपनाया जा सकता है। इसके अलावा विशेष रूप से दुर्गम, उग्रवाद प्रभावित या सैन्य रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों को चिह्नित करके मात्र इनमें सेवाएं प्रदान करने के लिए विशेष कंपनी बनाई जा सकती है ताकि सरकार के खजाने या वस्तुतः आम लोगों की जेब पर कम बोझ पड़े। मोदी सरकार की घोषित नीति यह रही है कि सरकार को कंपनियां चलाने के बजाय देश चलाने पर ध्यान देना चाहिए। इसी विचार से एयर इंडिया का विनिवेश किया गया। फिर भी बीएसएनएल के मामले में बिल्कुल अलग रुख क्यों अपनाया जा रहा है, यह समझ से परे है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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