Holi in Scriptures: वैदिक परंपरा में होली का उत्सव और महत्व
वेदों में वर्णित चार उत्सवों में होली भी है। यह जरूर है कि वैदिक काल में जो ‘होलाका’ थी, वह अब ‘होली’ है।

वैदिक काल से लेकर आज तक होली ऋषियों और कृषकों द्वारा मनाई जाती रही है। गुरुकुलों में वटुक फाल्गुनी पूर्णिमा को 'साम-गाम' यानी सामवेद के मंत्रों का राग और ताल में गान करते थे। सामवेद से जुड़े 'ताण्ड्य महाब्राह्मण' के इन मंत्रों का सीधा संबंध होली से है-गावो हाऽऽरे सुरभय इदम्मधु। गावो घृतस्य मातर इदम्मधु।। एक ओर गुरुकुलों में होली पर 'हुताशनी' अनुष्ठान होता है, वहीं नई फसल के तैयार हो जाने पर किसान और नागरिक चटकीली रंग-बिरंगी होली खेलते हैं।
वैदिक संस्कृति ने होली को सर्वप्रथम देवता 'अग्नि' से मिलाया। धरती पर उपजे नए धान्य को ऐसे थोड़े खाया जाता है? जौ-गेहूं की चमचमाती बालियों को 'अग्नि देवता' को समर्पित किया जाता है। यजुर्वेद ने नव सस्य से पैदा नए धान्य को 'वाज' कहा है। होली पर अग्नि-ज्वाला में 'वाज' की आहुति देकर फिर उन पकी हुई बालियों को प्रसाद रूप में ग्रहण करना है। यह 'नवधान्य-इष्टि' नाम का वैदिक यज्ञ है। फसल से जुड़ा होने के नाते होली जीवन को चलाने वाला उत्सव है।
'काठक गृह्यसूत्र' ने होली को स्त्रियों के सौभाग्य वृद्धि के लिए संपन्न किया जाने वाला एक अनुष्ठान माना है, जिसके देवता चंद्रमा हैं। 'तंत्र शास्त्र' में फागुनी पूनम की रात 'दारुण रात्रि' है। यह साधना से सिद्धियों को प्राप्त करने की रात्रि है।
भारत रत्न से सम्मानित डॉ. पांडुरंग वामन काणे ने 'धर्मशास्त्र के इतिहास' में होली को भारत में सबसे बड़े उल्लास और आनंद का उत्सव माना है। होली को मनाने में पूरे देश में भिन्न-भिन्न मान्यताएं और भावनाएं हैं। बंगाल को छोड़कर होलिका-दहन प्राय: सर्वत्र होता है। बंगाल में फाल्गुन पूर्णिमा पर श्रीकृष्ण का झूला प्रसिद्ध है। यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं है कि होली पर रंग खेलने की अवधि भी पूरे देश में अलग-अलग है। कहीं रंगीली बौछारें होली के अगले दिन बरसती हैं। कहीं पांचवें दिन तो कहीं आठवें दिन और कहीं पूरे पखवाड़े तक ही। मस्ती से सराबोर लोग एक-दूसरे के रंग लगाते हैं तो साथ में रंग घुले जल की बौछारें भी एक-दूसरे पर छोड़ते हैं। पर इन सबके पीछे जो पारंपरिक गूढ धार्मिक तत्त्व छिपा है, वह है पुरोहितों द्वारा होलिका पूजा और श्रीकृष्ण का गोपियों के साथ होली खेलना।
होली का एक पुराना साहित्यिक वर्णन सातवीं सदी के संस्कृत नाटककार और कन्नौज के महाराज हर्षवर्धन ने अपने 'रत्नावली' संस्कृत नाटक में किया है। वहां हो रही होली 'वसंतोत्सव' है। स्थान है कौशांबी, आज से ढार्ई हजार साल पुराना एक सुंदर शहर। कौशांबी के राजा उदयन अपने किले पर खड़े होकर सारी प्रजा को विभिन्न रंगों से होली खेलते देख प्रमुदित हो रहे हैं। स्त्रियां होली खेलने में व्यस्त हैं। कुंकुम से भरी मुट्ठियां आकाश में उड़ाकर लाल बादल बना रही हैं। कहीं-कहीं पीले गुलाल से बने बादल यूं लग रहे हैं, मानो वे स्वर्ण के ही बादल हों।
इधर, राजमहल के भीतर होली यूं जमी है कि मदमस्त लोग पिचकारियों से एक-दूसरे पर सुगंधित जल डाल रहे हैं, जिससे महल में भारी कीचड़ मच गया है। मतवाली कामिनियों के मस्तक का सिंदूर पानी के साथ बहकर नीचे तक फैल गया है। हर्षवर्धन ने पिचकारी का संस्कृत नाम दिया है- शृंगक। कौशांबी में दिन भर नाच-गान चलता है और फिर सांझ में लोग जुटते हैं कामदेव के पूजन के लिए। राजा उदयन अपने 'मकरंद-उद्यान' में लगे लाल अशोक के वृक्ष में कामदेव या प्रद्युम्न के विग्रह का पूजन करते हैं। नागरिक कामदेव के मंदिर में जाकर उन्हें पूजते हैं तथा दांपत्य में 'अंतरंगता' बढ़ाने की याचना करते हैं।
प्राकृत में पहली शताब्दी के लगभग लिखी 'गाहा सतसई' ने होली को 'वसंतोत्सव' न कहकर 'फाल्गुनोत्सव' कहा है। यहां के 'फाल्गुनोत्सव' में नदी किनारे इकट्ठे युवक-युवतियां एक-दूसरे पर बिना किसी भेदभाव के नदी का कीचड़ उछाल रहे हैं। 'गाहा सतसई' की होली गांव की है। अत: गांवों के सारे संसाधन होली खेलने के काम आते हैं। गौर करने की बात है कि जब 'गाहा सतसई' की होली खेली जा रही थी, तब वात्स्यायन अपने 'कामसूत्र' में सुवसंतक, उदकक्ष्वेडिका और अभ्यूषखादिका जैसे उत्सवों की चर्चा कर रहे थे। इनमें 'सुवसंतक' अब मनाए जाने वाली वसंत पंचमी है। 'उदकक्ष्वेडिका' पानी की पिचकारियों से रंग खेलने का उत्सव है। 'अभ्यूषखादिका' नए धान्य को आग में भूनकर खाने का उत्सव है। 'कामसूत्र' की होली मुक्त एवं स्वछंद हास-परिहास का उत्सव है। नाच-गान, हंसी-ठिठोली और मौज-मस्ती की त्रिवेणी।
श्रीकृष्ण पिचकारी लेकर हम सभी जीवों को अपने आनंदरस के रंग में रंगने हेतु मोर्चा संभाले बैठे है। जब उनकी आनंद की पिचकारी सतरंगी धार छोड़ेगी तो भला क्या मजाल कि कोई बचकर निकल जाए! ऐसी धार पड़े कि एक ही पिचकारी में जन्म-जन्मांतर तक रंगीले हो जाए।
निर्गुणियों की होली में आदिम रंग का गहरा चमत्कार है। उनकी होरी नाच-गान और धूम-धड़ाके से दूर है। नाम जप को महत्त्व देने वाले निर्गुणी संप्रदायों के लिए यह पर्व भागवत महापुराण के प्रह्लाद उपाख्यान से जुड़ा है। वे मानते हैं कि संसार में प्रह्लाद ने भगवान के नाम जप पर विश्वास कर अनूठी निष्ठा प्रकट की। उपनिषदों के निरंजन ब्रह्म का मौलिक वर्ण है उज्ज्वल श्वेत यानी सीधा सपाट। कोई चटकीला, भडक़ीला नहीं। शंकराचार्य जैसे अद्वैती आचार्य उसे सब गुणों से रहित भले मानें, पर है वह बड़ा निराला। रामानुजाचार्य और वल्लभाचार्य का रसिया भक्तों से रागात्मक संवाद करता है। महात्मा कबीर, दादू, गुरु जंभेश्वर, रामचरण और ब्रह्मानंद जैसे निर्गुणियों के साथ सगुण भक्ति धारा की मीरां ने होरी की लाली को भीतर तक उतारा।
ब्रह्मानंद के कन्हाई ऐसी अजीब होली मचा देते हैं, जिसका अचरज भारी है - एक समय श्रीकृष्ण प्रभु को होली खेलने की मन में आई। पर अकेले होली नहीं खेली जा सकती, इससे उन्होंने 'बहुताई' प्रकट कर दी। पांच महाभूतों से एक पिचकारी बनाई, जिसमें चौदह भुवनों के रंग भरकर उनकी सृष्टि कर दी। पांच ज्ञानेंद्रियों के विषय यानी रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श की गुलाल बनाकर बीच ब्रह्मांड में उड़ाई। जिन-जिन की आंखों में यह गुलाल पड़ी, उनकी सुध-बुध जाती रही। उन्हें कुछ सूझ ही नहीं पा रहा है।
विश्नोई संप्रदाय जो एक प्रकार से प्रह्लादपंथी है, होली की रात को शोक में मनाता है। गुरु जांभोजी ने कहा, 'प्रहलाद से वाचा कीन्हीं, आयो बारां काजै' अर्थात प्रह्लाद भक्त को दिए वचनानुसार लोगों के कल्याण के लिए वे धरती पर प्रकट हुए हैं। भक्त प्रह्लाद विश्नोइयों के आदिगुरु हैं। विश्नोइयों में होलिका दहन नहीं किया जाता। उनकी मान्यता है कि होलिका भक्त प्रह्लाद को मारना चाहती है, इस कारण सबमें शोक छाया हुआ है। शोक से निवृत्ति के लिए विश्नोई-जन होली की रात जागरण और प्रह्लाद चरित का पाठ करते हैं। सिर्फ खिचड़ी खाते हैं।
होली के दूसरे दिन शोक निवारण करने के लिए यज्ञ होता है, जिसमें 'पाहल' तैयार किया जाता है। 'पाहल' यानी यज्ञ वेदी के ईशान कोण में रखा जल कुंभ। इस जल कुंभ का इस्तेमाल शोक निवृत्ति के साथ ही साल में एक बार ही होने वाले सामाजिक सद्भाव के लिए किया जाता है। आपसी मनमुटाव को दूर करने के लिए पाहल हाथ में देकर नाराज लोगों का समझौता करवाया जाता है।
रामस्नेही संप्रदाय में होली पर फूलडोल होता है। दादू के शिष्य जनगोपाल के लिखे प्रह्लाद चरित का रात्रि में पाठ होता है। फूलडोल से तात्पर्य 'देवन आए पुष्प बरसाए, ताते फूलडोल कहाए' है, जिसका मतलब है कि भक्त प्रह्लाद के अग्नि में न जलने पर उनके भक्ति के चमत्कार से अभिभूत होकर देवताओं ने उन पर पुष्प बरसाए, यही फूलडोल है।
मीरा की होली शील और संतोष की केसर घोलकर प्रेम की पिचकारी से भिगोती है। गुलाल के उड़ने से सारा गगन लाल हो गया है, जिस पर विधाता का रंग उड़ रहा है। मीरा होली के चार दिनों को असाधारण रूप से प्रकट कर रही है - फागुन के दिन चार रे होली खेल मना रे। श्याम रंग में रंगी मीरा की चुनरिया को श्याम पिया खुद रंगने आता है।
अब भले बदलते परिवेश की काली परछाई आत्मा से जुड़े परंपरा के इन अनूठे रंगों को बदरंग करने पर तुली है, परंतु यह रंग तो ऐसा है, जिसे बिना आंखों वाले सूरदास भी पहचानते है-सूरदास की काली कमरिया चढत न दूजो रंग!
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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