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Hit and Run Law: सड़क पर सुरक्षा के कानून का नाहक विरोध

Hit and Run Law: सड़क पर चलते समय भारत में एक अघोषित नियम काम करता है। वह यह कि अगर दो गाड़ियों में एक्सीडेन्ट हो जाए तो गलती हमेशा बड़ी गाड़ी वाले की मानी जाती है। मसलन, किसी फोर व्हीलर से किसी बाइक की टक्कर हो जाए तो दोष हमेशा फोर व्हीलर वाले के ऊपर डाला जाएगा।

Hit and Run Law Drivers Protest in states Unnecessary opposition to road safety law

इसी तरह किसी ट्रक या बस वाले की टक्कर किसी फोर व्हीलर वाले से हो जाए तो ट्रक या बस का ड्राइवर ही दोषी मान लिया जाता है।

चूक किसने की, गलती किसकी थी इसकी विवेचना भी अक्सर छोटी गाड़ियों वाले के पक्ष में ही जाती है। अगर उसमें छोटी गाड़ी चलानेवाले की जान चली गयी, फिर तो बड़ी गाड़ी वाला पक्का दोषी सिद्ध होता है। हालांकि भारत में अब तक ऐसे 'दोषियों' के लिए अधिकतम सजा 2 साल की ही होती थी, इसलिए 'दोषी' को आर्थिक दंड भले चाहे जो लग जाए जेल जाने की संभावना कम ही रहती है। भारत की पुरानी कानून व्यवस्था में दो साल तक की सजा मिलने पर आसानी से जमानत मिल जाती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं रहा।

भारत सरकार ने बीते संसद सत्र में जिस नयी न्याय संहिता का निर्माण किया है उसमें एक्सीडोन्ट के मामले में दोषियों की सजा बढ़ाई है और जुर्माना भी। "हिट एण्ड रन" मामलों में जहां वाहन चालक एक्सीडेन्ट करके भाग जाता है, वहां अब 10 साल की सजा और 7 लाख जुर्माने का प्रावधान किया गया है। ऐसा प्रावधान करने से पहले दुनियाभर के कानूनों का अध्ययन किया गया और पाया गया कि जहां एक्सीडेन्ट से जुड़े कठोर कानून हैं वहां एक्सीडेन्ट कम हो रहे हैं। वाहन चालक अधिक सावधानी से गाड़ी चला रहे हैं और सड़क के नियमों का पालन कर रहे हैं।

लेकिन यूरोप या अमेरिका आदि की तुलना में भारत में जो एक बड़ा विरोधाभास है वह है यहां दोपहिया वाहनों की संख्या। भारत में कुल 32 से 33 करोड़ के बीच वाहन सड़कों पर हैं जिसमें से तीन चौथाई दोपहिया वाहन हैं। भारत दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश ही नहीं है बल्कि सबसे अधिक दोपहिया वाहन वाला देश भी है। इसलिए सबसे अधिक सड़क दुर्घटना का शिकार भी दोपहिया वाहन ही होते हैं। इसके अलावा बड़े ट्रकों या बसों की चपेट में चार पहिया वाहन भी आते हैं।

दुनियाभर की सड़कों पर जितने एक्सीडेन्ट होते हैं उसमें अकेले 11 प्रतिशत भारत में होते हैं। 2022 में साढे चार लाख से अधिक सड़क दुर्घटनाएं हुई थीं जिसमें 1 लाख 60 हजार से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवा दी थी। इतने लोग सड़क हादसों में मारे जाएं तो निश्चित रूप से सरकारों को चौकन्ना होने की जरूरत होती है। सरकार के पास नियम कानून बनाने का अधिकार होता है और उसने नयी न्याय संहिता में हिट एण्ड रन के मामले में कठोर सजा का प्रावधान करके ड्राइवरों को सचेत रहकर गाड़ी चलाने का संदेश दे दिया है।

अब महाराष्ट्र सहित देश के अधिकांश हिस्से के ट्रक और बस ड्राइवर इस कानून के विरोध में चक्का जाम पर उतर आये हैं। उनकी शिकायत है कि यह ड्राइवरों के साथ अन्याय है। उनका तर्क है कि सड़क पर एक्सीडेन्ट की स्थिति में अगर वह गाड़ी छोड़कर न भागें तो वहां इकट्ठा होनेवाले लोग ही ड्राइवरों की पीटकर हत्या कर देंगे। उनकी यह शिकायत अनुचित नहीं है। एक्सीडेन्ट की अवस्था में सामाजिक नियमों के मुताबिक दोष तो बड़ी गाड़ी वाले का ही माना जाता है और अदालत में भी यही बात सही मानी जाती है।

लेकिन यहां एक बात समझनेवाली है कि नयी न्याय संहिता के सेक्सन 104(2) में यह प्रावधान किया गया है कि अगर एक्सीडेन्ट की अवस्था में 'दोषी' चालक पुलिस को सूचित नहीं करता है तो ही उसे हिट एण्ड रन के तहत दोषी माना जाएगा। अगर वह पुलिस स्टेशन या मजिस्ट्रेट को इसकी सूचना दे देता है कि उसकी गाड़ी से एक्सीडेन्ट हो गया है तो उसके लिए सात साल की सजा का प्रावधान नहीं होगा।

भारत में यह देखने में आया है कि अगर लोगों की नजर न पड़े तो एक्सीडेन्ट करनेवाले ड्राइवर कई बार गाड़ी सहित तो कई बार गाड़ी छोड़कर फरार हो जाते हैं। ऐसे में जो हादसे का शिकार होते हैं उनके या उनके परिवार को न्याय नहीं मिल पाता है। सरकार ने जो नया प्रावधान किया है वह बहुत सूझबूझकर किया है। अगर 'दोषी' ड्राइवर पुलिस या मजिस्ट्रेट को सूचित कर देता है तो उसे 10 साल की कठोर सजा से डरने की जरूरत नहीं है। इसके बाद उसका पक्ष भी सुना जाएगा और जज के विवेक पर निर्भर करेगा कि वह उसे कितनी सजा या जुर्माना सुनाता है। 10 साल की सजा भी वहां दी जाएगी जहां एक्सीडेन्ट में सामनेवाले की मौत हो जाएगी।

देश में हिट एण्ड रन के एक से एक कुख्यात मामले सामने आ चुके हैं। सवाल सिर्फ गरीब ट्रक चालकों का नहीं है। अमीर बाप की बिगड़ी औलादों के कई केस देश में चर्चित हो चुके हैं। 2002 का सलमान खान का चर्चित हिट एण्ड रन केस ही नहीं, मुंबई दिल्ली जैसे शहरों में आये दिन ऐसे केस होते रहते हैं जिसमें कोई न कोई कारवाला किसी को कुचलकर चला जाता है और उसके खिलाफ कोई सुनवाई नहीं होती। मुंबई में पुलिस अधिकारियों का यह भी कहना है कि फिल्मों की तर्ज पर अब एक्सीडेन्ट करके हत्या करना भी अपराध का एक तरीका बनता जा रहा है।

ऐसे में सख्त कानून ही हैं जो लोगों के साथ न्याय कर सकते हैं। आल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस की ओर से चक्का जाम करवाकर इस तरह देशभर की सप्लाई लाइन को बाधित करना कहीं से उचित नहीं कहा जा सकता। ट्रक बस ड्राइवरों की जो आशंकाएं हैं उसे सरकार के स्तर पर बताया जा सकता है और बीच का कोई रास्ता निकाला जा सकता है कि बड़ी गाड़ी वालों को ही एकतरफा दोषी न मान लिया जाए। लेकिन न्याय संहिता में जो नये प्रावधान किये गये हैं उनका स्वागत करना चाहिए। इससे निश्चित रूप से देश की सड़कों पर लापरवाही से वाहन चलानेवालों को सबक मिलेगा और सड़क दुर्घटनाओं में कमी आयेगी।

वैश्विक स्तर पर वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन ने 2021-2030 को सड़क सुरक्षा कार्रवाई दशक घोषित किया है। उसका लक्ष्य है कि वर्ष 2030 तक दुनिया भर में सड़क हादसों की संख्‍या आधी कर दी जाए।

इसको लेकर डब्‍ल्‍यूएचओ द्वारा सौ से अधिक देशों में 2010 से 2021 तक सड़क परिवहन की स्थिति का अध्‍ययन किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक अध्‍ययन अवधि के दौरान वैश्विक स्‍तर पर सड़क हादसों की संख्‍या में 5% की गिरावट आई है, लेकिन इसी अवधि के दौरान भारत में दुर्घटनाओं की संख्‍या में 15% की वृद्धि दर्ज की गई है।

इन बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं को रोकना है तो कठोर कानून बनाने ही पड़ेंगे। साथ ही सड़क पर चलनेवालों को नियम कानूनों का पालन करना होगा। सड़क पर होने वाले हादसों में जान किसी की भी जाए, मरता सिर्फ वही नहीं बल्कि कोई न कोई घर टूटता है। कोई न कोई बच्चा अनाथ होता है और कोई न कोई स्त्री विधवा होती है। इसलिए सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए कठोर कानून समय की मांग है। नयी न्याय संहिता के प्रावधान का विरोध नहीं बल्कि स्वागत करने की जरूरत है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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