Hindu Calender: इसलिए चैत्र प्रतिप्रदा से शुरु होता है भारत का नववर्ष
भारत की कालगणना के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा अर्थात चैत्र नवरात्रि का पहला दिन नववर्ष होता है जिसे नव संवत्सर कहते हैं। इसके पीछे भारतीय कालगणना का वैज्ञानिक आधार क्या है?

Hindu Calender: चैत्र प्रतिपदा को मराठी समुदाय गुड़ी पड़वा के नाम से नववर्ष मनाता है। सिंधी समुदाय इसे चेटीचंड के नाम से मनाता है। केरल और गोवा में कोंकणी समुदाय में इसे सम्वत्सर पड़वो कहा जाता है। कश्मीर में इस नववर्ष को नवरेह कहा जाता है। पारसी समाज इसे नवरोज कहता है। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में इस दिन को 'उगादि' कहते हैं। मणिपुर में यह दिन सजिबु नोंगमा पानबा के नाम से मनाया जाता है।
शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र का आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही होता है। माना जाता है कि प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक का दिन भी यही है। इसी दिन स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना कर कृणवंतो विश्वमआर्यम का संदेश दिया था। कहा जाता है कि इसी दिन युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ था, और उसी दिन से युगाब्द (युधिष्ठिर सम्वत्) का भी आरंभ हुआ। यह तो हम सबने सुना है कि उज्जयिनी सम्राट विक्रमादित्य द्वारा इसी दिन विक्रम सम्वत् प्रारम्भ हुआ था।
इसी दिन एक और पंचांग जिसे भारत सरकार अपना राष्ट्रीय पंचांग मनाती है वह शालिवाहन शक सम्वत् का आरंभ भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही होता है। कुल मिलाकर यह स्पष्ट है कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न नामों से चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है। इसलिये यह भारतीय नववर्ष है।
वैदिक साहित्य में "वर्ष" के लिए संवत्सर शब्द का प्रयोग किया गया है। मध्ययुगीन साहित्य में, एक संवत्सर "जोवियन वर्ष" (Jupiter year) का उल्लेख है। यह बृहस्पति ग्रह की सापेक्ष स्थिति पर आधारित वर्ष है। प्राचीन सूर्य सिद्धांत में एक संवत्सर की गणना लगभग 361 दिनों की होती है, जो कि एक सौर वर्ष से कुछ कम है। इसलिए, राशि चक्र के सभी बारह राशियों से गुजरते हुए बृहस्पति की एक पूर्ण परिक्रमा लगभग बारह सौर वर्षों के बराबर होती है। अर्थात् 12 × 5 = 60 सम्वत्सर।
60 संवत्सर का एक चक्र होता है। इस चक्र के प्रत्येक संवत्सर को एक नाम दिया गया है। एक बार जब सभी 60 संवत्सर समाप्त हो जाते हैं, तो चक्र फिर से शुरू हो जाता है। 60 संवत्सर का यह चक्र आकाश में बृहस्पति और शनि की सापेक्ष स्थिति पर आधारित है। बृहस्पति और शनि की परिक्रमा अवधि क्रमशः लगभग 12 और 30 सौर वर्ष है। हर साठ साल में, दोनों ग्रह लगभग उसी नक्षत्र पथ पर स्थित होंगे जहां उन्होंने साठ साल पहले शुरू किया था। इस प्रकार एक साठ साल का चक्र बनता है। इन 60 संवत्सरों को 20-20 संवत्सरों की 3 श्रेणियों में विभाजित किया गया है। प्रभाव से व्यय तक के पहले 20 ब्रह्मा, अगले 20 सर्वजीत से परभवा तक विष्णु, और अंतिम 20 शिव श्रेणी में आते हैं।
एक सम्वत् वर्ष में 12 महीने होते हैं। प्रत्येक महीने में 15 दिन के दो पक्ष होते हैं- शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष। प्रत्येक वर्ष में दो अयन होते हैं। इन दो अयनों की राशियों में 27 नक्षत्र भ्रमण करते रहते हैं। सर्वप्रथम 7 दिन का एक सप्ताह और 12 मास का एक वर्ष रखने का प्रचलन विक्रम संवत से आरम्भ हुआ। महीने की गणना सूर्य व चंद्रमा की गति पर की जाती है। यह 12 राशियाँ बारह सौर मास हैं।
जिस दिन सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है उसी दिन की संक्रांति होती है। उसे पर्व कहते हैं। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है उसी आधार पर महीनों का नामकरण हुआ है। चन्द्रमा की कलाओं के अनुरूप उस प्रकृति आधारित होने के कारण, चंद्र वर्ष, सौर वर्ष से 11 दिन 3 घड़ी 48 पल छोटा होता है। इसीलिए प्रत्येक 3 वर्ष में इसमें एक महीना जोड़ दिया जाता है। जिसे अधिक मास कहते हैं। भारतीय वर्ष को बारह महीनों में विभाजित गया है, जहां प्रत्येक महीने में तीस दिन होते हैं।
प्रत्येक माह को चंद्रमा की कलाओं के घटने और बढ़ने के आधार पर दो पक्षों में अविभाजित किया गया है। इनके नाम शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष हैं। एक पक्ष में लगभग पंद्रह दिन या दो सप्ताह होते हैं। एक सप्ताह में सात दिन होते हैं। एक दिन को तिथि कहा जाता है। पञ्चाङ्ग के आधार पर एक तिथि में उन्नीस घंटे से लेकर चौबीस घंटे तक हो सकते हैं। आम तौर पर दिन को चौबीस घंटों में बांटा गया है। इसके साथ ही दिवस को आठ पहरों में भी बांटा गया है। एक प्रहर लगभग तीन घंटे का होता है। एक घंटे में लगभग दो घड़ी होती है। एक पल लगभग आधा मिनट के बराबर होता है और एक पल में चौबीस क्षण होते हैं। प्रहर के अनुसार देखा जाए तो चार प्रहर का दिन और चार प्रहर की रात होती है।
गणना के आधार पर हिंदू पंचांग की तीन धाराएं हैं- पहली चंद्र आधारित, दूसरी नक्षत्र आधारित और तीसरी सूर्य आधारित कैलेंडर पद्धति। भिन्न-भिन्न रूप में यह पूरे भारत में माना जाता है। हिन्दू त्यौहार हिन्दू पंचाग के अनुसार होते हैं। हिन्दी भाषी क्षेत्रों के हिन्दू पञ्चाङ्ग में विक्रम संवत् प्रचलित है। विक्रम संवत् का आरम्भ मार्च या अप्रैल में होता है। इस वर्ष लगभग मार्च/अप्रैल 2023 से फरवरी/मार्च 2024 तक विक्रमी सम्वत 2080 है।
भारत में प्राचीन काल से परंपरागत रूप से हिन्दू पञ्चाङ्ग का प्रयोग होता आ रहा है। पंचांग शब्द का अर्थ है , पाँच अंङ्ग वाला। पंचांग में समय गणना के पाँच अंग हैं : वार, तिथि, नक्षत्र, योग, और करण। हिन्दू कर्मकांड में काल और स्थान का अत्यधिक महत्व है। हिन्दू परंपरा में समस्त शुभ कार्यों के आरम्भ में संकल्प करते समय उस स्थान के साथ, उस समय के संवत्सर का उच्चारण किया जाता है। इसे दिक्काल (दिग्+काल) कहते हैं। भारतीय मनीषा ने संवत्सर में भी टाईम एंड स्पेस को अत्यधिक महत्व दिया है, जहां काल उपास्य है।
भारतीय पञ्चाङ्ग चन्द्रसौर अर्थात चंद्रमा व सूर्य की प्रकृति के होते हैं। सभी हिन्दू पञ्चाङ्ग, कालगणना के एक समान सिद्धांतों और विधियों पर आधारित होते हैं। वर्ष का आरम्भ (वर्ष प्रतिपदा) और मास के नाम आदि की दृष्टि से कुछ भिन्न होते हैं। विक्रमी पञ्चाङ्ग भारत में प्रयुक्त होने वाला प्रमुख पञ्चाङ्ग है। यह सर्वाधिक प्रसिद्ध पञ्चाङ्ग है जो भारत के उत्तरी, पश्चिमी और मध्य भाग में प्रचलित है। इसके अतिरिक्त दक्षिण भारत में तमिल पंञ्चाङ्ग प्रचलित है। बंगाल तथा कुछ अन्य पूर्वी भागों में बंगाली पञ्चाङ्ग प्रचलित है। केरल में मलयालम पञ्चाङ्ग प्रचलित है, जो एक सौर पंचाग है। हिन्दू पञ्चाङ्ग का उपयोग भारतीय उप महाद्वीप में प्राचीन काल से होता आ रहा है। यह आज भी भारत ही नहीं बल्कि नेपाल, कम्बोडिया, लाओस, थाइलैंड, म्यांमार, श्रीलंका आदि में भी प्रयुक्त होता है।
नए विक्रम संवत 2080 का प्रारंभ दिनांक 21 मार्च 2023 को अमावस्या के दिन मंगलवार की रात्रि 10:53 बजे वृश्चिक लग्न में हुआ है। किन्तु सूर्योदय से तिथि (दिवस) उदय माना जाता है। तो 22 मार्च को बुधवार होने के कारण, इस वर्ष के राजा बुध होंगे, और इस वर्ष के मंत्री शुक्र हैं। इस वर्ष विक्रम संवत 2080 का नाम 'पिंगल' है। यह 60 संवत्सरों में 51वाँ है। इस सम्वतसर के आने पर विश्व में कहीं उत्तम तो कहीं मध्यम वर्षा होती है। इस संवत्सर का स्वामी इन्द्र को माना गया है।
यह भी पढ़ेंः Hindu Nav Varsh 2023: नवसंवत का ज्योतिषीय आकलन, बना चतुर्ग्रही और गजकेसरी योग
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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