Healthcare in India: भगवान भरोसे स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल
स्वास्थ्य सुविधाओं के तमाम शोर और सरकारी जोर के बाद भी भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं का बुरा हाल है। खासकर ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में कोई उल्लेखनीय सुधार दिखाई नहीं देता।

Healthcare in India: वैश्विक ताकत के रूप में स्थापित होने की महत्वाकांक्षा और कोशिशों के साथ अपने देश ने सबका साथ सबका विकास और सबको स्वास्थ्य का नारा गढ़ा है। प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत 10 करोड़ परिवारों को, आयुष्मान कार्ड के मार्फत 50 करोड़ लोगों को 5 लाख रुपए तक का मुफ्त इलाज के लिए देश के 28,433 अस्पतालों को जोड़ा गया है। इससे सरकार की जनपक्षधरता झलकती है। लेकिन सरकारी अस्पतालों की जर्जर स्थिति और निजी अस्पतालों की निष्क्रियता के चलते अब तक के हाल उसकी प्राथमिकता पर पर्याप्त सवाल उठाते हैं।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक योजना में सूचीबद्ध एक चौथाई अस्पतालों में अब तक एक भी मरीज को दाखिल नहीं किया जाना स्वास्थ्य प्रतिबद्धता की कलई खोलता है। सच्चाई यह है कि हम अपनी आबादी के मुताबिक न तो चिकित्सक जुटा पाए हैं और ना ही अस्पताल। बड़े शहरों में तो जैसे तैसे अस्पताल और चिकित्सक का संतुलन सधता रहा है परन्तु ग्रामीण क्षेत्र की सेहत या तो भगवान भरोसे है या झोलाछाप डॉक्टर के हवाले।
भारतीय गणतंत्र की स्थापना के सात दशकों में से लगभग तीन दशक उदारीकरण और निजीकरण के नाम पर बीते हैं। इसलिए भी स्वास्थ्य क्षेत्र की समीक्षा की जानी चाहिए। आजादी के बाद देश के स्वास्थ्य विकास के लिए सरकार ने "भोर समिति" की सिफारिशों का सहारा लिया। समिति के सदस्य चूंकि आधुनिक चिकित्सा एलोपैथी के थे, इसलिए समिति में एलोपैथी को ही राजकीय मान्यता प्रदान की। जाहिर है कि औपचारिक रूप से एलोपैथी को श्रेष्ठ माना गया जबकि होम्योपैथी, आयुर्वेद, सिद्धा और यूनानी जैसी चिकित्सा पद्धतियां ज्यादातर अपने विशिष्ट गुणों के कारण ही टिकी रही।
भोर समिति ने स्वास्थ्य सेवा के विकास के लिए श्रेणीबद्ध प्रणाली के गठन का सुझाव दिया। सुझाव के अनुसार प्रत्येक 20,000 की आबादी पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना की बात थी। समिति ने स्पष्ट कहा था कि स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकांश लाभ ग्रामीणों को मिलना चाहिए। लेकिन विडंबना है कि सन 1952 में ही जो भारतीय स्वास्थ्य सेवा की तस्वीर उभरी उसमें 81% सुविधाएं शहरों में स्थापित हुई।
फिर 1959 में डॉक्टर एएल मुदलियार की अध्यक्षता में एक दूसरी समिति तब तक की स्वास्थ सेवा की परिस्थितियों की समीक्षा के लिए बनी। इस समिति ने पाया कि डॉक्टर ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने के इच्छुक नहीं है, तब मुदलियार समिति ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के बजाय जिला अस्पतालों को मजबूत करने का सुझाव दिया। इस दौर में भारतीय दवा उद्योग एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभर रहा था। देश में छोटे-बड़े कोई 2600 दवा उत्पादक थे। इनमें से बड़ी पूंजी वाले 125 दवा उद्योगों को ही मुदलियर समिति ने मान्यता दी थी। इस समिति ने तेजी से बढ़ती जनसंख्या को भी देश के आर्थिक विकास में बाधा माना था।
70 का दशक शुरू होते होते सरकार की नीतियों के कारण असमानताएं घटने की बजाय दिन दूना बढ़ने लगी थी। सबको रोटी, कपड़ा, मकान और बेहतर जीवन की प्रत्याशा तो दूर अमीर और अधिक अमीर तथा गरीब और अधिक गरीब होने लगे थे। इसी दौर में डॉक्टर जेबी श्रीवास्तव की अध्यक्षता में एक और समिति बनाई गई। इस समिति ने सुझाव दिया कि ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ्य चिकित्सा सुविधाओं के लिए बड़ी संख्या में स्वास्थ्य कार्यकर्ता तैयार किए जाएं तथा परिवार नियोजन को विकास कार्यक्रमों का अंग बनाया जाए। इसके लिए भारत ने विदेशी बैंकों से कर्ज लेना शुरू किया और धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय बैंकों के कर्ज जाल में फंसता ही चला गया।
वर्ष 1991 से तो भारत सरकार ने खुले रूप से अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व बैंक की आर्थिक नीतियों को ही लागू करना आरंभ कर दिया। इसका देश के आम लोगों के जीवन पर गहरा असर दिखने लगा। स्वास्थ्य और शिक्षा पर सरकारी खर्च में कटौती तथा स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के परिणाम स्वरूप बीमारी से जूझते आम लोगों की तादाद बढ़ने लगी। दवा कंपनियों ने दवाओं पर कीमतों का नियंत्रण समाप्त करने का दबाव बनाया और दवाएं महंगी हो गई। इसका सबसे दुखद पहलू था, जीवन रक्षक दवाओं का बेहद महंगा हो जाना। डंकल प्रस्ताव पर भारत के हस्ताक्षर के बाद नई नीतियों की आड़ में गेट के पेटेंट प्रावधानों का दखल शुरु हो चुका था।
एक ताजा अध्ययन में कहा गया है कि भारत में आम लोगों को अपने स्वास्थ्य और उपचार के नाम पर सालाना 3 लाख करोड़ रूपया खर्च करना पड़ता है। इनमें से 40% लोग ऐसे होते हैं जो अपनी जमीन, जेवरात, संपत्ति बेचकर उपचार कराते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि बड़ी तादाद में हर साल लोग गरीबी रेखा के नीचे धकेल दिए जाते हैं। यह अध्ययन कहता है कि यदि सरकार स्वास्थ्य का बजट बढ़ा दे तो अधिकांश लोगों को पर्याप्त स्वास्थ्य उपचार मिल सकता है।
आजादी से पहले अंग्रेजों द्वारा 1911 में बनाया गया पेटेंट कानून लागू था। इसकी वजह से भारतीय दवा उद्योग पर पूरी तरह से बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा था। उस समय देश जीवन रक्षक दवाइयों के लिए भी विदेशी कंपनियों पर निर्भर था। आजादी के बाद कई समितियों, विशेषज्ञ समूहों के गठन और अध्ययन के बाद 1970 में भारतीय पेटेंट कानून बना। इसका परिणाम यह हुआ कि 70 से 80 के दशक में भारत ने न सिर्फ दवाओं के उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल की बल्कि निर्यात के क्षेत्र में भी हमारे दवा उद्योग के कदम तेजी से बढ़े।
इस देशी कानून का इतना असर हुआ कि दवा उत्पादन की 5000 लघु और मध्यम और बड़ी दवा कंपनियां 24000 हो गई और दवा उत्पादन में 50 गुना तक वृद्धि हुई। 1971 से 1998 तक दवा निर्यात में 18 फ़ीसदी की वृद्धि हुई। इस दौर में भारत सबसे बड़ा दवा उत्पादक देश था। लेकिन विश्व व्यापार संगठन के प्रावधानों के लागू होने के बाद दवा बाजार पूरी तरह से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खोल दिया गया। भारत में मुक्त व्यापार व्यवस्था का लाभ उठाकर विदेशी कंपनियों ने तीसरी दुनिया के देशों में असुरक्षित और पुरानी दवाओं तथा संक्रमित खाद्य पदार्थों का अंबार लगा दिया है।
देश की 60% से अधिक आबादी आज भी गांव में रहती है फिर भी वहां उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाएं शहरों के मुकाबले 15% भी उपलब्ध नहीं है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक देश में 2000 लोगों पर एक चिकित्सक और प्रति 6 हजार लोगों पर एक सहायक नर्स उपलब्ध होने चाहिए। लेकिन 70 से 80% चिकित्सक और 90% नर्से शहरी क्षेत्रों में काम कर रही है। इससे समझा जा सकता है कि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत क्या है।
ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर सुविधाओं का अभाव एक अहम मुद्दा है, लेकिन यह भी सच है कि चकाचौंध के इस दौर में कोई चिकित्सक, अधिकारी या सरकारी बाबू गांव में रहना नहीं चाहता। आज भी गांव में वहां के लोगों के स्वास्थ्य की पहरेदारी वे तथाकथित चिकित्सक ही करते हैं जिन्हें डॉक्टरों की भाषा में झोलाछाप कहा जाता है।
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