Health AI: सेहत की समस्याओं का समाधान या खतरा-ए-जान?

एआई का दायरा और उसके चाहने वाले लगातार बढ़ रहे हैं। बाकी सारी चीजें तो ठीक हैं, लेकिन लोगों का अपनी सेहत और जान को दांव पर लगाकर एआई से सलाह लेना और उनका पालन करना हैरान कर देने वाली बात है।

खासकर डॉक्‍टरों का निदान और उपचार ढूंढने के लिए एआई की शरण में जाना तो और भी आश्‍चर्यजनक है। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने एक चेतावनी जारी की है कि जनस्‍वास्‍थ्‍य के संरक्षण के लिए एआई रचित लैंग्‍वेज लर्निंग मॉडलों के उपयोग में सावधानी बरती जानी चाहिए।

Health AI A solution to health problems or a threat to life?

अमेरिका की एरिजोना यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्‍थ साइंस के एक अध्‍ययन में खुलासा हुआ है कि वास्‍तविक डॉक्‍टरों की तुलना में एआई से परामर्श लेने वालों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। पीएलओएस डिजीटल हेल्‍थ जर्नल में प्रकाशित अध्‍ययन डाइवर्स पेशेंट्स एटिट्यूड्स टुवार्ड्स आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इन डायग्‍नोसिस' में करीब आधे, 47% लोगों ने बताया कि स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी समस्‍या होने पर सलाह के लिए डॉक्‍टर की बजाए एआई की मदद लेना ज्‍यादा पसंद करेंगे। इनमें से कई लोग ऐसे हैं, जो पहले एआई पर भरोसा करने के पक्ष में नहीं थे। लेकिन, एक बार उससे चैट करने के बाद अब उसकी बात मानने को तैयार हैं। डॉक्‍टरों के पक्ष में वोट देने वाले 52% प्रतिभागियों में से भी काफी का मानना है कि अगर परामर्शदाता एआई प्रोग्राम को कोई मानव संचालित कर रहा है तो उन्‍हें उसकी सलाह पर चलने में गुरेज नहीं है।

डॉक्‍टर और मरीज, दोनों ही एआई के मुरीद

मरीज तो मरीज, डॉक्‍टर तक भी एआई से सलाह लेना पसंद करने लगे हैं। अमेरिका के ही नॉर्थ कैरोलिना यूनिवर्सिटी में मेडिसिन के एक एसोसिएट प्रोफेसर ने कुछ बेहद सीरियस मरीजों की मेडिकल हिस्‍ट्री चैट जीपीटी से साझा की। उसने कुछ सेकेंड में बता दिया कि उन मरीजों का ट्रीटमेंट कैसे किया जाना चाहिए। इस साल की शुरुआत में लंदन से एक खबर आई थी कि वहॉं पारंपरिक हार्ट सर्जन बेरोजगार हो रहे हैं और केवल उन्‍हीं सर्जनों के पास काम है, जिन्‍होंने इंटरवेंशल कार्डियोलॉजी यानि एआई के जरिए होने वाले ऑपरेशन में एक्‍सपर्टाइज हासिल कर ली है। पहले हार्ट के ऑपरेशन के लिए डॉक्‍टर को पूरी टीम की जरूरत होती थी, लेकिन अब वे एआई की मदद से अकेले ही ऑपरेशन कर रहे हैं। ऐसी ही खबरें अमेरिका से भी आई थीं कि वहॉं हार्ट सर्जनों के पास काम कम हो गया है।

मैसाचुशेट्स जनरल हॉस्पिटल में भी इस बारे में एक स्‍टडी हुई थी। इसमें रिसर्चरों ने कोलोनोस्‍कॉपी के बारे में हॉस्पिटल की वेबसाइट के एफएक्‍यू (बार-बार पूछने वाले प्रश्‍न) से आठ सबसे आम प्रश्‍न लिए और चैटजीपीटी से उनके उत्‍तर पूछे। उन्‍होंने पाया कि रोगियों की जिज्ञासाओं का समाधान करने के लिहाज से चैटजीपीटी द्वारा दिए गए जवाब, हॉस्पिटल वेबसाइट पर दिए गए समाधानों से ज्‍यादा स्‍पष्‍ट थे और गुणवत्‍ता के मामले में भी कम नहीं थे। यूनिविर्सटी ऑफ मैरीलैंड स्‍कूल ऑफ मेडिसिन ने भी अपनी एक अलग स्‍टडी में यही पाया कि एआई द्वारा रोगियों को दिए गए जवाबों में 88% एक्यूरेसी थी ।

हालांकि शोधकर्ताओं का मानना है कि चिकित्‍सा के क्षेत्र में एआई के इस इस्‍तेमाल के प्रभावों को लेकर अभी कोई निष्‍कर्ष निकालना जल्‍दबाजी ही होगी। लेकिन, इस बात से वे इंकार नहीं करते कि कम से कम रोगियों को, उनके हित-अहित के बारे में शिक्षित करने में एआई महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

हो रहा है एआई का दुरुपयोग

डॉक्‍टरों के बारे में मजाक में कहा जाता है कि वे कभी परफेक्‍ट नहीं होते, क्‍योंकि वे हमेशा प्रैक्टिस ही करते रहते हैं। लेकिन, एआई के जवाब शुरू से ही परफेक्‍ट नजर आते हैं। पूछने पर चैट जीपीटी आपके स्वास्थ्य संबंधी सवालों का जवाब तो देता है लेकिन आगाह भी करता है कि उसके सुझाव बहुत आम हैं और एक प्रोफेशनल मेडिकल कन्‍सल्‍टेशन का विकल्‍प नहीं बन सकते।

इस संदर्भ में, यूके की ऑक्‍सफोर्ड युनिवर्सिटी में टेक्‍नोलॉजी और रेगुलेशन की प्रोफेसर सांद्रा वाचर का कहना है कि बहुत सारे हॉस्पिटल और मेडिकल प्रैक्‍टिसनर, डायग्नोसिस में मदद या ट्रीटमेंट तैयार करने में एआई का इस्‍तेमाल कर रहे हैं। लेकिन, एआई को अपनाने का सही परिमाण क्‍या है, यह अभी स्‍पष्‍ट नहीं है। हर टेक्‍नोलॉजी की तरह इसमें भी दोष हो सकते हैं। किसी एल्‍गोरिद्म को यह सीखने के लिए मेडिकल स्‍कूल नहीं भेजा जाता कि मानव शरीर और बीमारियों का क्‍या स्‍वरूप होता है। इस वजह से एआई समझ नहीं सकता, सिर्फ प्रीडिक्‍ट कर सकता है। प्रोफेसर वाचर का सुझाव है कि हमें सारे फैसले एआई पर नहीं छोड़ देने चाहिए।

एआई की नीयत साफ हो सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि इसकी प्रोग्रामिंग करने वालों की नीयत भी हर बार साफ ही हो। पिछले ही हफ्ते, डिजिटल जॉंच की ट्रेनिंग देने वाली कंपनी शेडो-ड्रेगन ने एक रिपोर्ट जारी की है। इसमें बताया गया है कि इंस्‍टाग्राम, अमेजन जैसे प्‍लेटफॉर्मों पर हेल्‍थ-ब्‍यूटी प्रॉडक्‍ट्स के ऐसे रिव्‍यूज की भरमार है, जिन्‍हें आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की सहायता से लिखा गया है। इनमें चैटजीपीटी पहले तो प्रॉडक्‍ट के फीचर्स के बारे में बताता है और बाद में उनके इस्‍तेमाल की सिफारिश भी करता है।

हेल्‍थ एआई की मार्केट वैल्‍यू

जिन क्षेत्रों में बाजार के हित ज्‍यादा हावी हो जाते हैं वहॉं कोई तर्क या चेतावनी काम नहीं करती। हेल्‍थकेयर ऑर्गेनाइजेशन आए दिन नए-नए एआई टूल्‍स डेवलप कर रही हैं। जिनमें, सिर्फ उनके फायदों की बात की जाती है, उनकी सीमाओं की नहीं। क्‍या आपने कभी किसी स्‍मार्ट फिटनेस वाच पर यह लाइन लिखी देखी है कि उसके कैलकुलेशन पर पूरी तरह भरोसा करने से पहले एक बार डॉक्‍टर से परामर्श कर लें? कैसे देखेंगे, क्‍योंकि ऐसी बातों से धंधे पर असर पड़ता है। और धंधा कोई दस-बीस करोड़ का नहीं, बल्कि अरबों का है। अलाइड मार्केट रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि वर्तमान में, हेल्‍थकेयर सेक्‍टर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मार्केट वैल्‍यू, जो 2020 में करीब 8.23 अरब डॉलर थी, 38.1% एनुअल ग्रोथ रेट (2021 से 2023 के बीच की सालान वृद्धि दर) के साथ, 2023 में यह वैल्‍यू बढ़कर 194.4 अरब डॉलर हो जाएगी।

दूसरे तमाम क्षेत्रों की तरह, स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र में एआई की अपार क्षमताएं हो सकती हैं, लेकिन इसमें खतरे भी कम नहीं हैं। एआई में सुनी-सुनाई बातों पर यकीन करने की प्रवृत्ति पाई जाती है। उसमें गलत सूचनाएं फीड की जा सकती हैं। उदाहरण के लिए, घरेलू उपायों से उपचार संबंधित पिछले कुछ सालों की खबरें देखिए, आप पाएंगे कि कैसे एक लॉबी द्वारा हल्‍दी, काजल, गिलोय जैसे पारंपरिक रोग निवारकों को स्‍वास्‍थ्‍य के लिए घातक बताने वाली जानकारियों को स्‍थापित किया गया है। पहले यह काम मीडिया को हथियार बनाकर किया जा रहा था, जो कठिन भी होता है और खर्चीला भी। आज एआई ने इस तरह के दुष्‍प्रचारों को सस्‍ता और सुलभ बना दिया है। जिनका फायदा कोई भी उठा सकता है। और नुकसान जिसका होगा, वह है सिर्फ पीडि़त।

इसलिए एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) को एमआई (मेडिकल इंटेलिजेंस) का रूप देने में जल्‍दबाजी नहीं करनी चाहिए। खासकर, उन डॉक्‍टरों और मरीजों को जो अपना समय और मेहनत या पैसा बचाने के लिए एआई को रोगी की हिस्‍ट्री और सिम्‍पटम बताकर उससे निदान पूछते हैं और फिर उसके अनुसार उनका उपचार करते हैं। आभासी दुनिया में ज्ञान सिर्फ ज्ञान नहीं होता, वह खतरा-ए-जान भी हो सकता है। इसमें सूचनाओं और जानकारियों को लेकर किसी प्रकार की कोई जवाबदेही की अनुपस्थिति इसे असुरक्षि‍त भी बनाती है और अविश्‍वसनीय भी। इसके बावजूद अगर आप इस पर निर्भरता बढ़ाते जा रहे हैं तो इसके नतीजे भी आप ही को भुगतने होंगे।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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