Congress: चुनाव से पहले ही पराजयवादी मानसिकता की शिकार हो गयी कांग्रेस?
Congress: देश के दो प्रमुख राष्ट्रीय दलों भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के चुनाव लड़ने के तौर तरीकों में जमीन आसमान का फर्क हो गया है।
2014 और 2019 की तरह ही 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारियों में भी यह फर्क साफ दिख रहा है।

2019 के लोकसभा चुनाव में 303 सीटों के प्रचंड बहुमत से सत्ता में लगातार दूसरी बार काबिज हुए मोदी 2024 में 400 सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। मोदी लोकप्रियता के जिस शिखर पर लगातार बने हुए है और विपक्षी गठबंधन जिस तरह से तार तार हो चुका है ऐसे में 400 सीटों का आंकड़ा असंभव जरूर लगे लेकिन 350 सीटों पर भाजपा का पहुंचना संभव लग रहा है।
2014 में 42 और 2019 में 52 सीटों पर सिमटी कांग्रेस ने पिछले पांच साल में ऐसा कुछ नहीं किया कि जिससे यह कहा जा सके कि कांग्रेस मोदी को बहुमत से दूर रखने मे कामयाब रहेगी और खुद भी दहाई के आंकड़े को पार कर पायेगी।
अभी भी मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की हार का घाव ताजा है। मोदी को चुनौती देने के लिए बना विपक्ष का इंडिया गठबंधन अंतिम सांसे ले रहा है। दशक भर से देश भर में पिटी हारी कांग्रेस 60 दिन के भीतर होने वाले आम चुनाव में आत्मसंतुष्ट भाव या पराजयवादी मानसिकता के साथ उतरती दिख रही है।
जब राहुल गांधी को इंडिया गठबंधन को मजबूत करने और सीट शेअरिंग को अंतिम रूप देने के लिए दिल्ली में रूकना था वह अपनी न्याय यात्रा पर निकल गए। इंडिया गठबंधन की इस दुर्दशा के लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार है।
नीतीश को संयोजक नहीं बनाया, वह निकल गए। ममता को लगा कि कांग्रेस बंगाल में उनसे ज्यादा तवज्जो वामदलों को दे रही है तो ममता ने भी अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। यूपी में कांग्रेस मायावती को साथ लेने के लिए मना नहीं सकी और मायावती ने इंडिया गठबंधन से दूरी बना ली। मायावती के अलग लड़ने के निर्णय ने सबसे ज्यादा सांसद देने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में भाजपा की राह आसान कर दी है।
नीतीश कुमार ने कांग्रेस के नेतृत्व में जिस विपक्षी एकता का ताना बाना 23 जून 2022 को पटना में बुना था, कांग्रेस की उदासी और लापरवाही के चलते खुद नीतीश कुमार ने बिहार में भाजपा के साथ सरकार बना कर उस इंडिया गठबंधन को तार-तार कर दिया जिसके शिल्पकार वह खुद थे। ऐसे में कांग्रेस की बैसाखी के सहारे खड़े होने वाले उसके सहयोगी दल अब कांग्रेस को एक एसेट की बजाय एक लाइबिलिटी के रूप में देख रहे है।
राजनीति में जोश और रफ्तार की अहमियत से इंकार नहीं किया जा सकता और भाजपा मोदी के नेतृत्व में जोश और रफ्तार से 2024 के चुनाव में जीत की रणनीति बनाने और उसे अमलीजामा पहनाने में जुट गई है। मोदी के लिए लगातार तीसरा कार्यकाल पहले से ज्यादा आसान और संभव दिख रहा है जो नेहरू के बाद भारत में किसी को नहीं मिला।
भाजपा ने जोश और खुशी से लबालब असर पैदा करने और तमाम पुर्जो को जोड़कर विशाल शक्ति पैदा करने के लिए बहुत छोटे-छोटे ब्यौरों को साधने और संजोने में महारत हासिल कर ली है। वहीं कांग्रेस 2019 की तरह चुनाव की पूर्व संध्या पर उदास और लटका चेहरा लिए दिख रही है। कांग्रेस न खुद मोदी को चुनौती देने के लिए अपने दम पर खड़ी हो सकी और न ही गठबंधन को एक रख सकी।
प्रधानमंत्री मोदी की विकसित भारत यात्रा की गाड़ी देश के सफर में निकल चुकी है और मोदी खुद लोगों से संवाद कर रहे हैं। भाजपा का विशाल संगठन मोदी की विकसित भारत की यात्रा को जमीनी स्तर पर उतारने के लिए दिन रात एक कर रहा है, वहीं राहुल की दूसरी भारत जोड़ो यात्रा न किसी तरह का उत्साह कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में जगा रही है और न जनता में उनके नेतृत्व को लेकर कोई उम्मीद की किरण नजर आ रही है। अब कांग्रेस के समर्थक भी इस ग्रैंड ओल्ड पार्टी के भविष्य को लेकर चिंतित है।
जिस तरह कांग्रेस खराब तैयारी के साथ लड़खड़ाती हुई चुनावी राजनीति मे उतरती है और गुटीय झगड़ों को काबू में नहीं रख पाती और सबसे अहम यह कि वह जनता की नब्ज नहीें पकड़ पाती, उससे उसका अपना कैडर ही बुझा हुआ है।
राहुल गांधी की न्याय यात्रा ने कांग्रेस की सांगठनिक कमजोरी को भी सामने ला दिया है। राहुल की न्याय यात्रा से मिली गतिशीलता को कायम रखने के लिए कांग्रेस के पास ऐसा संगठन ही नहीं बचा है कि वह उसे चुनाव के लिए तैयार मशीन बना सके और भाजपा को चुनौती दे सके।
ऐसे में मोदी जब राम के रथ पर सवार होकर चुनाव प्रचार अभियान में निकलेंगे तो विपक्ष के लिए मोदी को रोकना लगभग असंभव होगा। मोदी के काम के साथ राम का नाम भी चुनाव प्रचार में एक प्रमुख अस्त्र बनने वाला है।
लेकिन कांग्रेस अभी तक इस बात को ही नहीं समझ सकी है कि मोदी और शाह ने राष्ट्रीय स्तर के चुनावी मुकाबलों को संस्कृति (धर्म), पहचान (राष्ट्रवाद), सुरक्षा और विकास के साथ साथ मोदी की चार जातियों महिला, युवा, किसान और गरीब पर केन्द्रित कर दिया है। इनमें से हरेक मुद्दे पर कांग्रेस अचेत नजर आती है।
कांग्रेस यह समझने में पूरी तरह नाकाम रही कि किसी लोकप्रिय नेता और ताकतवर सरकार को सिर्फ उसके खिलाफ केवल प्रतिक्रियाएं करके और बिना कोई वैकल्पिक नजरिया पेश किए हराया नहीं जा सकता। कांग्रेस को समझ में नहीं आ रहा है कि वह धर्मनिरपेक्षता को किस तरह परिभाषित करेे।
कांग्रेस जिस विचारधारा की राजनीति की बात कर रही है क्या वह विचारधारा आज की चुनावी परिस्थिति के अनुकूल है? कांग्रेस की इसी दुविधा और भ्रम ने उसे 1984 में 414 सीटों से 2014 में 44 सीटों के ऐतिहासिक रसातल पर पहुंचा दिया था। अभी भी वह मात्र 52 सीटों के साथ लोकसभा में उपस्थित है।
कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के पास बहुत समय नहीं बचा है। मोदी को कैसे रोकना है इस पर विचार करने की बजाय विपक्षी दलों का गठबंधन एक दूसरे को अपने राज्य में आने से रोकने की तिकड़म भिड़ाने में लगा हुआ है। ऐसे में मोदी की राह विपक्ष खुद आसान कर रहा है।
मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी का 50 प्रतिशत वोट और 400 सीटों का लक्ष्य भाजपा की ताकत से ज्यादा विपक्ष की कमजोरी पर निर्भर है। विपक्ष खुद मोदी को उस लक्ष्य की और ले जाने मे मदद कर रहा है जो भारतीय राजनीति में अभी तक किसी को नहीं मिला।
ऐसे में कांग्रेस सहित विपक्ष के सामने सवाल सिर्फ यह रह गया है कि वह भाजपा को 303 पर रोक पाती है या भाजपा राजीव गांधी के 414 के आंकड़े को भी पार कर जाएगी? संसद में खड़े होकर मल्लिकार्जुन खरगे ने भले ही व्यंग में मोदी के 400 पार वाले जुमले का जिक्र किया हो लेकिन इतना तो तय है कि चार सौ पार के नारे का तोड़ उनके पास भी नहीं है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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