Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

क्या पेगासस का भंडाफोड़ कर एमनेस्टी ने भारत सरकार से लिया है बदला?

नई दिल्ली, जुलाई 24: क्या ब्रिटेन का बहुराष्ट्रीय एनजीओ 'एमनेस्टी इंटरनेशनल’ एक जासूसी संस्था है ? यह सवाल आज से 39 साल पहले एक चर्चित पत्रकार ने भारत की सबसे प्रतिष्ठित राजनीतिक पत्रिका में एक आलेख के जरिये पूछा था। तब न भाजपा की कोई अहमियत थी और न ही 'देशभक्त’ और 'देशविरोधी’ जैसे जुमले फैशन में आये थे। कांग्रेस की सरकार थी और इंदिरा गांधी ने दमदार तरीके से सत्ता में वापसी की थी। अगर उस जमाने में कोई एमनेस्टी इंटरनेशनल के खुफिया एंजेडे पर सवाल उठाता है तो इस सवाल पर आज के संदर्भ में भी गौर करना लजिमी है। एमनेस्टी इंटरनेशनल क दावा है कि वह दुनिया भर में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए सक्रिय है। लेकिन मानव अधिकार के लिए लड़ने वाली संस्था अचानक एक जासूसी अभियान में कैसे शामिल हो गयी ? उसने अपनी टेक्निकल लेबेरेट्री में स्पाईवेयर पेगासस द्वरा हैक किये नम्बरों को कैसे एक्सेस कर लिया ? पिछले साल भारत सरकार ने विदेशी चंदा मामले में गड़बड़ी करने पर एमनेस्टी इंडिया की नकेल कसी थी। तो क्या पेगासस उसका काउंटर अटैक है ?

 Has Amnesty taken revenge on the Indian government by busting Pegasus

दिनमान में छपे आलेख की अहमियत

आलोक मेहता नवभारत टाइम्स पटना के स्थानीय सम्पादक थे। फिर वे हिन्दुस्तान, दिल्ली के कार्यकारी सम्पादक रहे। वे दैनिक भास्कर के समूह सम्पादक भी रहे। 1982 में आलोक मेहता ने भारत की प्रतिष्ठित पत्रिका दिनमान में एक आलेख लिखा था जिसका शीर्षक था- क्या एमनेस्टी इंटरनेशनल गुप्तचर संस्था है ? तब दिनमान को सबसे निष्पक्ष और गंभीर पत्रिका का दर्जा हासिल था। जैसे अंग्रेजी में यूपीएससी की तैयारी करने वाले छात्र 'द हिंदू' अखबार पढ़ते थे उसी तरह हिंदी में प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्र दिनमान पढ़ा करते थे। रघुवीर सहाय और अज्ञेय जैसे प्रकांड विद्वान दिनमान के सम्पादक हुए। तब दिनमान में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विषय पर छपने वाले आलेख उच्च कोटि के हुआ करते थे। यहां इन सब बातों का जिक्र इसलिए जरूरी है कि क्यों कि दिनमान का प्रकाशन बहुत पहले बंद हो चुका है और आज की युवा पीढ़ी इसकी प्रतिष्ठा और ताकत से अंजान है। यह जिक्र इसलिए भी जरूरी है ताकि इस आलेख की निष्पक्षता पर किसी को कोई शक-सुबहा न हो।

Recommended Video

    Pegasus Sypware Case: France के राष्ट्रपति, Pakistan के PM Imran Khan का भी नाम! | वनइंडिया हिंदी

    एमनेस्टी इंटरनेशनल पर 39 साल पहले भी सवाल

    आलोक मेहता ने 1982 के इस आलेख में लिखा था कि कैसे भारत और तत्कालीन सोवियत संघ की सरकार ने एमनेस्टी इंटरनेशनल की गतिविधियों और फंडिंग पर गंभीर आरोप लगाये थे। आज से 39 साल पहले एमनेस्टी इंटरनेशनल पर आरोप लगा था कि वह साम्राज्यवादी देशों की जासूसी संस्थाओं का एक हिस्सा है। कई बार विदेशी जासूस अंडर कवर एजेंट के रूप में स्वयंसेवी संस्थाओं में काम करते हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल पर यह भी आरोप था कि वह ब्रिटिश जासूसी संस्था एमआइ6 के लिए भी काम करती है। एमनेस्टी भारत के घरेलू मामले में बहुत पहले से हस्तक्षेप कर रहा है। मानवाधिकार के नाम पर वह कभी कश्मीर, कभी दिल्ली दंगे तो कभी सीएए विरोध आंदोलन का मुद्दा उठाता रहा है। लेकिन उसने कभी पाकिस्तान में गैरहिंदुओं पर रहे अत्याचार और जेल में बंद राजनीतिक कैदियों पर जुल्म का मामला नहीं उठाया। इतना ही नहीं जब उत्तरी आयरलैंड में मानवाधिकार की धज्जियां उड़ती हैं तो एमनेस्टी खामोश हो जाता है। 1972 में उत्तरी आयरलैंड के डेरी शहर में करीब 30 हजार लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। भीड़ अचानक बेकाबू हो गयी । तब ब्रिटिश सैनिकों ने उन पर गोलियां चला दीं जिसमें 13 आम लोग मारे गये थे। उत्तरी आयरलैंड में आज भी मनवाधिकार को घोर उल्लंघन हो रहा है लेकिन एमनेस्टी इन मुद्दों को तूल नहीं देता। यानी एमनेस्टी एक एजेंडा के तहत भारतीय मामलों में खास दिलचस्पी रखता है।

    मनमोहन सरकार भी हुई थी एमनेस्टी इंटरनेशनल से परेशान

    जब केन्द्र में यूपीए का शासन था तब भी एमनेस्टी को लेकर सरकार को परेशानी हुई थी। 2011 की बात है। तमिलनाडु के तिरुनेलवेल्ली जिले के कुडनकुलम में 1000 मेगावाट के परमाणु बिजली संयंत्र पर काम चल रहा था। अचानक इस संयंत्र को असुरक्षित बता कर इसके निर्माण का विरोध किया जाने लगा। इस पर राजनीति भी शुरू हो गयी। पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी परमाणु बिजली घर का विरोध करने लगे। दूसरी तरफ तत्कालीन राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने संयंत्र के निर्माणस्थल का दौरा कर इसे सुरक्षित बताया। लेकिन उनकी बात को दरकिनार कर इस परमाणु बिजली घर के खिलाफ एक संगठित विरोध शुरू हो गया। इसमें ब्रिटेन के सांसद भी कूद पड़े। ब्रिटेन के कुछ सांसदों ने कुडनकुलन परमाणु बिजली घर के विरोध में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता को एक पत्र लिख दिया। उन्होंने इस संयंत्र को बंद करने की मांग की। चूंकि एमनेस्टी इंटरनेशनल का मुख्यालय लंदन में है इसलिए यह कहा जाने लगा कि विरोध की आग को वह भी हवा दे रहा है। उस समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी कहा भी था कि परमाणु बिजली घर के खिलाफ विरोध आंदोलन में विदेशी ताकतों का हाथ है। अब पेगासस मामले का भंडाफोड़ कर एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भारत सरकार के सामने एक नया संकट खड़ा कर दिया है।

    More From
    Prev
    Next
    Notifications
    Settings
    Clear Notifications
    Notifications
    Use the toggle to switch on notifications
    • Block for 8 hours
    • Block for 12 hours
    • Block for 24 hours
    • Don't block
    Gender
    Select your Gender
    • Male
    • Female
    • Others
    Age
    Select your Age Range
    • Under 18
    • 18 to 25
    • 26 to 35
    • 36 to 45
    • 45 to 55
    • 55+