Haldwani Violence: क्या सचमुच अवैध अतिक्रमण का विरोध ही है हल्द्वानी की हिंसा?

Haldwani Violence: सीएए के विरोध में पूर्वी दिल्ली के कुछ हिस्सों में 2020 में जिस प्रकार की हिंसा और उपद्रव किया गया था, हल्द्वानी की हिंसा ने उसकी याद ताजा कर दी है।

दिल्ली में एक समुदाय विशेष द्वारा बहुत सुनियोजित तरीके से पूर्वी दिल्ली को दंगे की आग में झोंक दिया गया था। उस समय जब पूरा देश शाहीनबाग में कुछ लोगों द्वारा आयोजित सीएए विरोधी प्रदर्शन पर नजर गड़ाये हुए था

Haldwani Violence

तब उन्हीं में से कुछ लोग बड़े दंगे की तैयारी कर रहे थे। चुपचाप उन्होंने इतनी बड़ी तैयारी कर रखी थी कि जब हिंसा की शुरुआत हुई तो चार दिनों तक पूर्वी दिल्ली का एक हिस्सा जलता रहा।

कुछ वैसा ही मामला हल्द्वानी की हिंसा में भी दिखाई दे रहा है। जिस व्यापक स्तर पर पुलिस और आम जनता के खिलाफ हिंसा का खेल खेला गया है यह अचानक से उग्र हुई भीड़ की हिंसा नहीं है। यह एक सुनियोजित दंगा है जिसके पीछे भरपूर तैयारी दिखाई देती है। दिल्ली दंगों की तर्ज पर ही यहां भी बंदूकों का इस्तेमाल हुआ है। बोतलों का इस्तेमाल पेट्रोल बम बनाने के लिए किया गया है। हिंसा करनेवाले समुदाय के लोगों ने पूरी तैयारी के साथ हल्द्वानी के बनभूलपुरा इलाके को तहस नहस करने का प्रयास किया है।

इस हिंसा में दो से छह लोगों के मरने की आशंका है और दर्जनों लोग घायल हुए हैं। घायल होनेवालों में पुलिस बल के लोग भी शामिल हैं। पुलिसवाले खुद वीडियो बनाकर, टीवी पर आकर उस बर्बर और भयानक हिंसा का वर्णन कर रहे हैं जिसमें उनकी जान जाते जाते बची है। बनभूलपुरा पुलिस थाने को पूरी तरह से फूंक दिया गया है। कुछ पुलिसकर्मी अपनी जान बचाने के लिए एक मकान में घुस गये तो दंगाइयों ने उस घर को भी आग लगाने की कोशिश की। उन पर पेट्रोल बम फेंका, पत्थर बरसाये। जब घर नहीं जला पाये तो घर में घुसकर उस मकान मालिक को ही बुरी तरह मारा पीटा जिसने उन पुलिसवालों को जीवन बचाने के लिए शरण दी थी।

इनमें शामिल एक महिला पुलिसकर्मी का कहना है कि "महिलाओं और पुरुषों की भीड़ छतों और सड़कों से लगातार पथराव कर रही थी। गलियों में जाम लगा दिया गया था ताकि हम बचकर न निकल पायें। बचने के लिए 15-20 पुलिसवाले जब एक घर के अंदर घुस गये तो भीड़ ने उस घर को ही आग लगाने की कोशिश शुरु कर दी। काफी देर बाद हमें वहां से निकालने के लिए फोर्स आयी। जब फोर्स हमें वहां से निकालकर ले जा रही थी तो छतों से फिर से पत्थरबाजी शुरु हो गयी। कांच की बोतलें भी फेंकी गयी जिससे कई पुलिसवाले घायल हो गये।"

स्वयं हल्द्वानी की डीएम वंदना सिंह का कहना है कि जिस प्रकार की हिंसा की गयी है वह बिना सुनियोजित तैयारी के नहीं हो सकती। वंदना सिंह ने मीडिया बात करते हुए स्पष्ट कहा कि यह अतिक्रमण विरोधी कोई ऐसी कार्रवाई नहीं थी जिसमें किसी समुदाय को जानबूझकर टार्गेट किया गया। हाईकोर्ट के आदेश के बाद सरकारी संपत्तियों को अतिक्रमण से मुक्त करने की कार्रवाई पहले से चल रही है। कुछ अतिक्रमण हटाये गये और जब यहां पहुंचे तो इस प्रकार की हिंसा की गयी। वंदना सिंह कहती हैं कि स्थानीय लोग इसे मलिक का बगीचा कहते हैं लेकिन सरकारी कागजों में यह सरकारी भूमि के रूप में दर्ज है।

असल में जिस मदरसे और उसमें बनी मस्जिद को हटाने के बाद हिंसा शुरु की गयी वह सरकारी जमीन पर बना अवैध अतिक्रमण ही था। इसके पीछे अब्दुल मलिक नामक एक व्यक्ति है जिसने यहां सरकारी जमीन पर अवैध तरीके से प्लाटिंग भी कर रखी है। प्रशासन जब उस अवैध अतिक्रमण को हटाने के लिए पहुंचा तो वहां तैयारी के साथ पुलिसवालों, नगर निगम कर्मचारियों पर हमला बोल दिया गया। हालात इतने बेकाबू हो गये कि गुरुवार की रात को ही उत्तराखण्ड सरकार ने केन्द्र से अतिरिक्त सुरक्षा बलों की मांग के साथ साथ दंगाइयों को देखते ही गोली मारने का आदेश भी जारी कर दिया था।

लेकिन जिस प्रकार की तैयारी के साथ पुलिसवालों और जन सामान्य पर यह हमला हुआ है क्या सचमुच यह सरकारी जमीन पर अवैध रूप से बने मदरसे का ही मामला लगता है? हिंसा की व्यावकता को देखते हुए इस पर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल है। किसी भी समुदाय द्वारा क्या कुछ घण्टों में हिंसा की इतनी तैयारी की जा सकती है कि पुलिसवालों को भी अपनी जान के लाले पड़ जाएं? यहां पर यह विचार भी आता है कि क्या कोई समुदाय सदैव हिंसा की तैयारी किये बैठा रहता है जो चंद घण्टों में ही ऐसी हिंसा कर बैठता है कि देखते ही गोली मारने का आदेश देना पड़े?

लेकिन इन दोनों ही सवालों से इतर एक तीसरा सवाल भी है क्या यह प्रदेश में लागू की गयी समान नागरिक संहिता पर एक समुदाय विशेष द्वारा दिया गया रिएक्शन है? याद करिए दिल्ली दंगों को। वहां भी कपिल मिश्रा के सिर्फ वहां जाने भर को मुद्दा बनाकर इतनी बड़ी हिंसा की गयी थी। उस समय भी घरों से ईंट पत्थर के अलावा पेट्रोल बम फेंके गये थे। कहा यही गया कि कपिल मिश्रा के भड़काने पर दंगा हुआ लेकिन असल मकसद बाद में पुलिस की जांच में सामने आया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा के बीच में ही दंगाई कुछ बड़ा करना चाहते थे ताकि संदेश दूर तक जाए। उन्होंने वही किया भी।

इसलिए ऐसे सुनियोजित दंगों या हिंसा को देखते समय सिर्फ वह नहीं देखा जाता जो सामने दिखाया जाता है। इसके पीछे एक लंबी तैयारी होती है। लोगों को सामूहिक रूप से तैयार करना होता है और धनबल भी खर्च होता है। इसलिए अब्दुल मलिक के बगीचे में किसी मदरसे पर अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई की प्रतिक्रिया में इतनी व्यापक हिंसा हुई इसे स्वीकार कर पाना कठिन है।

ऐसा लगता है कि इधर प्रदेश सरकार समान नागरिक संहिता को कैबिनेट में पास करके उसे विधानसभा में पास करने में व्यस्त थी और उधर दंगाई चुपचाप अपनी तरह से हिंसक जवाब देने की तैयारी कर रहे थे। अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई एक ट्रिगर प्वाइंट बन गया और दंगाइयों ने रातोंरात वह सब कर दिया जिसके लिए उनकी सामूहिक तैयारी थी। इस हिंसा में पुरुषों के अलावा मुस्लिम स्त्रियों का भी व्यापक स्तर पर शामिल होना संदेह पैदा करता है।

बहरहाल, अब राज्य प्रशासन द्वारा इसकी व्यापक जांच में ही सच्चाई सामने आयेगी कि इतनी व्यापक हिंसा का असल उद्देश्य क्या था। लेकिन साथ ही साथ राज्य सरकार को हल्द्वानी के साथ हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में भी चौकसी और छानबीन बढ़ानी होगी। कोई आश्चर्य नहीं कि कल किसी न किसी बहाने से ये दोनों जिले भी दंगों की चपेट में ला दिये जाएं।

आखिरकार उत्तराखंड की 90 फीसदी मुस्लिम जनसंख्या तो इन्हीं तीन जिलों में रहती है। खासकर हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में जहां मुस्लिम चरममपंथियों का जबर्दस्त प्रभाव है। अगर प्रदेश में शांति और व्यवस्था को बनाकर रखना है तो प्रदेश सरकार को अतिरिक्त सक्रियता दिखानी ही होगी, नहीं तो हिंसक उपद्रवी हावी होते जायेंगे।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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