क्यों जहर बनता जा रहा है ग्रामीण इलाकों का भूजल?

पीने वाले पानी के लिए जिस भूजल को स्वच्छ और सुरक्षित समझकर हम पेयजल के रूप में इस्तेमाल करते हैं, वह जहरीला होता जा रहा है। उसमें जहरीले रसायनिक तत्व और भारी धातु (हेवी मैटल) मिल रहे हैं, जिनसे कई तरह की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इसका खुलासा केन्द्र सरकार ने राज्यसभा में किया है। लेकिन सरकार ने इसके कारण और संभावित निदान की कोई चर्चा नहीं की। खतरनाक यह है कि भूजल का प्रदूषण शहरी इलाकों के बजाए ग्रामीण इलाके में अधिक पाया गया है।

groundwater of rural areas becoming poison

केन्द्र सरकार के आंकड़े चिंताजनक हैं। देश के सभी राज्यों के लगभग सभी जिलों के भूजल में जहरीले रसायनों की मात्रा सामान्य से अधिक पाई गई है। भूजल में मिलने वाले रसायनों में आर्सेनिक, फ्लोराइड व आयरन सबसे बड़े इलाके में पाए गए हैं। इनके बाद नाइट्रेट का प्रदूषण है। दूसरे जहरीले रसायन व भारी धातु भी पाए गए हैं।

भूजल में जहरीले रसायनों के मिलने के दो कारण समझ में आते हैं। धरती की सतह पर उपस्थित जहरीले पदार्थों का पानी के साथ रिसकर भूजल भंडार में मिल जाना और दूसरा कारण है कि जहरीले पदार्थ धरती की कोख में पहले से मौजूद हैं और किन्हीं कारणों से भूजल में मिल जाते हैं। इनमें भूजल का अत्यधिक दोहन और पुनर्भरण का न होना भी एक कारण है। खासकर आर्सेनिक दूषण का तो यही प्रमुख कारण है।

आर्सेनिक के यौगिक धरती की कोख में सदियों से पड़े हैं। वह जल में घुलनशील अवस्था में नहीं होता। पर जब भूजल निकल जाने पर जगह खाली होती है और वहां हवा भर जाती है तो हवा की आक्सीजन से मिलकर आर्सेनिक एक अन्य यौगिक में बदल जाता है जो पानी में घुलनशील होता है। इस तरह भूजल के साथ आर्सेनिक भी निकलने लगता है और इसका प्रभाव लोगों पर पड़ने लगता है। बिहार के बड़े इलाके में कैंसर रोग के फैलाव का प्रमुख कारण पानी में आर्सेनिक होना माना जाता है।

अगर स्वच्छ जल से भूजल का पुनर्भरण पर्याप्त मात्रा में होता रहे तो धरती की कोख में पड़े जहरीले तत्वों के यौगिक उसी अवस्था में पड़े रहेंगे। लेकिन पुनर्भरण नहीं होने और हवा भरने पर वहां की अवस्था बदलती है और रासायनिक यौगिक दूसरे यौगिकों में बदलने लगता है जिससे भूजल प्रदूषित होने लगता है। यही कारण है कि आर्सेनिक प्रदूषण वाले इलाकों में भी बड़ी संख्या में तालाब और कुएं खुदवाने की सलाह दी जाती है।

धरती की सतह पर औद्योगिक कचरे का पड़ा रहना या उन्हें बगैर उपचार नदी-नालों में बहा देने से भी भूजल का प्रदूषण होता है। उस कचरे में मौजूद रसायन रिस रिस कर भूजल को गंदा करते रहते हैं। एक कारण तो खेती के काम में होने वाली रसायनिक खादों का इस्तेमाल भी है। खेतों में जितना रसायन डाला जाता है, सबका उपभोग फसलों के द्वारा नहीं किया जाता। बचे रसायन रिस-रिसकर धरती की कोख में जाते रहते हैं। खासकर नाइट्रेट प्रदूषण का यही कारण माना जाता है। खेती में यूरिया (नाइट्रोजन) का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। वही रिसकर भूजल के प्रदूषण का कारण बनता है।

भूजल को प्रदूषित करने वाले इन सभी कारणों का निपटारा कुओं और तालाबों के माध्यम से बड़ी मात्रा में स्वच्छ वर्षाजल से भूजल के पुनर्भरण की व्यवस्था करना हो सकता है। वर्षा की बूंदें तालाब या कुएं की सतह पर गिरती हैं तो गुरुत्वाकर्षण बल के सहारे धरती के भीतर गहराई तक चली जाती हैं। बहरहाल, सरकार के आंकड़ों के अनुसार, देश के 25 राज्यों के 209 जिलों के भूजल में आर्सेनिक की मात्रा 0.01 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई गई है। पेयजल में आर्सेनिक की मात्रा अधिक होने से चर्मरोग खासकर आर्सेनिकोसिस व कैंसर होने का आशंका बढ़ जाती है।

29 राज्यों के 491 जिलों में भूजल में आयरन की मात्रा 1 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई गई है। आयरन की मात्रा आधिक होने पर स्नायु संबंधी रोग खासकर अलजाइमर व पार्किंसन होने की संभावना बढ़ जाती है।

11 राज्यों के 29 जिलों में भूजल में कैडियम की मात्रा 0.003 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई गई है। इससे किडनी के रोग होने की आशंका उत्पन्न हो जाती है।

16 राज्यों के 62 जिलों में भूजल में क्रोमियम की मात्रा 0.05 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई गई है। जिससे छोटी आंत में ट्यूमर होती है।

18 राज्य के 152 जिलों में भूजल में यूरेनियम की मात्रा 0.03 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई गई है। इससे किडनी के रोग और कैंसर होने की आशंका बढ़ जाती है।

सरकार ने इलाकेवार अध्ययन भी कराया है, इसके अनुसार 671 इलाके फ्लोराइड से पीड़ित हैं, 814 इलाके आर्सेनिक से पीड़ित हैं, 14,079 इलाके आयरन से पीड़ित हैं, 9930 इलाके पानी के खारेपन से पीड़ित हैं और 517 इलाके नाइट्रेट से पीडित हैं जबकि 111 इलाके भारी धातुओं से पीड़ित हैं।

भूजल प्रदूषण को लेकर गांवों में समस्या अधिक गंभीर है। वहां पानी को साफ करने का कोई साधन उपलब्ध नहीं होता। लोग आंख मूंदकर मोटे तौर पर पेयजल के रूप में भूजल का सीधे इस्तेमाल करते हैं। आंखे खुली रखें तब भी इन रसायनों को रंग, गंध या स्वाद से नहीं पहचाना जा सकता। कुछ इलाके में कुआं, तालाब और नदियों के पानी का इस्तेमाल भी होता है, पर पानी के परिशोधन की कोई व्यवस्था नहीं है।

परिशोधन की व्यवस्था हर घर, नल का जल की योजना में भी नहीं की गई है। गहरे नलकूप से पानी निकालकर पाइपों के सहारे घरों में भेजने की व्यवस्था है। अब अगर उस जगह का भूजल प्रदूषित है तो वहीं पानी घरों में जा रहा है। इतना ही नहीं, गहरे नलकूप से पानी निकालने के परिणामस्वरुप भूजल के प्रदूषित हो जाने की आशंका भी है।

स्वाभाविक है जिस भूजल को हम पीने के पानी के लिए सबसे सुरक्षित समझ रहे हैं वह जहर बन रहा है। भूजल की शुद्धता के लिए समाज के परंपरागत तरीकों की ओर लौटना होगा तभी जल भी सुरक्षित होगा और जीवन भी।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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