Freebies: मुफ्त की रेवड़ियां या कर्ज की बेड़ियां
जनकल्याण के नाम विभिन्न सरकारों की ओर से मुफ्त में वस्तुओं एवं सेवाओं का वितरण दोहरी मार करता है। एक ओर इससे राज्यों का वित्तीय संतुलन बिगड़ता है, वहीं जनता की आदत भी बिगड़ती जाती है।

सतत लाभ अर्जित करने के अर्थशास्त्र में दो स्थापित सिद्धांत है। पहला, खर्चे में कटौती का नाम ही आमदनी है, और दूसरा, बांटते रहने से लाभ बढ़ता जाता है। अर्थशास्त्र के इस दूसरे नियम पर चलते हुए यानी मुफ्त की रेवड़ी बांटकर सस्ती लोकप्रियता और अधिकाधिक वोट कमाने का धंधा राजनीति शास्त्र ने अख्तियार कर लिया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि मुफ्त लुटाने की योजना न तो टिकाऊ है और न ही व्यवहारिक, फिर भी इसकी जमीनी सच्चाई हाथी के दांत (खाने के और, दिखाने के और) की तरह है। वोट की खातिर "मुफ्त रेवड़ी संस्कृति" की गंगा में डुबकी लगाने के लिए सब तैयार बैठे हैं। कोई किसी से उन्नीस नहीं है, सब बीस बनकर बाजी मार लेना चाहते हैं।
यह चलन पिछले एक-दो दशकों में खूब बढ़ा है और मुफ्त उपहार भारत में राजनीति का अभिन्न अंग बन गया है। आज भले ही कर्नाटक में कांग्रेस सरकार की मुफ्त योजनाओं के कारण चर्चा हो रही हो लेकिन मुफ्त की योजनाओं के मामले में दक्षिण का तमिलनाडु राज्य चैंपियन रहा है। अब यह प्रथा उत्तर के राज्यों में भी फैल चुकी है। दिल्ली सरकार ने महिलाओं के लिए मुफ्त बस पास, मुफ्त बिजली-पानी आदि की घोषणा की है। देखा देखी पंजाब, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, राजस्थान में भी मुफ्त की संस्कृति सिर चढ़कर बोल रही है। अब तो कई एक राजनीतिक दल जिनकी सरकारें मुफ्त उपहार के बल पर किसी राज्य में सत्ता में है, वे दूसरे राज्यों के चुनाव में मुफ्त उपहारों की नजीर देकर वोट मांगते हैं। विभिन्न राजनीतिक दल अलग अलग राज्यों में मुफ्त की रेवड़ी संस्कृति को आगे कर अपना जनाधार बढ़ाने में जुटे हुए हैं।
यह जानते हुए भी कि "भगवान के आशीर्वाद के अलावा दुनिया में कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता।" लोग मुफ्त की आस लगाए हुए हैं। यह एक आत्मघाती मानसिकता है क्योंकि करदाताओं का पैसा ही सरकारें मुफ्त के नाम पर लोगों में बांटकर सस्ती लोकप्रियता हासिल कर लेती हैं। आम जीवन में अनेक लोग मुफ्त की संस्कृति के खिलाफ मुखर भी होते हैं, किंतु राजनीतिक पार्टियां उनकी अनदेखी कर, सरल मार्ग की तरह इसे पकड़े हुए हैं।
मुफ्त की घोषणाओं को पूरा करने के चलते राज्य सरकारों की वित्तीय स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। हाल ही में रिजर्व बैंक ने अपनी एक रिपोर्ट में ऐसे राज्यों को चिन्हित किया है जिनका कर्ज उनकी धारण क्षमता से बहुत अधिक हो गया है। रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, केरल, उत्तर प्रदेश, बिहार में औसतन सरकारी उधारी राज्य के सकल घरेलू उत्पाद के 5% से अधिक हो गयी है।
भारत राज्यों का एक संघ है, इसलिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों के ऋण मिलाकर ही सरकार के ऋण माने जाते हैं। राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) समिति ने वर्ष 2017 में यह सुझाव दिया था कि जीडीपी के अनुपात में ऋण की सीमा अधिकतम 60% होनी चाहिए, जिसमें केंद्र सरकार की ऋण सीमा 40% और राज्य सरकार की 20% होनी चाहिए। कोरोना महामारी के कारण केंद्र सरकार की सीमा वर्ष 2019-20 में 62% तक पहुंच गई थी लेकिन वर्ष 2021- 22 में घटकर 57.33% तथा 2022-23 में 55.88% तक आ गई है।
लेकिन राज्य सरकारों की देनदारियां जीडीपी के अनुपात में समान वर्षों में क्रमशः 26.66% , 31.8%, 28.71% रही हैं। यदि दोनों को जोड़ दें तो कुल देनदरिया 60% की सीमा से बहुत अधिक हो जाती है। केंद्र और राज्य दोनों को मिलाकर कुल देनदारियां वर्ष 2019- 20 में 77%, 2020-21 में 92%, 2021-22 में 86% और 2022-23 में 84% की रही है। भारत के महालेखाकार (कैग) ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि अधिकांश राज्यों में ऋण जीडीपी अनुपात लक्षित 20 प्रतिशत से दो गुना से भी ज्यादा है। पंजाब में लगभग 49%, राजस्थान में 43%, पश्चिम बंगाल में 38%, बिहार में 37%, मध्य प्रदेश में 32%, उत्तर प्रदेश में 31% तक पहुंच गया है।
कैग के आकलन के मुताबिक उन राज्यों के ऊपर कर्ज की रकम लगातार बढ़ती जा रही है जहां मुफ्त की योजनाओं पर ज्यादा खर्च किया जा रहा है। इसमें सबसे ऊपर पंजाब, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु हैं। दिल्ली में भी मुफ्त योजनाओं की बाढ़ है, लेकिन यहां प्रति व्यक्ति राजस्व शेष भारत से दो गुना से भी कुछ अधिक है, इसलिए स्थिति अभी उतनी भयावह नहीं है। लेकिन दिल्ली में भी बुनियादी ढांचे के विकास के काम लगभग रुक गए हैं। जाहिर है कि कोई भी राज्य अपने राजस्व का बड़ा हिस्सा मुफ्त की योजनाओं पर लुटा देगा तो आवश्यक सेवाओं और बुनियादी विकास पर पूंजीगत खर्च कम होता जाएगा। कर्ज का जाल बढ़ेगा और अंततः यह सभी भार देश के करदाताओं और आम लोगों के सिर पर ही जाएगा।
हालांकि देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली, रोजगार गारंटी योजना, शिक्षा के लिए सहायता, स्वास्थ्य के लिए व्यय में वृद्धि जैसे उपहारों से उत्पादन क्षमता बढ़ाने और मजबूत कार्य संस्कृति विकसित करने में मदद मिलती है। अत्यंत गरीबी से पीड़ित आबादी के लिए यह मदद डूबते को तिनके का सहारा जैसी है, लेकिन सार्वजनिक धन से मुफ्त का वादा शुद्ध चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित तो करता ही है बड़ी संख्या में लोगों को निठल्ला भी बना देता है। हमें समझना होगा कि महिलाओं को बस में मुफ्त पास की तुलना में यात्रा के दौरान उनकी सुरक्षा अधिक महत्वपूर्ण है। अगर लोगों को भरोसा हो कि सरकारें उनकी जरूरतों का ख्याल रख रही हैं तो उन्हें मुफ्त उपहारों की जरूरत शायद नहीं होगी। संसदीय लोकतंत्र सत्ता के साथ-साथ विपक्ष में बैठे राजनीतिक दलों की ताकत पर निर्भर करता है।
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दलों को अपनी योजनाओं और घोषणा पत्र का मसौदा तैयार करते समय अधिक जिम्मेवार बनते हुए रणनीतियों का विश्लेषण करना चाहिए। अगर सत्ता में बैठे दल रोटी, कपड़ा, मकान, पढ़ाई और दवाई को पूरा करते हुए रोजगार और व्यवसाय के अवसर निर्मित करते हैं तो उन्हें चुनाव जिताने की गारंटी वाले फार्मूला की तरह मुफ्त की रेवड़ियां बांटने की जरूरत नहीं होगी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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