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Enemy Properties: लंबे समय बाद बिकने को तैयार है शत्रु संपत्तियां

छह दशक पुराना शत्रु संपत्ति कानून एक बार फिर चर्चा में है। इसके तहत सरकार ने देश में मौजूद साढ़े बारह हजार से ज्‍यादा अचल शत्रु संपत्तियों की बिक्री की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

 Govt begins process of auction of Enemy Properties

Enemy Properties: जब दो देशों में युद्ध होता है या जब किसी देश का विभाजन होता है तो दोनों पक्षों के लोगों पर इसका असर पड़ता है। सुरक्षा, भावनात्‍मक या अन्‍य कारणों से वे एक देश से दूसरे देश में चले जाते हैं। जितना साजोसामान वे अपने साथ ले जा सकें, ले जाते हैं। फिर भी उनकी बहुत सारी संपत्तियां वहीं रह जाती हैं। जैसे कि इमारतें और जमीनें। इन्‍हें तो कोई चाहकर भी अपने साथ नहीं ले जा सकता। ऐसी संपत्तियों की संख्‍या काफी बड़ी होती है। पहचान के लिए इन्‍हें शत्रु संपत्तियां कहा जाता है। जब दो देशों में लड़ाई छिड़ती है तो सरकार 'शत्रु देश' के नागरिकों की संपत्ति पर अधिकार कर लेती है, ताकि शत्रु पक्ष युद्ध के दौरान उसका इस्‍तेमाल अपने फायदे के लिए न कर सके।

प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के समय अमेरिका और ब्रिटेन ने जर्मन नागरिकों की संपत्तियों को इसी आधार पर अपने अधिकार में ले लिया था। भारत में भी ऐसी ज्ञात संपत्तियां हजारों की तादाद में हैं। बहुत सी अज्ञात भी होंगी। पारिभाषिक दृष्टि से भारत के संदर्भ में शत्रु संपत्ति का अर्थ है ऐसी संपत्ति, जो देश के विभाजन या फिर भारत-पाकिस्तान और भारत-चीन के बीच युद्ध के दौरान भारतीय भू-क्षेत्र में रहने वाले लोग भारत में छोड़कर चीन या पाकिस्‍तान या किसी और देश में चले गए थे और स्थायी तौर पर वहीं बस गए। ऐसा कई बार हो चुका है। 1947 में देश के विभाजन के समय। 1962 के भारत चीन युद्ध, 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान के युद्ध के समय। इस दौरान भारत में रहने वाले बहुत से लोग चीन और पाकिस्तान चले गए। भारत सरकार ने ऐसे नागरिकों को 'शत्रु' माना और यहां छोड़ी इनकी चल-अचल संपत्तियों को शत्रु संपत्ति।

भारत सरकार ने इस संबंध में पहला आदेश 10 सितंबर 1959 को जारी किया था। शत्रु संपत्ति के संबंध में दूसरा आदेश 18 दिसंबर 1971 को जारी किया गया था। इन आदेशों के बाद देश भर में ऐसी सभी संपत्तियां शत्रु संपत्ति घोषित हो गईं। इसमें यह समझना जरूरी है कि यहां शत्रु का आशय कोई व्‍यक्ति नहीं, बल्कि एक देश होता है, जिसके भारत के साथ शत्रुतापूर्ण संबंध हैं।

वैसे तो कानूनन इन संपत्तियों पर भारत सरकार का ही अधिकार है। लेकिन, कई जगह भारत छोड़कर शत्रु देशों में चले जाने वाले नागरिक, जाने से पहले इन्‍हें किसी को बेच गए या किसी को इनका संरक्षक नियुक्‍त कर गए। इस वजह से बहुत सारी संपत्तियों पर अधिकार को लेकर आजादी के बाद से ही काफी विवाद रहा है। हालांकि समाधान के लिए देश में शत्रु संपत्ति अधिनियम, 1968 मौजूद है।

1962 के भारत रक्षा अधिनियम के अंतर्गत भी सरकार को ऐसी समस्त शत्रु संपत्तियों को जब्त करने का अधिकार है। जब्त करने के अलावा सरकार इनके लिए संरक्षक (कस्‍टोडियन) नियुक्त कर सकती है। लेकिन 1968 से पहले इसमें शत्रु शब्‍द शामिल नहीं था। इसके बाद भी कई बार शत्रु संपत्ति अधिनियम में संशोधन कर इसे और अधिक प्रभावी व स्‍पष्‍ट बनाने का प्रयास किया जा चुका है। पिछली बार 17 मार्च 2017 को इस कानून में संशोधन किया था। यह एक बहुत महत्‍वपूर्ण कदम था, जो शत्रु संपत्ति पर मालिकाना हक को नए सिरे से परिभाषित करता था।

इसके पीछे एक बहुत पुराना मामला था, जिसमें शिकस्‍त के बाद सरकार को यह संशोधन करना पड़ा। संपत्ति को लेकर यह विवाद उत्तर प्रदेश के सीतापुर के रहने वाले मुहम्मद आमिर मुहम्मद खान, जिन्‍हें राजा महमूदाबाद के नाम से जाना जाता था, और भारत सरकार के बीच था। राजा महमूदाबाद के पिता आमिर अहमद खान भारत और पाकिस्तान के बंटवारे से दो साल पहले 1945 में इराक चले गए थे। कई सालों तक वहां रहने के बाद 1957 में उन्होंने पाकिस्तान की नागरिकता ले ली। हालांकि मुहम्मद आमिर मुहम्मद खान भारत में ही रह गए थे।

1965 में भारत और पाकिस्तान में युद्ध के बाद जब सरकार ने राजा महमूदाबाद की लखनऊ, नैनीताल और सीतापुर स्थित तमाम संपत्ति को शत्रु संपत्ति घोषित कर दिया तो वे अपनी गुहार लेकर इंदिरा जी के पास पहुंचे, लेकिन कोई हल नहीं निकला। इसके बाद यह मामला मोरारजी देसाई के पास भी पहुंचा। लेकिन तब भी इसका कोई हल नहीं निकला तो खान ने अदालत का रुख किया। वह पहले बॉम्बे हाईकोर्ट में जीते तो सरकार मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले गई। वहां भी फैसला उन्‍हीं के हक में रहा। कोर्ट ने राजा महमूदाबाद को भारत का नागरिक करार दिया और कहा कि वे देश के शत्रु नहीं हैं, इसलिए उनकी संपत्ति को शत्रु संपत्ति नहीं माना जाना चाहिए।

इस फैसले से भारत सरकार को बड़ा झटका लगा। इस डर से कि कहीं यह मामला शत्रु संपत्ति के अन्य मामलों में भी उदाहरण न बन जाए, सरकार ने इस कानून में संशोधन कर शत्रु संपत्ति की व्याख्या बदल दी। जिसके मुताबिक ऐसे लोग भी शत्रु माने गए जो भले ही भारत के नागरिक हैं, लेकिन उन्हें विरासत में ऐसी संपत्ति मिली है जो किसी पाकिस्तानी नागरिक के नाम है। संशोधन के साथ ही कस्टोडियन को, जो कि अधिकतर मामलों में भारत सरकार ही होती है, ऐसी संपत्तियों का मालिक मान लिया गया। और इस संशोधन को 1968 से ही प्रभावी माना गया, जिसकी वजह से राजा महमूदाबाद की सारी संपत्ति वैधानिक रूप से सरकार के पास आ गई। संशोधन के बाद सरकार को ऐसी संपत्ति बेचने का भी अधिकार दिया गया।

संशोधन के मुताबिक भारतीय नागरिक शत्रु संपत्ति विरासत में किसी को दे नहीं सकते और अभी तक जो भी ऐसी संपत्तियां बेची गई हैं, उनकी बिक्री को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया। साथ ही अब शत्रु संपत्ति से जुड़े मुकदमों पर सुनवाई सिर्फ हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में ही होगी। इसका अर्थ यह है कि अगर भारत के किसी नागरिक ने भी ऐसी कोई संपत्ति खरीदी है तो उसे भी सरकार वापस ले सकती है।

इस हफ्ते केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा ऐसी तमाम शत्रु संपत्तियों को खाली कराने और इनकी बिक्री की प्रक्रिया शुरू हो जाने की खबरें संकेत दे रही हैं कि इस बार सरकार इस विषय पर दशकों से चल रही उहापोह को खत्‍म कर इसे एक निर्णायक अंजाम देने के मूड है।

हालांकि सरकार पहले भी ऐसी संपत्तियों की बिक्री करती रही है। गृह मंत्रालय की 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट में बताया गया था कि शेयर व सोना, चांदी जैसी चल शत्रु संपत्ति के निपटान के जरिए सरकार को इस अवधि में 3,400 करोड़ रुपये से अधिक की आय हुई थी। 2018 में भी केंद्र सरकार ने ऐसी संपत्तियों को बेचकर करीब तीन हजार करोड़ रुपये कमाई की थी। लेकिन, अभी तक किसी भी अचल संपत्ति की बिक्री नहीं हुई है। यह पहली बार होगा, जब अचल शत्रु संपत्तियों की नीलामी भी की जाएगी। सीईपीआई के अंतर्गत आने वाले इन 12,611 प्रतिष्ठानों में से 12,485 पाकिस्तानी नागरिकों से संबंधित हैं और 126 चीनी नागरिकों से।

ऐसी संपत्तियों में करीब आधी (6,255) तो अकेले उत्‍तर प्रदेश में ही मौजूद हैं। इसके बाद दूसरे नंबर पर है पश्चिम बंगाल जहां 4,088 संपत्तियां हैं। बाकी की करीब दो हजार संपत्तियां दिल्ली, गोवा, महाराष्ट्र, तेलंगाना, गुजरात, त्रिपुरा, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, केरल, उत्तराखंड, तमिलनाडु, मेघालय, असम, कर्नाटक, राजस्थान, झारखंड, दमन और दीव, आंध्र प्रदेश और अंडमान निकोबार द्वीप समूह में हैं।

वर्ष 2020 में गृह मंत्रालय ने शत्रु संपत्तियों के मुद्रीकरण की प्रक्रिया की निगरानी के लिए गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में मंत्रियों के समूह का गठन किया गया था। इसकी सिफारिशों के आधार पर शत्रु संपत्तियों के निपटान से संबंधित दिशा-निर्देशों में बदलाव किया गया है।

नए बदलावों के तहत अब संपत्तियों की बिक्री से पहले संबंधित जिला मजिस्ट्रेट या उपायुक्त की मदद से शत्रु संपत्तियों को खाली कराने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। यदि शत्रु संपत्ति की कीमत एक करोड़ रुपये से कम है तो संरक्षक पहले कब्जेदार को संपत्ति खरीदने की पेशकश करेगा और यदि वे इसे अस्वीकार कर देते हैं, तो शत्रु संपत्ति का निपटान दिशानिर्देशों में दी गई प्रक्रिया के अनुसार किया जाएगा।

हालांकि यह काम आसान नहीं है, क्‍योंकि वर्तमान में अधिकांश शत्रु संपत्तियों पर अवैध कब्जा है। बहुत सारी जगहों पर भूमाफिया द्वारा शत्रु संपत्तियों पर अवैध कब्जा कर पक्‍की इमारतों या घरों का निर्माण कर दिया गया है। जहॉं पर अनेक परिवार रह रहे हैं। ऐसे में इन्‍हें खाली कराना चुनौतीपूर्ण होगा।

इसके अलावा, यह शत्रु सं‍पत्तियों की वर्तमान सूची भी कोई अंतिम सूची नहीं है, सीईपीआई इसे अपडेट करती रहती है तो हो सकता है कि जैसे-जैसे ऐसी और संपत्तियों का पता लगता जाए, यह सूची भी लंबी होती जाए। लेकिन, केंद्र सरकार का ताजा फैसला, एक अच्‍छी शुरुआत तो है ही। उम्‍मीद की जानी चाहिए कि इसे राजनीतिक और साम्‍प्रदायिक रंग देने की कोशिश नहीं की जाएगी।

यह भी पढ़ेंः Enemy Property: क्या होती हैं शत्रु संपत्तियां? जानें क्या है इन पर विवाद

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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