Indian Economy: भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए शुभ मंगल संकेत

रिकार्ड जीएसटी कलेक्शन, सेवा उद्योग के निर्यात में बढ़ोतरी, विदेशी मुद्रा से भरा सरकारी खजाना और उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में बढ़ोतरी, भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में शुभ मंगल संदेश देती हैं।

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इस समय की दुनिया हाई इंट्रेस्ट रेजीम यानी उच्च ब्याज दर की व्यवस्था में चल रही है। अमेरिका में ब्याज दर 2007 के बाद से अब तक सबसे अधिक है। वहां ब्याज दर 5 फीसदी से अधिक हो गई है जबकि मार्च 2018 में केवल डेढ़ प्रतिशत थी। यानी पांच साल में 300 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई। इसी तरह ब्रिटेन में मौजूदा ब्याज दर 4.25 प्रतिशत है जो कि पांच साल पहले एक प्रतिशत से भी कम थी। यानी पांच साल में लगभग 500 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

फ्रांस में ब्याज दर 3.5 प्रतिशत है जो कि पांच साल पहले 2018 में 0.65 प्रतिशत थी। यहां भी पांच साल में 5 गुणा ब्याज दर में बढ़ोतरी हो गई है। जर्मनी में भी ब्याज दर पांच साल में एक फीसदी से भी कम से बढ़कर आज 3.5 प्रतिशत है। जबकि भारत में ब्याज दर में पिछले पांच साल में केवल 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। मार्च 2018 में भारत में बैंक ब्याज दर 4 प्रतिशत थी जो कि इस समय 6.5 प्रतिशत है। यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि ये सारे आंकड़े इन सभी देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा घोषित हैं।

ये वही देश हैं जिनके साथ हमारी अर्थव्यवस्था का आंकलन किया जाता है। हां अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर चीन है, जहां ब्याज दरों की बढ़ोतरी पर बहुत हद तक अंकुश है। चीन ने वर्षों से बैंक ब्याज दर को 3.5 प्रतिशत के आस पास बनाए रखा है।

यदि एशियाई देशों में लागू बैंक ब्याज दर देखें तो भारत लगभग सभी क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं से ज्यादा स्थिर है। इस समय म्यांमार में 7 प्रतिशत, नेपाल में 8.5 प्रतिशत, पाकिस्तान में 21 प्रतिशत और श्रीलंका में 15.5 प्रतिशत बैंक ब्याज दर है। यह सामान्य सी बात है कि बैेंक ब्याज दर में स्थिरता या न्यूनतम भटकाव ना सिर्फ मजबूत अर्थव्यवस्था का द्योतक है, बल्कि सिस्टम में आवश्यक साख की आपूर्ति भी है। भारत के आंकड़े हमें निश्चितता प्रदान करते हैं। 6 अप्रैल को जारी मौद्रिक नीति में ब्याज दर में किसी भी वृद्धि की घोषणा नहीं होना और सुकून देता है।

जबर्दस्त जीएसटी संग्रह
अर्थव्यवस्था के सुचारू रूप से चलने का एक आधार कर संग्रह भी है। इस मार्च में एक लाख 60 हजार करोड़ का रिकार्ड जीएसटी संग्रह बताता है कि भारत का व्यावसायिक वर्ग किसी मंदी के अंदेशे या किसी अस्थिरता की आशंका से ग्रसित नहीं है। उसे भारत की अर्थव्यवस्था और सरकार दोनों पर भरोसा है। इस साल चौथी बार जीएसटी संग्रह डेढ़ लाख करोड़ से ज्यादा रहा। अन्य करों का संग्रह भी लगातार बढ़ रहा है। फिर भी यह कहना ठीक नहीं है कि कर जीडीपी का हमारा अनुपात काफी ठीक है। भारत का टैक्स जीडीपी अनुपात 7.8 है, जबकि चीन का 12.6 प्रतिशत। अमेरिका और यूरोप में टैक्स जीडीपी अनुपात 18 से 25 प्रतिशत तक है। यानी रिकार्ड कर संग्रह होने के बावजूद अभी हम कई देशों से पिछड़े हैं।

जीडीपी ग्रोथ में भारत अव्वल
इस समय पूरी दुनिया में अकेले भारत ही है जिसका जीडीपी ग्रोथ 6 प्रतिशत से अधिक है। चीन अभी भी 5 प्रतिशत से अधिक जीडीपी ग्रोथ का दावा नहीं कर रहा है। बाकी देशों में विकास दर दो से तीन प्रतिशत को काफी माना जाता है। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार वर्ष 2022-23 में भारत में जीडीपी वृद्धि दर 6.8 प्रतिशत रहेगी, जबकि विश्व बैंक ने अनुमान घटाकर इसे 6.3 प्रतिशत कर दिया है। किसी ने भी जीडीपी वृद्धि दर में 6 प्रतिशत से कम का आकलन नहीं किया है।

विदेशी मुद्रा भंडार
मंदी की आहट और रूस यूक्रेन युद्ध के बाद से कई देशों के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार गिरावट देखी जा रही है। विदेशी मुद्रा भंडार का आकलन हम डाॅलर के संदर्भ में करते हैं और अमेरिका को छोड़ कर बाकी देशों के मुद्रा भंडार को हम उसकी अर्थव्यवस्था की मजबूती के आधार के रूप में देखते हैं। चीन के पास सबसे अधिक विदेशी मुद्रा का भंडार है, लगभग 3315 बिलियन डाॅलर। अमेरिका के साथ व्यापारिक पंगा और अन्य कई देशों द्वरा चीन के बहिष्कार के कारण पिछले एक साल में चीन के विदेशी मुद्रा भंडार में 57 बिलियन डाॅलर की गिरावट आई है। लेकिन भारत औसत 580 बिलियन डाॅलर के विदेशी मुद्रा भंडार के साथ स्थिर है। यानी भारत के प्रति विदेशी निवेशकों का विश्वास बना हुआ हैं। हालांकि विदेशी मुद्रा भंडार को एक मजबूत स्थिति में बनाए रखने के लिए मोदी सरकार ने रूस के साथ तेल खरीद का जो करार किया है, उसका भी योगदान बहुत है। भारत सबसे अधिक विदेशी मुद्रा भंडार रखने वाला विश्व का पांचवा सबसे बड़ा देश है।

महंगाई की मार बेअसर
कोविड प्रकोप ने पूरी दुनिया की मांग-आपूर्ति की व्यवस्था को पहले ही ध्वस्त कर दिया था। रही सही कसर रूस -यूक्रेन युद्ध ने पूरी कर दी। दुनिया भर में महंगाई बढ़ती ही जा रही है। हां भारत कुछ ऐसे देशों में शामिल है, जिसने ना सिर्फ महंगाई को बेलगाम होने से रोका है, बल्कि देश के 80 करोड़ लोगों के लिए निःशुल्क अनाज उपलब्ध कराकर गरीबों के लिए खाद्य सुरक्षा प्रदान करने का एक अनोखा काम किया है।

आईएमएफ द्वारा हाल ही में जारी एक अध्ययन के अनुसार विश्व भर में महंगाई की दर 6.6 प्रतिशत रहने वाली है। आईएमएफ ने चीन, जापान और ताईवान के बाद भारत के बारे में ही यह भविष्यवाणी की है कि यहां महंगाई को निरूपित करने वाली मुद्रा स्फीति की दर 5.1 प्रतिशत रहेगी। बाकी 50 से अधिक देश हैं, जिनमें ब्रिटेन भी शामिल है, जहां महंगाई की दर 9 प्रतिशत से लेकर 30 प्रतिशत तक हो सकती है।

इस सूची में हमारे दो पड़ोसी पाकिस्तान और श्रीलंका भी शामिल हैं। फिर भी भारत में महंगाई महसूस की जा रही है। यह आर्थिक के साथ साथ एक राजनीतिक मुद्दा भी है जिसका जवाब सरकार को देना है।

सकारात्मक संकेत
कुछ बेहद सकारात्मक संकेत हैं जिनसे यह लगता है कि आने वाले दिनों में भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बनी रहेगी। जैसे- बेरोजगारी की दर 7.8 से घटकर 7.5 प्रतिशत पर आ गई है। लोगों का बिजनेस कांफिडेंस बढ़ा है। बैंकों की सेहत काफी सुधर चुकी है। जमा और कर्ज उठाव दोनों में बढ़ोतरी हुई है। सेवा क्षेत्र के बिजनेस में 8.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी जा चुकी है और सबसे बड़ी बात कि कृषि उत्पादन में रिकार्ड वृद्धि हुई है। सरकारी आकड़ों के अनुसार 2022-23 में 3235.54 लाख टन अनाज की पैदावार हुई है। हमें खुश होना चाहिए कि हम खुद भी खा सकते हैं और दुनिया के कई देशों को खिला रहे हैं।

महंगाई, रूपये के अवमूल्यन, बेरोजगारी और राज्यों की खराब आर्थिक सेहत विकास की कहानी में कुछ सवालों को जन्म जरूर देती हैं लेकिन मंदी से रूबरू हो रही वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की स्थिति बहुत से देशों से बेहतर दिखती है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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