इटली में जिऑर्जिया मिलोनी की जीत पूंजीवाद को चुनौती है
अंग्रेजी का कैपिटल (Capital) शब्द लैटिन भाषा के मूल शब्द कैटल से निकलता है। कैटल से कैपुट और कैपुट से कैपिटल शब्द अस्तित्व में आ जाता है। कैपिटल शब्द का विकास लैटिन के जिन दो शब्दों से हुआ है उसमें कैपुट का अर्थ सिर होता है और कैटल का अर्थ मवेशी।

यहां मवेशी से अर्थ चल संपत्ति से है जो प्राचीन यूरोप में सबसे बड़ा धन समझा जाता था। जो उसका मालिक हुआ वह कैपुट हो गया। इसी से कैपिटल शब्द बना और इसी कैपिटल से कैपिटलिज्म (capitalism) जिसका इस्तेमाल सत्रहवीं सदी से शुरु होता है।
इसी कैपिटलिज्म की प्रतिक्रिया में यूरोप में ही एक दूसरा शब्द गढा गया सोशलिज्म (Socialism)। इस शब्द का रूट भी लैटिन भाषा में जाता है जो मूल रूप से सोशायर से जुड़ता है जिसका अर्थ है सामाजिक रूप से हिस्सा देना।
सोशलिज्म शब्द का प्रयोग अठारहवीं सदी में एक फ्रेन्च राजनीतिक अर्थशास्त्री फियरे ल्यूरोक्स ने किया था। 1834 में एक रिसर्च पेपर में सबसे पहले उन्होंने सोशलिज्म शब्द का इस्तेमाल किया। उनके रिसर्च पेपर का नाम था "इंडिविजुअलिज्म एण्ड सोशलिज्म"।
यहीं से सोशलिज्म शब्द यूरोप के राजनीतिक बहस का हिस्सा बना जिसे बाद में 1888 में मार्क्सवादियों ने अपना लिया। मार्क्सवाद ने उत्पादन तंत्र पर नियंत्रण की जो सरकारी व्यवस्था बनायी उसे सोशलिज्म का नाम दिया।
कैपिटलिज्म और सोशलिज्म का टकराव
तब से लेकर अब तक संसार में ये दो वाद पूंजीवाद और समाजवाद के नाम पर एक दूसरे से टकराते चले आ रहे हैं। सरकारी लाभ वाले समाजवाद की कमान कम्युनिस्टों ने अपने हाथ में रखी जबकि व्यक्तिगत पूंजीवाद की कमान यूरोप के कैपिटलिस्टों ने अपने हाथ में ले ली।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पूंजीवाद और समाजवाद दोनों ने यह समझ लिया कि संसार के बाजार पर कब्जा करने का यह तरीका विनाशकारी है। उपनिवेशवाद के भरोसे यूरोप जिस पूंजीवाद को पाल पोस रहा था, उसने उसमें बदलाव किया। अब उसने अपने उपनिवेशों का मुख्य दरवाजा धड़ाम से बंद किया और चोर दरवाजे से हाथ में बाजार का झुनझुना लिये दोबारा लौट आया।
इसी नव उपनिवेशवाद से पहले गैट निकला फिर बाद में डब्लूटीओ। इनका काम संसार भर में व्यापार के अवसर पैदा करना था। आज भारत सहित संसार के अधिकांश देश जिस बाजारवाद को "उदारवाद" कहकर अपना चुके हैं उसके मूल में वही कैपिटलिज्म है जिसने अपने रास्ते में आनेवाली हर दीवार को युद्ध से नहीं बल्कि व्यापार से ढहा दिया। ऐसे में इटली की नयी प्रधानमंत्री के रूप में जार्जिया मिलोनी का चुना जाना चौंकाने वाला है।
फ्रेन्च पार्लियामेन्ट से निकला लेफ्ट विंग राईट विंग
इटली के आम चुनाव में जार्जिया मिलोनी की पार्टी "ब्रदर्स ऑफ़ इटली" (Brothers of Italy) की जीत को ब्रिटिश मीडिया बीबीसी ने "फार राइट पार्टी" की जीत घोषित किया है। बीबीसी की दृष्टि में मिलोनी 'फार राइट' (अति रुढिवादी) नेता हैं, जबकि स्वयं मिलोनी सोशलिस्ट मूवमेन्ट से जुड़ी रही हैं। फिर बीबीसी उन्हें 'फार राइट' या रुढिवादी क्यों घोषित कर रहा है? इस लेफ्ट राइट को भी समझेंगे तो बीबीसी जैसे मीडिया संस्थानों का वर्गीकरण भी समझ में आयेगा।
इस लेफ्ट राइट वर्गीकरण की जड़े भी कैपिटलिस्ट और सोशलिस्ट टकराव में निहित हैं। 1789 में फ्रांस की क्रांति के बाद फ्रेंस पार्लियामेन्ट में जो राजा के समर्थक थे वो दाहिनी ओर बैठे जबकि जो राजा के विरोधी थे वो बाईं ओर बैठे।
यहीं से राजनीति में यह लेफ्ट राइट का बंटवारा शुरु जिसका दुनियाभर में सबसे ज्यादा दुरुपयोग कम्युनिस्टों ने किया। क्योंकि राजा के विरोधी फ्रेन्च पार्लियामेन्ट में बायीं ओर बैठे थे इसलिए फ्रांस में राजा का विरोध करने वालों ने अपने आप को लेफ्ट कहा। यही परिभाषा आगे चलकर कम्युनिस्टों ने सामाजिक क्रांति के नाम पर हर प्रकार के विखंडनवाद से जोड़ दिया गया।
यह भी पढ़ें: Giorgia Meloni: 100 साल बाद इटली में लौट आया फासीवाद, जियोर्जिया मेलोनी होंगी प्रधानमंत्री!
फ्रेन्च पार्लियामेन्ट का यह लेफ्ट राइट टकराव आज इतना विकसित कर दिया गया है कि इसमें से फार लेफ्ट और फार राइट का वर्गीकरण करते हुए एक सेन्टर भी चिन्हित कर लिया गया है जो न इधर का है और न उधर का। लेकिन ये सारी वैचारिक बंटवारा यूरोप के गर्भ से ही निकला है जिन्हे भारत सहित संसार की हर संस्कृति पर थोपा गया है। ऐसी सभ्यताओं की अपनी राजनीतिक और सांस्कृतिक विरासत को नेपथ्य में ढकेल दिया गया।
लेफ्ट लिबरल हो गये पूंजीवाद के पैरोकार
यह स्थापित सत्य है कि "राइटविंग" या "फार राइट" वो होते हैं जो कैपिटलिज्म और उससे निकले बाजारवाद के समर्थक होते हैं। जबकि "लेफ्ट" या "फार लेफ्ट" उन्हें कहा जाता है जो पूंजीवाद का विरोध करते हैं और सोशलिज्म के तर्ज पर आर्थिक बंटवारा करते हैं। लेकिन आश्चर्य देखिए कि बीबीसी ही नहीं बल्कि संसार का हर प्रमुख मीडिया जार्जिया मिलोनी की जीत को "फार राइट विंग" की जीत बता रहा है जबकि उन्होंने स्वयं कैपिटलिज्म और बाजारवाद के खिलाफ बोलकर चुनाव जीता है। कायदे से तो उनकी जीत को लेफ्ट विंग की जीत कहना चाहिए क्योंकि वो खुले तौर पर बाजारवाद के खिलाफ बोल रही हैं। फिर जार्जिया मिलोनी के प्रति लेफ्ट लिबरल मीडिया की उलटबांसी क्यों?
जार्जिया मिलोनी का कैम्पेन पूरी तरह से बाजारवाद के खिलाफ था। उन्होंने परिवार, समाज और व्यक्तिगत पहचान को मुद्दा बनाया जिसे इटली में बाजारवाद लगभग खत्म कर चुका है। यह सब उन्होंने किसी लिखी हुई स्क्रिप्ट के तहत नहीं किया जैसा कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान किया था। ओबामा ने बहुत ज्यादा फेमिली फेमिली किया था लेकिन बाजारवाद के खिलाफ उन्होंने भी मुंह नहीं खोला था। लेकिन मिलोनी ने न केवल परिवार और व्यक्तिगत अस्तित्व के महत्व को बताया बल्कि इसे खत्म करनेवाले बाजारवाद को भी दोषी ठहराया।
फिर सवाल ये उठता है कि बाजारवाद का विरोध करने के बाद लेफ्ट लिबरल मीडिया उन्हें लेफ्ट लिबरल कहने की बजाय फार राइट लीडर क्यों बता रहा है? असल में अब लेफ्ट लिबरल मीडिया या एनजीओ पूंजीवाद के पैसे पर ही पल रहे हैं। इसलिए बाजार के खिलाफ उठनेवाली हर आवाज को रुढिवादी करार देते हैं।
जार्जिया मिलोनी ने बाजारवाद पर जो गंभीर सवाल उठाया है वह मनुष्य की पहचान का संकट है। जार्जिया ने अपने कैम्पेन के दौरान यही बात सबसे प्रमुखता से उठाई कि बाजारवाद हमसे हमारी पहचान छीनकर हमें एक नंबर में बदल रहा है। हम इटलीवासी होने पर गर्व नहीं कर सकते क्योंकि हम एक उपभोक्ता बनकर रह गये हैं।
मनुष्य की पहचान मिटाकर उपभोक्ता बनाता बाजार
यह संकट सिर्फ इटली का नहीं है। यूरोप के देशों में यह चरम पर हो सकता है लेकिन पूरी दुनिया में बाजार मनुष्य से उसकी हर प्रकार की पहचान छीनकर उसे उपभोक्ता बना रहा है। देश, समाज, परिवार मिटाकर व्यक्तिगत पहचान को भी एक पहचान पत्र में परिवर्तित कर रहा है। इसीलिए अपने आप को लेफ्ट लिबरल मीडिया कहने वाले लोग राष्ट्रवाद जैसे सिद्धांतों के खिलाफ सबसे मुखर हैं।
राष्ट्रवाद, परिवारवाद मनुष्य को सिर्फ उपभोक्ता बनने से अलग एक वास्तविक पहचान देता है जिसे बाजार अपने लिए अच्छा संकेत नहीं मानता है। यही बात जार्जिया मिलोनी ने इटली के अपने चुनाव प्रचार के दौरान बार बार कही है। दुर्भाग्य से कथित लेफ्ट लिबरल मीडिया ही राष्ट्रवाद विरोधी इस पूंजीवादी एजंडे को सबसे ज्यादा प्रचारित कर रहा है। बाजार के खिलाफ जाकर जो राष्ट्रवाद, समाज या परंपरा की बात करते हैं उन्हें कथित लेफ्ट लिबरल समूह रुढिवादी या राईट विंग घोषित करने लगते हैं।
लेकिन इटली में जार्जिया मिलोनी के पार्टी की जीत असल में संसार पर बढते बाजारवाद के संकट के खिलाफ एक आवाज के रूप में तो देख ही सकते हैं। यही कारण है कि अमेरिकी पूंजीवाद के रक्षक लिबरल अखबार भी जार्जिया मिलोनी को मिली जीत को अमेरिकी पूंजीवाद के खिलाफ एक चुनौती के रूप में देख रहे हैं।
यह भी पढ़ें: मस्जिद नहीं, मुसलमानों पर नया कानून.. इटली की नई प्रधानमंत्री का 'कट्टर' भाषण भारत में वायरल
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
-
Delhi NCR Weather Today: दिल्ली-NCR में होगी झमाझम बारिश, दिन में छाएगा अंधेरा, गिरेगा तापमान -
युद्ध के बीच ईरान ने ट्रंप को भेजा ‘बेशकीमती तोहफा’, आखिर क्या है यह रहस्यमयी गिफ्ट -
Gold Silver Price: सोना 13% डाउन, चांदी 20% लुढ़की, मार्केट का हाल देख निवेशक परेशान -
Ram Navami Kya Band-Khula: UP में दो दिन की छुट्टी-4 दिन का लंबा वीकेंड? स्कूल-बैंक समेत क्या बंद-क्या खुला? -
इच्छामृत्यु के बाद हरीश राणा पंचतत्व में विलीन, पिता का भावुक संदेश और आखिरी Video देख नहीं रुकेंगे आंसू -
'मुझे 10 बार गलत जगह पर टच किया', Monalisa ने सनोज मिश्रा का खोला कच्चा-चिट्ठा, बोलीं-वो मेरी मौत चाहता है -
Petrol-Diesel Shortage: क्या भारत में पेट्रोल-डीजल समेत ईंधन की कमी है? IndianOil ने बताया चौंकाने वाला सच -
कौन हैं ये असम की नेता? जिनके नाम पर हैं 37 बैंक अकाउंट, 32 गाड़ियां, कुल संपत्ति की कीमत कर देगी हैरान -
Iran Vs America: ईरान ने ठुकराया पाकिस्तान का ऑफर, भारत का नाम लेकर दिखाया ऐसा आईना, शहबाज की हुई फजीहत -
LPG Crisis: एलपीजी संकट के बीच सरकार का सख्त फैसला, होटल-रेस्टोरेंट पर नया नियम लागू -
Trump Florida defeat: ईरान से जंग ट्रंप को पड़ी भारी, जिस सीट पर खुद वोट डाला, वहीं मिली सबसे करारी हार -
Who is Aryaman Birla Wife: RCB के नए चेयरमैन आर्यमन बिड़ला की पत्नी कौन है? Virat Kohli की टीम के बने बॉस












Click it and Unblock the Notifications