GDP Growth: जीडीपी के चमकदार आंकड़ों के बीच उभरती चिंताएं
GDP Growth: जीडीपी में देश की आर्थिक वृद्धि दर चालू वित्त वर्ष 2023-24 की तीसरी तिमाही में तेजी से बढ़कर 8.4% हो गई है। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक ने इसी तिमाही के लिए 6.5% और एसबीआई रिसर्च में 6.7 से 6.9% तक रहने का अनुमान जताया था।
लेकिन एक निश्चित अवधि में वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों में वृद्धि के आधार पर राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के ताजा आंकड़ों में अनुमान से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है जिसका श्रेय विनिर्माण, खनन और निर्माण क्षेत्र के बेहतर प्रदर्शन को दिया गया है।

लेकिन दूसरी तरफ इंफ्रा सेक्टर की ग्रोथ पिछले 15 महीने में सबसे कम स्तर पर पहुंच गई है। जनवरी में कोर सेक्टर की वृद्धि दर साल भर पहले के मुकाबले 3.6 प्रतिशत रही है। कोर सेक्टर में शामिल 8 प्रमुख बुनियादी क्षेत्र में से रिफाइनरी प्रोडक्ट्स, फर्टिलाइजर, स्टील और इलेक्ट्रिसिटी में कमजोरी का असर ओवरऑल ग्रोथ पर पड़ा है।
मौजूदा वित्त वर्ष में अप्रैल से जनवरी तक कोर सेक्टर की ग्रोथ 7.7 प्रतिशत रही है। इसी तरह जीडीपी के चमकदार आंकड़ों के बीच खेती और खपत का हाल अब भी बेहाल है। ग्रामीण मांग बहुत कमजोर है, शहरों में भी कोई तेजी नहीं है। जब तक खपत की रफ्तार नहीं बढ़ेगी, निजी निवेश में भी तेजी नहीं आएगी।
सुखद है कि खुदरा महंगाई दैनिक उपभोग की वस्तुओं के दाम घटने से निचले स्तर पर पहुंच गई है। लेकिन जानकारों का कहना है कि मूल्य सूचकांक का बढ़ना घटना अगर खाद्य उत्पादों पर ही निर्भर रहता है तो यह संतोषजनक नहीं है। असली मामला औद्योगिक उत्पादन की दर का है। औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर सालाना आधार पर पिछले वर्ष 3.8 प्रतिशत रह गई, इसका कारण था खनन और बिजली उत्पादन क्षेत्र का खराब प्रदर्शन।
मालूम हो कि वर्ष 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने दुर्बल आर्थिक स्थिति को देखते हुए आर्थिक उदारीकरण शुरू करने की वकालत की थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि आर्थिक सुधारों के कारण ही आज भारत दुनिया की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था बना है। उन्हीं सुधारों के कारण तब के 270 अरब अमेरिकी डॉलर से चलते-चलते आज भारत की अर्थव्यवस्था (जीडीपी) चार खरब अमेरिकी डॉलर के आसपास पहुंच चुकी है।
यद्यपि बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की रेस में जीडीपी को आधार बनाया गया है जबकि दूसरा पक्ष यह है कि प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से विकसित होने में हमने खुद ही 2047 तक का समय सोचा है। जिस इंग्लैंड को पछाड़कर भारत दुनिया की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था बना है प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत उससे बहुत नीचे है।
अभी हमारी प्रति व्यक्ति आय लगभग 2100 डॉलर है जबकि आज उच्च आय वाला देश उसे माना जाता है जहां प्रति व्यक्ति आय 12000 डॉलर से अधिक हो। यानी अभी हम उच्च आय वाले देश के छठवें हिस्से के बराबर है। विश्व बैंक के अनुसार प्रति व्यक्ति आय के मामले में दुनिया के 197 देशों की सूची में भारत का स्थान 142 वें पायदान पर है।
आर्थिक सुधार और विकास की तेज रफ्तार के जरिए भारत का लक्ष्य 2047 तक अपनी अर्थव्यवस्था को आज से 10 गुना अधिक का बनाना है। आर्थिक जानकारों के मुताबिक इसके लिए हमें 8% से ऊपर की जीडीपी वृद्धि दर हासिल करनी होगी। चालू वर्ष की तीसरी तिमाही में यह लक्ष्य देश ने हासिल किया है, मगर जब हम वित्तीय वर्ष की आर्थिकी का लेखा-जोखा करते हैं और इसकी संभावनाओं को टटोलते हैं तो कुछ विलोम स्थितियां न सिर्फ सचेत करती हैं बल्कि नित नए आंकड़े चौंकाते भी हैं।
मोटे तौर पर विकसित देश बनने के लिए जरूरी है कि देश के नागरिकों का जीवन स्तर अच्छा हो, उनको गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधा मिल रही हो और नागरिकों की जीवन प्रत्याशा 75 वर्ष से अधिक हो। संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास सूचकांक में भारत की रैंकिंग 132वीं है जबकि दुनिया के बेहतरीन शिक्षण संस्थानों के मामले में भारत 149 वें स्थान पर है। विज्ञान की पढ़ाई में भारत की युवा पीढ़ी लगातार पिछड़ रही है। शोध में पैसे की कमी से प्रतिभा पलायन बड़ी समस्या के रूप में उभरी है। डिजिटल भारत के साथ-साथ स्टार्टअप और स्वरोजगार के नारों के बावजूद देश में बेरोजगारी और महंगाई बदस्तूर कायम है। आर्थिक विषमता की खाई भी लगातार चौड़ी हो रही है।
भारत में साल दर साल अति समृद्ध लोगों की संख्या में वृद्धि हो रही है। वर्ष 2023 में इनकी संख्या सालाना आधार पर बढ़कर 13263 हो चुकी है। द वेल्थ रिपोर्ट 2024 के मुताबिक देश में समृद्धि के चलते अति उच्च नेटवर्थ वाले लोगों की संख्या 2028 तक बढ़कर 20 हजार हो जाएगी। इस वर्ग में ऐसे लोगों को परिभाषित किया जाता है जिनकी कुल संपति 3 करोड डॉलर या उससे ज्यादा है। आक्सफैम के अनुसार भारत में सिर्फ 9 अमीरों की संपत्ति 50% गरीब आबादी की संपति के बराबर है।
सकारात्मक रूप से देखें तो समृद्धि बढ़ने का लाभ निचले पायदान तक पहुंचता है, मगर व्यावहारिक तौर पर वह रिस कर ही पहुंचता है। धन एकत्र करने वालों में कुछ ही लोक कल्याण की भावना से काम करते हैं, उनकी कंपनियां न सिर्फ अत्यधिक लाभ कमाती हैं बल्कि वह विभिन्न लाभकारी योजनाओं में निवेश के गुण भी जानते हैं। कहने को तो हमारी सरकार ने नया शिगूफा छोड़ा है कि अति गरीबों की संख्या सिकुड़ कर अब तीन प्रतिशत पर आ चुकी है, 25 करोड लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकाल दिया गया है, मगर देश में जहां भी नजर घुमाएं तो गरीबी, अभाव, अशिक्षा, कुपोषण और दरिद्रता सहज ही नजर आती है।
गिनती के समृद्ध लोगों के साथ देश में 5 किलो राशन प्राप्त कर रही लगभग 81 करोड़ की बड़ी आबादी की तुलना नहीं की जा सकती। अभी हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक, वित्त मंत्रालय और इंडियन एक्सिस बैंक की एक रिपोर्ट आई जिसमें बताया गया कि देश की शीर्ष 500 निजी कंपनियों का कारोबार 2023 में 231 लाख करोड़ के आसपास पहुंच गया है। इससे भी बड़ी बात यह है कि देश पूरे वर्ष में जो सकल घरेलू उत्पादन करता है यह उसका 71% बैठता है। ऐसे में जब एक बड़ा हिस्सा कुछ गिनी चुनी बड़ी कंपनियों को ही चला जाएगा तो देश में सबसे अधिक रोजगार देने वाले लघु और कुटीर उद्योगों का विकास कैसे होगा?
देश में मेधावी लोगों की कमी नहीं है। डिजिटल भारत में कृत्रिम मेधा के बल पर समस्याओं को दूर करने की क्षमता है। हमें आंकड़ों के स्वप्नजीवी माहौल से बाहर निकाल कर सच को स्वीकार करना चाहिए क्योंकि इससे आम आदमी का भला नहीं होने वाला है। अब जबकि आम चुनाव की दुंदुभी बजने को है, जरूरी आर्थिक मुद्दों को भी राजनीतिक चाशनी में लपेटकर परोसा जा रहा है।
आखिर क्या कारण है कि मौजूदा सरकार जहां आर्थिक सुधारों के जनक पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को भारत रत्न से सम्मानित करती है, तो आर्थिक सुधारों की व्यवस्था करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कामकाज पर श्वेत पत्र लाकर न सिर्फ उंगली उठाती है बल्कि आर्थिक प्रगति में बाधा डालने का ठीकरा भी उन्हीं के कार्यकाल पर फोड़ती है?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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