G20 Delhi Summit: सफल आयोजन पर भी सवाल क्यों?
सरकार के स्तर पर कितना भी सफल आयोजन हो, उसमें कोई कमी न हो तो भी विपक्ष को उसमें कुछ न कुछ कमी ही निकालनी होती है। कुछ ऐसा ही इस समय नई दिल्ली में आयोजित जी20 के सफल आयोजन के बाद दिख रहा है। अगर यह आयोजन किसी तरह से असफल होता तो पता नहीं क्या होता, लेकिन सफल हुआ तो क्यों सफल हुआ, इस तरह के सवाल उठाये जा रहे हैं।
मसलन, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने यही सवाल उठा दिया कि "विदेशी मेहमानों को सोने की थाली में छप्पन भोग परोसा गया जबकि देश के करोड़ों लोग हैं जो पांच किलो अनाज के भरोसे हैं।

अगला चुनाव इसी भेद को मिटाने के लिए लड़ा जाएगा।" तो राजद सुप्रीमो लालू यादव ने कहा कि "इस पर इतना पैसा खर्च किया गया इससे देश की जनता को क्या मिलेगा?" शरद पवार ने वैसे तो आयोजन पर सवाल नहीं उठाया लेकिन ये जरूर पूछा कि पहली बार इस तरह के आयोजन में चांदी सोने के चम्मच प्लेट इस्तेमाल किये गये।
लेकिन इनमें सबसे महत्पूर्ण है राहुल गांधी का सवाल। राहुल गांधी ने ट्वीट किया कि "भारत सरकार हमारे गरीब लोगों और जानवरों को छुपा रही है। हमारे मेहमानों से भारत की हकीकत छुपाने की जरूरत नहीं है।" राहुल गांधी का इशारा संभवत: उस फोटो की ओर है जिसे जी20 आयोजन से पहले सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर वायरल किया गया था। इस फोटो में एक जनता कालोनी को टाट की दीवार से ढका हुआ दिखाया गया था। सोशल मीडिया पर फोटो शेयर करनेवालों ने बताया कि दिल्ली के जी20 सम्मेलन में इस तरह से गरीबों की बस्ती को ढंक दिया गया है।
हालांकि सोशल मीडिया पर फोटो वॉयरल होने के बाद पीआईबी ने इस फोटो का फैक्ट चेक किया कि ये फोटो जी20 के आयोजन से जुड़ा हुआ नहीं है बल्कि मुंबई का है। उस पर फोटोशॉप के जरिए जी20 का पोस्टर लगाकर दिल्ली का बता दिया गया था। इस सच्चाई के बावजूद भी अगर राहुल गांधी जी20 के आयोजन में गरीब लोगों को छिपाने का आरोप लगा रहे हैं तो यह राजनीतिक रूप से ही अप्रासंगिक हो जाता है।
निश्चय ही राहुल गांधी भारत की जिस सच्चाई को छिपाने का आरोप लगा रहे हैं उसे छिपाया भी नहीं गया है। इंदिरा गांधी के समय से गरीबी हटाओ का नारा दिया जा रहा है तो क्या देश में गरीबी खत्म हो गयी? 140 करोड़ लोगों के देश में पूंजी का असमान बंटवारा एक समस्या है लेकिन क्या उस समस्या का कोई रिश्ता जी20 के आयोजन से जुड़ता है? इसके उलट प्रधानमंत्री मोदी ने जीडीपी केन्द्रित विकास की बजाय मानव केन्द्रित विकास की जो बात कही है वह कहीं न कहीं पूंजी के इसी असमान बंटवारे को समाप्त करने की पहल हो सकती है।
जीडीपी और पर कैपिटा इन्कम निर्धारित करने का जो वर्तमान वैश्विक तरीका है वह तरीका ही दोषपूर्ण है। एक देश की समग्र आय को समग्र जनसंख्या में समान बंटवारा करके उसका एक औसत निकाल लेना देश की कुल आर्थिक हालत तो बयान करता है लेकिन असमान पूंजी बंटवारे की समस्या को दूर नहीं करता। अगर प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर जी20 जैसे ताकतवर आर्थिक मंच पर मानव केन्द्रित आर्थिक विकास पर आगे भी काम जारी रहता है तो हो सकता है भविष्य में कोई नया तरीका विकसित हो। अभी तो विश्व के मानक वही हैं जो अफ्रीका से लेकर अमेरिका तक पर समान रूप से लागू होते हैं।
सोशल मीडिया पर ही एक और अफवाह उड़ायी गयी कि इस आयोजन पर निर्धारित बजट से 300 प्रतिशत अधिक खर्च किया गया। संकेत गोखले ने ट्वीट किया कि जी20 के आयोजन के लिए 990 करोड़ रूपये निर्धारित थे लेकिन इस पर कुल 4100 करोड़ रूपये खर्च किये गये। यह निर्धारित बजट से 300 प्रतिशत अधिक था। इस पर भी पीआईबी फैक्ट चेक ने सफाई दी कि जो अतिरिक्त खर्च बताया जा रहा है वह पर्मानेन्ट एसेट क्रियेशन पर है जिसका उपयोग सिर्फ जी20 तक सीमित नहीं है। आगे भी इन संसाधनों का इस्तेमाल होगा। स्वाभाविक है इसमें भारत मंडपम का निर्माण भी शामिल होगा जिसकी लागत 2700 करोड़ रूपये बतायी जा रही है।
जी20 की बैठक हो या कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन। वैश्विक आयोजनों का अपना एक मानक होता है और उस मानक से नीचे उतरकर आप उस आयोजन को नहीं कर सकते। ऐसे आयोजनों के समय में उस शहर को साफ सुथरा किया जाता है जहां इससे जुड़े आयोजन होने होते हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 के समय में दिल्ली शहर में एक लाख करोड़ रूपये का निवेश किया गया था जिसमें भारी भरकम भ्रष्टाचार भी हुआ। फिर भी इस आयोजन ने दिल्ली शहर को एक नया स्वरूप दिया जिसके लिए आज भी लोग दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार को धन्यवाद देते हैं।
ऐसे ही जी20 की बैठक से पहले दिल्ली ही नहीं हर उस शहर को सजाया और संवारा गया जहां इससे जुड़ी बैठकें सालभर होती रहीं। बनारस, श्रीनगर, जयपुर हर शहर में राज्य सरकारों ने अपने खर्चे से उस शहर में स्वच्छता और सुन्दरता का अभियान चलाया क्योंकि वहां जी20 देशों के प्रतिनिधि पहुंचने वाले थे। तो क्या यह सवाल उठाया जा सकता है कि राज्य सरकारों ने जी20 की बैठकों के लिए शहर को सजाने पर जो पैसा 'बर्बाद' किया उसका उस शहर के लोगों को कोई लाभ नहीं मिलेगा?
किसी शहर का आधारभूत ढांचा मजबूत होता है तो इसका दीर्घकालिक लाभ वहां रहनेवाले लोगों को ही मिलता है। इसलिए ऐसे सवाल ही बेमतलब और गुमराह करनेवाले हैं कि वैश्विक आयोजनों पर सैकड़ों हजारों करोड़ खर्च करके सरकार अपनी वाहवाही करवाती है और जनता का पैसा बर्बाद करती है। सच्चाई तो यह है कि ऐसे आयोजनों के समय शहर के ढांचागत विकास पर जो पैसा खर्च होता है उसका स्थाई लाभ वहां रहनेवाली जनता को ही मिलता है।
फिर जी20 की अध्यक्षता के रूप में भारत के प्रधानमंत्री ने ऐसी छवि प्रस्तुत करने का प्रयास किया है जिसका दीर्घकालिक लाभ केवल आर्थिक निवेश के रूप में ही नहीं बल्कि पर्यटन को बढावा देने वाला भी साबित होगा। दिल्ली के प्रगति मैदान स्थित नवनिर्मित भारत मंडपम से ही मोदी सरकार ने न केवल भारत की सांस्कृतिक विविधता का परिचय करवाया बल्कि एक प्राचीन सभ्यता के रूप में जी20 के सदस्य देशों के रूप में प्रस्तुत किया। यह नरेन्द्र मोदी ही हैं जिन्होंने सबसे मुखर रूप से भारत को मदर ऑफ डेमोक्रेसी के रूप में बताने की एडवोकेसी शुरु की। जी20 के आयोजन में इसकी झलक दिखाई दी।
अब किसी दल या दल समर्थक को इन बातों से आपत्ति हो तो अलग बात है वरना जी20 के सफल आयोजन से भारत की गरिमा विश्व बिरादरी में बढ़ी है। एक राष्ट्र के रूप में भारत ने जी20 के सफल आयोजन के जरिए विश्व बिरादरी को कूटनीतिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से जो संदेश दिया है उसकी प्रशंसा आलोचक देश भी कर रहे हैं। ऐसे में यह समझना सचमुच मुश्किल है कि हमारे विपक्षी दलों को परेशानी क्यों हो रही है? क्या सिर्फ इसलिए कि विपक्ष का काम ही होता है सवाल उठाना इसलिए सवाल उठा रहे हैं या फिर तकलीफ कुछ और है?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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