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Holy Book Burning: असहमति की आजादी और धार्मिक किताबों को जलाने का बढ़ता चलन

एक बार फिर स्वीडन चर्चा में है। स्वीडन में एक मुस्लिम नौजवान ने इजाइल दूतावास के सामने ईसाइयों की बाइबिल और यहूदियों की तौरात जलाने की घोषणा की लेकिन ऐन मौके पर उसने ऐसा करने से यह कहते हुए मना कर दिया कि वह सबकी पवित्र किताबों का सम्मान करता है।

इसलिए पुलिस परमिशन होने के बाद भी वह ईसाइयों और यहूदियों की धार्मिक किताब जलाने की बजाय उन्हें संदेश देना चाहता है कि हम मुस्लिम सभी धर्मों की किताबों का सम्मान करते हैं।

Holy Book Burning

हालांकि यह एक पब्लिसिटी स्टंट की तरह ही था। क्योंकि ऐसा बिल्कुल नहीं है कि इस्लाम सभी धर्म की किताबों का सम्मान करता है। इसके उलट वह बाकी धर्मों की किताबों को खारिज करता है। अभी इसी साल जनवरी में केरल के कासरगोड़ में एक मुस्लिम मोहम्मद मुस्तफा ने बाइबिल को जला दिया था जिसका वहां के ईसाई मिशनरियों ने मुखर विरोध किया था। बाइबिल को जलानेवाले वीडियो के वायरल होने के बाद केरल पुलिस ने मुस्तफा को गिरफ्तार भी किया था।

लेकिन यहां महत्वपूर्ण है स्वीडन की भूमिका जिसने ईसाई बहुल देश होने के बावजूद उस मुस्लिम की व्यक्तिगत आजादी का उतना ही सम्मान किया जितना उस इराकी मूल के एक्स मुस्लिम का जिसने स्वीडन में कुरान जलाई थी। स्वीडिश पुलिस ने उस मुस्लिम को भी बाइबिल जलाने की उसी तरह अनुमति दे दी जैसे कुरान जलाने की दी थी। ऐसा इसलिए क्योंकि स्वीडिश प्रशासन की दृष्टि में असहमति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी भी धार्मिक किताब से अधिक महत्वपूर्ण है। अगर कोई व्यक्ति किसी धार्मिक किताब को जलाना चाहता है तो यह उसकी अपनी असहमति की आजादी है और स्वीडिश प्रशासन के लिए उसका महत्व किसी धार्मिक किताब से अधिक है।

असल में धार्मिक किताबों को लेकर ईसाई, मुस्लिम और यहूदी तीनों ही बहुत संवेदनशील रहे हैं। जिसे हम किताब कहते हैं अरबी में उसका अर्थ होता है लिखना। इजराइल-फिलिस्तीन और अरब के इलाकों में लिखी हुई पुस्तकों को वो बहुत दुर्लभ वस्तु मानते रहे हैं। यहां यहूदियों में सबसे पहले लिखकर धार्मिक बातों को सहेजने की परंपरा का चलन दिखता है। पहली दूसरी सदी में अरब और मिस्र के इलाकों में यहूदियों के सूरा (काउंसिल) हुआ करते थे जहां किताबत (लिखने) का काम किया जाता था। उस समय तक कागज उनके पास नहीं था इसलिए लिखने का यह काम छाल, चमड़ा या अन्य किसी ऐसी वस्तु पर किया जाता था जिसे लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सके। इसी तरह अरब में ईसाईयों की ही एक ब्रांच नुसरानियों की थी जो किताबत किया करते थे।

सातवीं सदी में इस्लाम के उदय के साथ ये परंपरा उनके यहां भी दिखती है। वर्तमान समय में जो कुरान है उसे 1924 में अल अजहर युनिवर्सिटी द्वारा मानक कुरान के तौर पर घोषित किया गया। इससे मिलती जुलती जो बाकी अन्य कुरान थी उसे अस्वीकार कर दिया गया। इससे बहुत पहले खलीफा उस्मान के दौर में जब कुरान का पहली बार मानकीकरण किया गया था तब सही बुखारी की हदीस संख्या 4987 के मुताबिक "कुरान की अन्य पांडुलिपियों को जला दिया गया था।"

इस तरह देखें तो पहली बार कुरान को जलाने की घटना तो उन्हीं के चौथे खलीफा उस्मान ने करवाई थी। हालांकि मुस्लिम समुदाय के लोग ऐसा मानते हैं कि ऐसा उन्होंने कुरान के मानकीकरण के लिए किया था। जिस हब्श की कुरान को मानक माना गया अल अजहर यूनिवर्सिटी ने भी उसी को मानक मानकर बाकी कुरान को प्रचलन से बाहर कर दिया।

आज जो उपलब्ध कुरान है उसमें भी किताब को बहुत अधिक महत्व दिया गया है। अपने फॉलोवर से कुरान कहती है कि अब तुम्हारे पास भी एक किताब है। यह किताब बाकी किताबों से श्रेष्ठ है। लेकिन इस किताब के साथ मुस्लिमों द्वारा एक दावा और किया जाता है। यह दावा है कि कुरान को स्वयं उनके अल्लाह ने उनके नबी पर उतारा था। कुरान की जो आयतें हैं वो उनके नबी पर उतरती थी जिसे वो बोल देते थे और उनके आसपास मौजूद लोग उसे छाल या चमड़े पर लिख लिया करते थे। हालांकि ऐतिहासिक रूप से कुरान कब लिखी गई इसे लेकर कोई एक राय नहीं है लेकिन कुरान के कुछ पन्ने बर्मिंघम म्यूजियम एण्ड आर्ट गैलरी में आज भी रखे हुए हैं जो पत्तों पर लिखे हुए हैं। इनके बारे में बताया जाता है कि इन्हें छठीं सा सातवीं सदी में लिखा गया था।

यह सब चर्चा करने का आशय सिर्फ इतना है कि किताबत को लेकर इस इलाके का समाज सदैव से संवेदनशील रहा है। उनके लिए धार्मिक किताब कोई बहुत बड़ी पूंजी थी और सबसे बड़ी उपलब्धि भी। उनकी सोच में ऐसा दिखता है कि धार्मिक किताब को किसी कीमत पर नष्ट नहीं किया जा सकता। सवाल सिर्फ मुस्लिमों का ही नहीं है। जब तक चर्च का प्रभुत्व रहा उन्होंने बाइबिल को लेकर भी इसी तरह की मान्यताएं गढ रखी थीं, हालांकि वो बाईबिल को मुसलमानों की तरह गॉड द्वारा भेजी गयी किताब नहीं मानते थे। फिर भी 1450 में प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार से पहले बाईबिल को चर्च में जंजीरों से बांधकर रखा जाता था ताकि कोई उन्हें चुराकर न ले जा सके।

उसी दौर में खुद चर्च ने बाइबिल को जलाया भी है। इसके पीछे उनका तर्क था कि जो स्थानीय भाषाओं में लिखी बाइबिल थी उन्हें इसलिए जलाया गया ताकि एक मानक बाइबिल को स्थापित किया जा सके जो कि लातिन में लिखी गयी थी। हिब्रू में लिखी बाइबिल आज भी मौजूद है लेकिन अन्य स्थानीय भाषाओं में लिखी बाइबिल को जलाकर खत्म कर दिया। प्रिटिंग प्रेस आने के बाद तो वैसे भी पहले लातिन और सोलहवीं सदी के बाद अंग्रेजी की बाइबिल सबसे अधिक प्रचारित हो गयी।

प्रिंटिंग प्रेस आ जाने के बाद किसी धार्मिक किताब को जला देना या नष्ट कर देना किसी का व्यक्तिगत मानवाधिकार या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो हो सकती है लेकिन इससे उस "पवित्र किताब" के लुप्त होने का कोई खतरा नहीं रहता जिसे जलाया जाता है। जब आप लाखों करोड़ों की संख्या में कोई किताब छाप सकते हैं तो किसी के जला देने या नष्ट कर देने से ऐसी "पवित्र किताबों" के अस्तित्व पर भला क्या फर्क पड़ेगा?

हां, नुकसान उस दौर में हुआ जिस दौर में बख्तियार खिलजी ने नालंदा की उस विशाल लाइब्रेरी को जला दिया था जिसमें ज्ञान विज्ञान, धर्म दर्शन से जुड़ी हजारों या लाखों हस्तलिखित पुस्तकें रखी हुई थीं। 1190 में जब नालंदा विश्वविद्यालय को तहस नहस किया गया तो परिसर कई महीनों तक जलता रहा। लेकिन भारतीय मन मानस ने उसे भी स्वीकार कर लिया। हाल फिलहाल में डॉ भीमराव अंबेडकर ने 1927 में महाराष्ट्र के महाड़ में मनुस्मृति को जला दिया था। तब से लेकर अब तक अंबेडकर समर्थकों द्वारा हर साल 25 दिसंबर को मनुस्मृति जलाई जाती है लेकिन भारतीय मन मानस इसे भी स्वीकार कर चुका है।

किसी धर्म की किसी भी बात से सहमत असहमत होना व्यक्ति का अपना प्राकृतिक अधिकार है। अगर वह किसी से असहमत है तो उसे इस बात का पूरा अधिकार है कि उससे अपनी असहमति व्यक्त कर सके। खासकर धार्मिक मान्यताओं और किताबों के मामले में। असहमत होने पर वह किसी धार्मिक पुस्तक को जलाना चाहे तो जलाकर भी अपना विरोध प्रकट कर सकता है। स्वीडिश प्रशासन ने अगर कुरान और बाईबिल को जलाने की अनुमति दी तो इसके पीछे यही सिद्धांत है।

लेकिन कुरान जलाने पर जिस तरह से इस्लामिक जगत ने प्रतिक्रिया दी वह असहमति के इसी प्राकृतिक अधिकार को खत्म करने का प्रयास है। अब जब किसी भी धार्मिक पुस्तक के न केवल प्रिंट संस्करण बल्कि डिजिटल संस्करण भी उपलब्ध हैं तब किसी के जलाने या कहीं से कोई फाइल डिलिट करने से कुछ भी खत्म नहीं होगा।

यह सभ्यता का नालंदा युग नहीं है कि कोई बख्तियार खिलजी अगर किसी लाइब्रेरी को जला देगा तो सबकुछ खत्म हो जाएगा। मुस्लिम उम्मा अगर गैर मुस्लिमों से यह अपेक्षा करती है कि वो उनकी पवित्र किताब का अनादर न करें तो उन्हें उसकी असहमति के अधिकार का भी सम्मान करना सीखना होगा जैसे स्वीडिश प्रशासन ने करके दिखाया है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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