France Violence: यूरोबिया और इस्लामोफोबिया के बीच फंसा यूरोप

27-28 जून को यूरोप के दो अलग अलग देशों में बिल्कुल विपरीत घटनाएं घटित हुईं। पहली घटना फ्रांस से जुड़ी है जहां 27 जून को पेरिस के उपनगर न्येरेरे में एक 17 साल के अल्जीरियन मुस्लिम किशोर नाहल को फ्रेन्च पुलिस ने इतनी बुरी तरह से अपनी गिरफ्त में दबोच लिया कि वह मर गया। वहीं 28 जून को यूरोप के ही एक दूसरे देश स्वीडन में इराकी मूल के एक 37 साल के नौजवान सलवान मोमिका ने मुसलमानों की पवित्र किताब कुरान को न सिर्फ पैरों से ठोकर मारी बल्कि उसे जला भी दिया। यह सब उसने न केवल स्टॉकहोम में एक मस्जिद के सामने किया बल्कि इसके लिए उसने स्वीडिश प्रशासन से अनुमति भी ले रखी थी।

दोनों घटनाओं पर दो तरह की प्रतिक्रिया हुई है। स्वीडन में कुरान जलाने की जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न केवल इस्लामिक देशों ने बल्कि अमेरिका और स्वीडन ने भी निंदा की है। हालांकि अमेरिका और स्वीडन ने यह भी कहा है कि ''उसने जो किया हम उसका समर्थन नहीं करते लेकिन उसकी अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक नहीं लगा सकते।" वहीं दूसरी ओर पेरिस में नाहल की मौत के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तो कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, लेकिन पेरिस सहित फ्रांस के दूसरे कई शहरोें में 29 जून से दंगा भड़का हुआ है। इन दंगों के पीछे लेफ्ट और इस्लामिस्ट लोगों का गठजोड़ बताया जा रहा है।

Sanjay Tiwari

नाहल के बारे में बताया जा रहा है कि वह एक क्रिमिनल बैकग्राउण्ड वाला किशोर था जो बार बार जानबूझकर ट्रैफिक नियमों की अनदेखी करता था। 2021 से 2023 के बीच उसके ऊपर अलग अलग क्रिमिनल ऑफेंस की शिकायतें दर्ज दीं। जिस पेरिस शहर को इतना स्वनियंत्रित शहर कहा जाता है कि वहां स्वभाव से लोग नागरिक नियमों का पालन करते हैं वहां नाहल पूरी तरह से अनियंत्रित होकर विचरता था। 17 साल की उम्र में ही उसके नाम 15 क्रिमिनल ऑफेंस दर्ज थे और पांच बार उससे पूछताछ की जा चुकी थी। फ्रेन्च वेबसाइट 'यूरोप1' के मुताबिक "मार्च और अक्टूबर 2021 में उसे गिरफ्तार किया गया था लेकिन पुलिस लॉकअप से ही चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। जनवरी 2022 में उसे चिल्ड्रन कोर्ट में पेश किया गया जहां जज ने उसको शिक्षित होने का आदेश दिया। इसके बाद फरवरी 2022 में एक बार फिर उसे गिरफ्तार किया गया क्योंकि वह गलत लाइसेन्स प्लेट लगाकर गाड़ी चला रहा था। जनवरी और मार्च 2023 में उसे ड्रग्स बेचते हुए रंगे हाथ पकड़ा गया था।

नाहल एक क्रिमिनल बैकग्राउण्ड वाला लड़का था इसमें कोई शक नहीं है। फिर भी इसका अर्थ यह नहीं कि पुलिस उसे इतना टार्चर करे कि वह मर जाए। इसीलिए उन पुलिसवालों को तत्काल गिरफ्तार कर लिया गया जिन्होंने नाहल की हत्या का आरोप है। मामला इतने में रफा दफा हो जाना चाहिए था। लेकिन मामला रफा दफा हुआ नहीं। 28 जून की रात से जो दंगा शुरु हुआ वह अब तक रुका नहीं है। पेरिस में जगह जगह तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं की गयी हैं। फ्रांस के दूसरे बड़े शहर मर्साइ में वहां की सबसे बड़ी लाइब्रेरी को आग लगा दी गई। सरकारी संपत्तियों को जहां तहां आग के हवाले किया जा रहा है और 40 हजार पुलिस बल मैदान में उतार दिये जाने के बाद भी बीती रात फ्रांस में उपद्रव, आगजनी और दंगे थमे नहीं है।

फ्रांस वह देश है जहां के फ्रेन्च रिवोल्यूशन ने दुनिया को दो विचारधाराएं दी। जो जार या राजा के खिलाफ विद्रोही थे उनको लेफ्ट कहा गया और जो जार के समर्थक थे उनको राइट। इस लेफ्ट और राइट के बंटवारे की बुनियाद जिस फ्रांस में पड़ी आज वह उसी बंटवारे का शिकार है। अभी तक जो मीडिया रिपोर्ट सामने आयी है उसमें यही उभरकर सामने आया है कि फ्रांस में लेफ्ट लिबरल और इस्लामिस्ट समूहों ने हाथ मिला लिया है और नाहल की मौत के बहाने पूरे फ्रांस को आग के हवाले कर रहे हैं। लेकिन बात सिर्फ नाहल की मौत तक नहीं सीमित है।

बीते कुछ सालों में यूरोप के अधिकांश देशों में इस्लामिक चरमपंथ और उसके खिलाफ क्रिश्चियन प्रतिरोध बढ़ा है। नीदरलैण्ड, ब्रिटेन, स्वीेडन, इटली और फ्रांस में बार बार इसके खिलाफ आवाजें उठती रहीं हैं। फ्रांस ही वह देश है जहां की एक पत्रिका चार्ली हाब्दो ने बार बार मुस्लिमों के पैगंबर का कार्टून बनाया जिससे दुनियाभर के मुस्लिमों में भयंकर प्रतिक्रिया हुई। खासकर यूरोपीय यूनियन में शामिल होने का आवेदन करने वाले इस्लामिक देश तुर्की ने एक अलग गुट बनाकर पाकिस्तान और मलेशिया जैसे इस्लामिक देशों को मुखरता से इस विरोध में शामिल करवाया। लेकिन खुद फ्रांस ने इन विरोधों से अधिक नागरिक की अभिव्यक्ति की आजादी को अधिक महत्व दिया।

फ्रांस में 9 से 10 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। फिर भी फ्रांस इस तरह से कभी इस्लामिक उपद्रव का शिकार नहीं हुआ। उस समय भी नहीं जब मुस्लिमों के पैगंबर का कार्टून वाला विवाद हुआ था। जो प्रतिक्रिया हुईं वो बाहर से वहां जाकर बसे मुस्लिमों ने ही अधिक दी। इसका कारण संभवत: फ्रेन्च मुस्लिमों की वह समझ है जो किसी की अभिव्यक्ति की आजादी के महत्व को समझते हैं। लेकिन इस बार ऐसा होता नहीं दिख रहा है।

पूरे यूरोप में धीरे धीरे ये बात प्रचारित हो चली है कि यूरोप को अरब बनाने की नीति पर काम चल रहा है। इसे उन्होंने यूरोबिया का नाम दिया है। यूरोपीय समुदाय में एक वर्ग ऐसा है जो यह मानता है कि यूरोप को अरब बनाने की मुहिम चल रही है। इसलिए एक ओर जहां मुस्लिम अप्रवासी तेजी से यूरोप की ओर आ रहे हैं वहीं दूसरी ओर जो मुस्लिम वहां रह रहे हैं उनकी प्रजनन दर ईसाईयों के मुकाबले अधिक हैं। इसके अलावा ईसाई लड़कियों को बहला फुसलाकर उनसे शादी करने के लिए ग्रूमिंग गैंग भी चल रहे हैं जिसे लेकर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनकर खुलकर बोल ही चुके हैं।

लेकिन साथ ही साथ एक दूसरा नैरेटिव भी यूरोप में चल रहा है जिसे इस्लामोफोबिया कहा जा रहा है। जो देश, समुदाय या व्यक्ति इस्लामिक अतिक्रमण की बात करते हैं उनको इस्लामोफोबिक बताकर महत्वहीन करने का प्रयास भी किया जाता है। इटली की नेशनलिस्ट लीडर जार्जिया मिलोनी ने हाल में जब इस्लामिक अतिक्रमण को रोकने के लिए नये कानून का मसौदा पेश किया तो उन पर भी यही इस्लामोफोबिया का आरोप लगा दिया गया। मुख्य रूप से इस्लामोफोबिया का नैरेटिव दुनियाभर में लेफ्ट लिबरल और इस्लामिस्ट ग्रुप चलाते हैं जो यहां भी वही कर रहे हैं।

लेकिन इस्लामोफोबिया और युरोबिया के बीच फंसे यूरोप के अधिकांश देशों की दुविधा दूसरी है। एक ओर जहां वो फ्री स्पीच की बात करते हैं वहीं अपने आपको इस्लामोफोबिया से ग्रस्त भी नहीं दिखाना चाहते। वो एक फ्री सोसाइटी के तौर पर अपने आपको प्रस्तुत करना चाहते हैं जो उन इस्लामिक अतिक्रमणकारियों के लिए सुनहरा अवसर है जो ऐसी ही परिस्थितियों में अपना विकास और विस्तार करते हैं। ऐसे में स्वाभाविक रूप से यूरोबिया का जन्म हो जाता है जिसका सबसे बड़ा खतरा यह है कि वह यूरोप के लोगों का अस्तित्व ही मिटा देना चाहता है।

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान भले ही रियाद में बैठकर दावा करते हों कि वो अरब को इक्कीसवीं सदी का यूरोप बनाना चाहते हैं लेकिन जो इक्कीसवीं सदी का यूरोप है उस पर सातवीं सदी के अरब होने का खतरा मंडरा रहा है। बात बात पर अपने कपड़े उतारकर नग्न प्रदर्शन तक से कोई संकोच न करने वाले यूरोपीय लोगों के लिए इसे स्वीकार कर पाना आसान नहीं होगा। इसलिए जो टकराव बीते एक दशक से शुरु हुआ है वह आगे और बढ़ेगा तथा गहरा होगा। इसमें लेफ्ट लिबरल समूह भी यूरोप के लोगों के लिए एक चुनौती बनकर ही उभरेंगे जैसे अभी फ्रांस में बने हुए हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+