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Foreign Interference: खतरनाक है देश की राजनीति में विदेशी दखल

क्या भारत की राजनीति में विदेशी तत्वों का दखल बढ़ता जा रहा है या फिर भारत के राजनेता अपने सहारे के लिए विदेशी तत्वों के सहयोग अथवा हस्तक्षेप की अपेक्षा करने लगे हैं?

भारत जैसे बड़े देश की राजनीति में विश्व के शक्तिशाली देशों की दिलचस्पी होना एक सामान्य बात लगती है, लेकिन यह सवाल इसलिए पैदा हुआ है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से एक ऐसा चलन देखने में आ रहा है, जो सामान्य से अलग है। इसमें हम यह देखते हैं कि विदेशी तत्वों की भारत में एक सहज-स्वाभाविक सामान्य सी दिलचस्पी तो है ही, लेकिन भारत के कुछ राजनीतिक लोग भी अपने फायदे के लिए विदेशों का मुंह देखने लगे हैं।

Foreign interference in the country s politics is dangerous

यद्यपि इस तरह के प्रयासों में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही तरफ के लोग शामिल हैं, लेकिन दोनों के उद्देश्य और तरीके स्पष्ट रूप से अलग हैं। जहां सत्ता पक्ष के लोग विदेशों में अपना प्रभाव दिखाकर देश में हवा बनाने की कोशिश करते हुए दिखाई देते हैं, वहीं विपक्ष के लोग अपने बचाव, समर्थन और समस्याओं के समाधान के लिए दूसरे देशों मे भारत की सरकार के विरुद्ध माहौल बनाते हुए दिखाई देते हैं।

सबसे पहले तो हमने स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देखा कि दुनिया के अनेक महत्वपूर्ण देशों में जाकर उन्होंने भारतीय समुदाय की बड़ी-बड़ी रैलियां कीं और उसमें एक तरफ जहां भारत का गौरवगान किया, वहीं दूसरी तरफ भारतीय विपक्ष की प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से आलोचना भी की। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शुरू किये गए इस चलन में यह बात गौर करने की रही कि उन्होंने जब भी भारतीय विपक्ष की आलोचना की, भारतीय समुदायों के बीच ही की। विदेशी समुदायों के बीच भारतीय राजनीति पर बात करते हुए वे कभी नज़र नहीं आए।

दूसरी तरफ, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी पिछले कुछ वर्षों के दौरान अमेरिका और ब्रिटेन जैसे महत्वपूर्ण देशों की अपनी यात्राओं का राजनीतिक इस्तेमाल किया है। इन यात्राओं के दौरान उन्होंने कई बार यह आरोप लगाया है कि भारत की सरकार यहां के लोकतांत्रिक ढांचे पर लगातार हमले कर रही है, साथ ही यहां प्रेस और न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी खतरे में है।

लेकिन बात केवल कुछ भारतीय नेताओं के विदेशी धरती पर कुछ बयानों तक ही सीमित नहीं दिखाई देती, बल्कि भारत के कई आंतरिक मामलों में विपक्षी खेमे द्वारा तैयार किये गये नैरेटिव के आधार पर विदेशों से जिस तरह की आलोचनात्मक प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, वह चिंता का विषय हैं। सबसे पहले इस संदर्भ में भारत के हाल-फिलहाल के दो आंतरिक मामलों पर गौर करते हैं। एक - भारत में नागरिकता संशोधन कानून 2019 यानी सीएए का लागू होना, और दूसरा - शराब घोटाले के आरोप में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ईडी द्वारा गिरफ्तार किया जाना।

जहां तक सीएए का प्रश्न है, भारत का विपक्ष लगातार इसे धार्मिक रूप से भेदभाव करने वाला और मुसलमानों के खिलाफ बताता रहा है। इसी आधार पर 2019-20 में मुस्लिम समुदाय ने दिल्ली के शाहीन बाग समेत देश के अनेक हिस्सों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन भी किये। ऐसी अफवाहें फैलाई गईं, जैसे कि इस कानून से भारत में बड़ी संख्या में मुसलमानों की नागरिकता छीन ली जाएगी, जबकि सरकार द्वारा बार-बार स्पष्ट किया गया कि यह भारतीय नागरिकता देने का कानून है, न कि भारत के अल्पसंख्यकों की नागरिकता छीनने का कानून।

इसके बावजूद भारतीय विपक्ष ने जिस तरह का नैरेटिव खड़ा किया, उसके कारण दुनिया भर में इस कानून को लेकर एक भ्रम का वातावरण दिखाई देता है। अमेरिका ने तो यहां तक कह दिया कि भारत में सीएए कानून लागू होने से हम चिंतित हैं और इस बात पर करीब से नज़र बनाए हुए हैं कि इस कानून को किस तरह से लागू किया जाता है। स्थिति ऐसी बनी कि भारत सरकार को जवाब में कहना पड़ा कि ऐसे बयान देने वालों को भारतीय परंपराओं और विभाजन के बाद भारत और नए बने देशों के इतिहास की जानकारी नहीं है।

इसके बाद दिल्ली में शराब घोटाले के आरोप में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी पर भी भारतीय विपक्ष ने जैसा नैरेटिव खड़ा किया, ठीक वैसे ही बयान जर्मनी और अमेरिका की तरफ से आ गए। दोनों देशों ने मामले पर नज़र होने की बात कही, साथ ही भारत को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाया। हालात ऐसे बने कि भारत को इन दोनों देशों के राजनयिकों को तलब कर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी कि भारत में कानूनी प्रक्रियाएं एक स्वतंत्र न्यायपालिका पर आधारित हैं, उन पर कलंक या आक्षेप लगाने को स्वीकार नहीं किया जाएगा।

इतना ही नहीं, भारत को यह भी कहना पड़ा कि कूटनीति में उम्मीद की जाती है कि विभिन्न देश एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में दखल न दें और एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करें। लेकिन इसके बाद भी अमेरिकी विदेश विभाग ने भारत को निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध कानूनी प्रक्रियाओं के पालन का ज्ञान दिया और कहा कि वह केजरीवाल की गिरफ्तारी समेत कांग्रेस पार्टी के बैंक खाते फ्रीज किये जाने जैसी कार्रवाइयों पर बारीकी से अपनी नज़र बनाए रखेगा।

इससे पहले, बीजेपी प्रवक्ता नूपुर शर्मा और मुस्लिम नेता तस्लीम रहमानी के बीच हुई बहस को भी भारतीय विपक्ष ने ऐसा मोड़ दे दिया था, जिससे न केवल देश के मुसलमान आक्रामक हो उठे, बल्कि कुवैत, ईरान, कतर औऱ सऊदी अरब समेत अनेक मुस्लिम देशों ने इस मुद्दे पर भारत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। देश के भीतर ऐसे हालात बन गए कि मुस्लिम समुदाय ने अनेक जगहों पर "सिर तन से जुदा" जैसे हिंसक नारे लगाए और उदयपुर समेत कुछ जगहों पर तो सचमुच ही कन्हैयालाल और कुछ अन्य लोगों के सिर कलम किये जाने की घटनाएं भी सामने आ गईं।

इसके अलावा, एनडीटीवी मामले में भी अंतरराष्ट्रीय लॉबी और दबाव का पूरा इस्तेमाल किया गया। जब एक निजी बैंक को नुकसान पहुंचाये जाने से जुड़े एक मामले में सीबीआई ने एनडीटीवी के मालिक प्रणय रॉय के ठिकानों पर छापे मारे थे, तब भी विपक्षी कैम्प ने इसे भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला और लोकतंत्र को कमज़ोर करने की कोशिश बताया था।

किसान आंदोलन के समय भी हमने देखा कि किस तरह से एक अंतरराष्ट्रीय लॉबी इस आंदोलन के पीछे योजनाबद्ध तरीके से दिन-रात काम कर रही थी, जिसका खुलासा स्वीडिश युवती ग्रेटा थनबर्ग द्वारा गलती से पोस्ट किये गये एक टूलकिट से हुआ था। पेगासस स्पाइवेयर मामले में भी कई वैश्विक संगठनों ने भारतीय विपक्ष के दावे का समर्थन करते हुए भारत सरकार पर प्रश्नचिह्न खड़े किये थे।

यह सच है कि बीते दस वर्षों में भारत में विपक्ष लगातार कमज़ोर पड़ा है, लेकिन उसकी इस कमज़ोरी के पीछे उसके ऊपर भ्रष्टाचार, परिवारवाद, जातिवाद, सांप्रदायिक तुष्टीकरण, राजनीतिक अपराधीकरण, नीतिगत पंगुता और देश की बुनियादी समस्याओं का समाधान कर पाने में विफल रहने के आरोपों की मुख्य भूमिका है। नेता, नीति और नीयत के सवाल पर देश की एक बड़ी आबादी उसके ऊपर भरोसा करने को तैयार नहीं है। उसके भीतर बिखराव और महत्वाकांक्षाओं की लड़ाई भी भयानक है।

लेकिन अपनी इन सारी कमियों पर विचार नहीं करते हुए वह अपनी तमाम विफलताओं का ठीकरा मोदी सरकार के सिर पर फोड़ता है और दुनिया भर में यह प्रचार करता है कि भारत में लोकतंत्र, संवैधानिक संस्थाओं एवं मीडिया को कमज़ोर किया जा रहा है। ज़ाहिर है, दुनिया को भी इस तरह के आरोपों में मज़ा आता है और वह भारत की अंदरूनी राजनीति में दखल देने से बाज नहीं आता।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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